मासूम बच्ची 18 सितंबर को झाड़ियों में पड़ी मिली थी।
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यह कहना है इंदौर के बाणगंगा क्षेत्र में रहने वाली उस महिला का जिसे 18 सितंबर को मासूम बच्ची झाड़ियों में पड़ी मिली थी। नवजात को लेकर महिला अपने पति के साथ पुलिस के पास पहुंची थी। दंपती ने नवजात के मिलने से की कहानी बताई। हालांकि दूसरे ही दिन पुलिस ने मामले का खुलासा कर दिया।
कहानी के अनुसार, दंपती ने बताया कि मासूम बच्ची को वह घर लाने के बाद साफ करती है, अच्छे कपड़े पहनाती है। उसके पति और उसकी दो बेटियां (7 साल और 17 साल) भी उसे खूब प्यार करते हैं। सुबह दंपती को लगता है कि लावारिस बच्ची को घर में रखना अपराध हो सकता है तो वे उसे पुलिस को सौंपने के लिए थाने जाते हैं। दोनों बेटियाें से वादा भी करते हैं कि हम इसे जल्द ही वापस ले आएंगे।
दंपती और उसकी दोनों बेटियां। पहचान छुपाने के लिए चेहरे को ब्लर किया गया है।
पुलिस को सौंपा, बताया पूरा मामला दंपती ने सुबह थाने पहुंचकर पुलिस को पूरा मामला बताया और बच्ची को उन्हें सौंप दिया। दिखने में सुंदर, अच्छी से नहलाई हुई और माथे पर काजल का टीका देखकर पुलिसकर्मियों का भी मन भर आता है। वे उसे तुरंत अस्पताल में एडमिट करा देते हैं। बच्ची के स्वस्थ होने पर दंपती और पुलिस दोनों संतुष्ट हो जाते हैं। इस बीच दंपती उस बच्ची को गोद लेने की बात पुलिस से कहते हैं, जिस पर पुलिस भी अपनी सहमति देती है।
पुलिस जांच में सामने आता है कहानी का दूसरा पहलू यह तो कहानी का एक पहलू है जिसे पढ़कर सभी के मन में करुण दया और प्रति प्रेम का भाव उत्पन्न होता है। अब इसके दूसरे पहलू की ओर जाते हैं जहां पुलिस ने जांच की और नई कहानी निकलकर सामने आती है। पुलिस के मन में कई सवाल थे। पुलिस गुत्थी सुलझाने में लग जाती है कि आखिर यह नवजात किसकी है?
इसे झाड़ियों में क्यों और किसने फेंका? पुलिस की जांच अवैध संतान के बिंदु पर केंद्रित रहती है। पुलिस को अनुमान था कि जहां बच्ची मिली वहां आसपास मेटरनिटी होम, अस्पताल होंगे जहां उस महिला की डिलीवरी हुई होगी, लेकिन ऐसा भी नहीं था।
फिर अचानक ऐसा हुआ और चल गया पता… टीआई सियाराम गुर्जर अपनी टीम के साथ जांच में लगे रहे। जांच में पता चला कि दंपती जब नवजात को सौंपने आए थे तो काफी भावुक थे…आंखें डबडबाईं थीं..नवजात को चूम भी रहे थे। जांच में पता चला कि दंपती की दो बेटियां और 11 वर्ष का बेटा भी है, ऐसे में नवजात के कपड़े घर में कैसे मिल गए।
दंपती के हावभाव और बच्ची के प्रति उनका समर्पण दिखाई दिया। पुलिस को आसपास लगे सीसीटीवी में भी कोई ऐसी आवाजाही नहीं मिलती जिससे यह पता चले कि कोई यहां बच्ची को फेंककर गया हो। पुलिस भी दंपती की पृष्ठभूमि के बारे में पता करती है।
आखिर सामने आया सच…बदनामी के डर से बनाई कहानी 19 सितंबर की शाम को जांच के बाद पुलिस दंपती से आखिर सच उगलवा लेती है। घटना में उनसे कोई अपराध नहीं हुआ है, बल्कि उनकी बेटी दुष्कर्म का शिकार हुई है और वह भी तीन लोगों की। इसमें एक तो दंपती का नजदीकी रिश्तेदार है। इसके अलावा क्षेत्र के ही दो सफाई कर्मचारी भी हैं।
बेटी के गर्भवती होने का काफी देर बाद पता चला। बेटी या परिवार की बदनामी न हो इसलिए उसकी डिलीवरी के बाद उसे योजनाबद्ध तरीके से गाजर घास में मिलने की कहानी बनाकर पुलिस को सौंपा जाता है।
कैमरे में भी कैद है पर्दे के पीछे छिपी सच्चाई खास बात यह कि ‘दैनिक भास्कर’ ने 15 सितंबर की रात इस चौकीदार दंपती, उनके दोनों बच्चियों से घटना को लेकर बात की थी। इस दौरान उन्होंने वही दोहराया था जो उन्होंने पुलिस को कहा था। इस दौरान जब दंपती और उनकी बच्चियां नवजात को उन्हें वापस दिलाने और गोद लेने की प्रक्रिया के बारे में पूछते हैं और उनके चेहरे के जो भाव थे वे सारे ‘दैनिक भास्कर’ के कैमरों में कैद हैं।

तह तक पहुंचना भी होता है मुश्किल आमतौर पर नवजात के लावारिस मिलने की स्थिति में पुलिस बहुत ही कम मामलों में तह तक पहुंच पाती है। जीवित मिले नवजातों को तुरंत अस्पताल पहुंचा दिया जाता है। फिर पुलिस की जांच एक तरह बंद हो जाती है और नवजात को बाल कल्याण समिति के माध्यम से संस्था बाल संरक्षण आश्रम को सौंप दिया जाता है।
वहां से उसे CARA (Central Adoption Resource Authority) के माध्यम से पात्र निसंतान दंपती को सौंपा जाता है। यह पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन होती है। इसमें वेटिंग में रहे नि:संतान दंपती को प्राथमिकता दी जाती है। शासन की टीम पहले और बच्चे को सौंपने के बाद समय-समय पर दंपती और उनके परिवार और घर की मॉनिटरिंग करती है।
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