टोकन के बावजूद निराश किसान
लोकल18 को मिली आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, सतना और मैहर जिलों में यूरिया के लिए अब तक 10 हजार से ज्यादा किसान वेटिंग लिस्ट में हैं. इनमें मार्कफेड के सात डबल लॉक वितरण केंद्रों से करीब 9,954 और एमपी एग्रो के एक केंद्र से 256 किसान जुड़े हुए हैं. टोकन मिलने के बावजूद खाद का इंतजार लंबा होता जा रहा है. किसान रोजाना केंद्रों पर लाइनें लगाते हैं, लेकिन हाथ कुछ नहीं लगता है.
भाद गांव की वृद्ध महिला गुड़िया ने लोकल18 से बातचीत में बताया कि मैं खाद लेने आई हूं, रोज़ यहां पहुंचती हूं, लेकिन अब तक खाली हाथ ही लौटना पड़ा है. पहले तो टोकन नहीं मिला और अब टोकन मिलने के बाद भी खाद नहीं मिल रही है. किराया-भाड़ा देने तक की स्थिति नहीं है, लेकिन रोज लौटने को मजबूर हूं. सुनील पटेल के मुताबिक, टोकन पाने के लिए घंटों लाइन में लगे, लेकिन कई दिन लगातार आने के बाद भी खाद नहीं मिल पा रही है. किसान बताते हैं कि रोज यही कहा जाता है कि अभी जाओ कल मिलेगा, परसो मिलेगा, लेकिन खाद नहीं मिलती है.
लंबी कतारें और खाली हाथ किसान
सैकड़ों किसान 50 से 70 किलोमीटर दूर से खाद वितरण केंद्रों तक पहुंचते हैं. कई लोग सुबह 6 बजे से कतारों में खड़े रहते हैं और निराश होकर वापस लौट जाते हैं. किसानों ने आरोप लगाया कि जिनके पास जैक-जुगाड़ है, उन्हें खाद आसानी से मिल रही है, लेकिन गरीब और छोटे किसान दर-दर भटक रहे हैं.
गांव-गांव से किसान बता रहे हैं कि बाजार में 275 रुपये की खाद 600 रुपये में बेची जा रही है. सतना के रामबक्स पटेल ने बताया कि नागौद वितरण केंद्र पर 2000 से ज्यादा लोग धूप में खड़े रहते हैं, लेकिन टोकनधारी किसानों में से मुश्किल से 5% को ही खाद मिल पाती है. उन्होंने कहा कि ऐसे में किसान महीनों तक सिर्फ खाद ढोते रहेंगे, फसल कब देखेंगे? रामपुर से आए दिनेश सिंह ने भी यही शिकायत करते हुए कहा कि गांवों में खुलेआम खाद तीन गुना दाम पर बिक रही है और प्रशासन खामोश बैठा है.
समय और फसल दोनों बर्बाद
टिकरी गांव के पंकज सिंह लोकल18 से बताया कि कई बार खाद लेने गए, लेकिन हर बार खाली लौटना पड़ा. आज खाद आई भी तो अधिकारियों ने रोक ली और कहा कि कल से वितरण होगा. वहीं, सुनने में असमर्थ किसान अमरेश सिंह ने बताया कि वह पिछले 15 दिनों से 50 किमी दूर से रोज आ रहे हैं, लेकिन उन्हें अब तक खाद नहीं मिल सकी है. खजुराहरा गांव से आई महिला किसान बूटी ने कहा कि किसानों को डीएपी दी जा रही है जबकि सबसे ज्यादा जरूरत यूरिया की है. सुबह 6 बजे से धूप में बैठते हैं मगर खाली हाथ लौटना पड़ता है.
दो महीने से बिगड़ी व्यवस्था
किसानों के अनुसार, पिछले दो महीने से यही हाल है. न खाद वितरण की व्यवस्था सुधर रही है और न ही कालाबाजारी पर रोक लग रही है. किसानों का समय, पैसा और मेहनत सब बर्बाद हो रहा है. सबसे बड़ी चिंता यह है कि अगर टॉप ड्रेसिंग समय पर नहीं हो पाई तो धान की फसल का उत्पादन बुरी तरह प्रभावित होगा.
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