Importance of saying NO to kids : 99% अंक लाने वाला बच्चा भी जिंदगी में हो सकता है फेल! अगर आपने उसे ‘ना’ सुनना नहीं सिखाया

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Importance of saying NO to kids : जमाना कॉम्पिटिशन का है. बड़े ही नहीं, बच्‍चों में भी एक-दूसरे से आगे भागने की होड़ है. पेरेंट्स हर वो चीज करने को तैयार हैं, जो बच्‍चों के भविष्‍य को बेहतर बनाए. बच्‍चों को बेहतर माहौल देने और उनके मेंटल हेल्‍थ को बेहतर रखने के लिए माता-पिता हर वह सुख-सुविधा उन्‍हें दे रहे हैं जो शायद उन्हें खुद नहीं मिली. लेकिन इसी कोशिश में वे अनजाने में बच्चे की हर छोटी-बड़ी जिद को भी तुरंत पूरा कर देते हैं.

Parenting Tips for Success : मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि जो बच्चा घर में कभी ‘ना’ नहीं सुनता, उसका मानसिक विकास एक तरफा हो जाता है. ऐसे बच्चे बच्‍चे भले ही पढ़ाई में 99% अंक ले आते हैं, लेकिन जीवन की वास्तविक चुनौतियों के सामने अक्सर टूट जाते हैं.

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के ‘सेंटर ऑन द डेवलपिंग चाइल्ड’ के शोध के अनुसार, बच्चों के मस्तिष्क के विकास के लिए ‘एग्जीक्यूटिव फंक्शन’ और ‘सेल्फ-रेगुलेशन’ का होना जरूरी है. जब माता-पिता हर मांग पूरी करते हैं, तो बच्चे का ‘इम्पल्स कंट्रोल’ (आवेगों पर नियंत्रण) विकसित नहीं हो पाता. भविष्य में जब ऑफिस या रिश्तों में उन्हें ‘ना’ सुनने को मिलता है, तो उनका दिमाग उस तनाव को झेलने के लिए तैयार नहीं होता.

विशेषज्ञ इसे ‘पैरेंटिंग पैराडॉक्स’ कहते हैं. बच्चों को असुविधा से बचाना दरअसल उन्हें जीवन की बड़ी लड़ाइयों के लिए कमजोर बनाना है. Child Mind Institute की रिपोर्ट बताती है कि जिन बच्चों को सीमाओं (Boundaries) का ज्ञान नहीं होता, उनमें ‘फ्रस्ट्रेशन टॉलरेंस’ यानी निराशा सहने की क्षमता बहुत कम होती है. ऐसे बच्चे कॉलेज या करियर के दबाव में बहुत जल्दी डिप्रेशन और एंग्जायटी का शिकार हो जाते हैं क्योंकि वे ‘इनकार’ को अपनी हार मान लेते हैं.

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प्रसिद्ध ‘स्टैनफोर्ड मार्शमैलो एक्सपेरिमेंट’ में पाया गया कि जिन बच्चों ने अपनी तत्काल इच्छा को रोककर ‘ना’ को स्वीकार किया (Delayed Gratification), वे भविष्य में उन बच्चों की तुलना में अधिक सफल और मानसिक रूप से स्थिर पाए गए जिन्होंने अपनी जिद तुरंत पूरी कर ली थी. यह शोध स्पष्ट करता है कि सफलता का संबंध केवल आईक्यू (IQ) से नहीं, बल्कि आत्म-संयम से भी है.

अक्सर देखा गया है कि 99% अंक लाने वाले बच्चे जब किसी परीक्षा या नौकरी के इंटरव्यू में असफल होते हैं, तो वे आत्मघाती कदम उठाने या गहरे अवसाद में चले जाते हैं. इसका मुख्य कारण यह है कि उनके माता-पिता ने उन्हें केवल ‘जीतना’ सिखाया, ‘हारना’ या ‘ना सुनना’ नहीं.

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, बच्चे को ‘ना’ कहना एक प्रकार का ‘इमोशनल वैक्सीनेशन’ है. जैसे टीका शरीर को बीमारी से लड़ने की ताकत देता है, वैसे ही ‘ना’ सुनना बच्चे की भावनात्मक प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है. जब आप उसे खिलौने या बाहर जाने के लिए मना करते हैं, तो वह बोरियत और अभाव में अपनी रचनात्मकता का उपयोग करना सीखता है. यह अभाव ही उसे भविष्य में संसाधनों का सही उपयोग करना सिखाता है.

इन बातों का रखें ख्‍याल- हालांकि पैरेंटिंग विशेषज्ञों का सुझाव है कि ‘ना’ कहते समय माता-पिता को कठोर होने की जरूरत नहीं, बल्कि सही तर्क देना जरूरी है. बच्चे को यह समझाना जरूरी है कि ‘ना’ का मतलब उसे प्यार न करना नहीं है, बल्कि यह उसकी भलाई के लिए है. उसे यह अहसास कराएं कि हर इच्छा का तुरंत पूरा होना जरूरी नहीं है. इससे बच्चे में धैर्य (Patience) विकसित होता है, जो आज की दुनिया में न के बराबर होता जा रहा है.

माता-पिता को यह समझना होगा कि उनकी जिम्मेदारी बच्चे को केवल एक ‘मार्केटिंग प्रोडक्ट’ या ‘स्कोरिंग मशीन’ बनाने की नहीं है. एक मजबूत पर्सनैलिटी वह है जो ‘ना’ को शालीनता से स्वीकार करे और फिर से उठ खड़ा हो. अगर आप चाहते हैं कि आपका बच्चा भविष्य में एक लीडर बने, तो आज उसे ‘ना’ की ताकत सिखाएं. याद रखें, एक फ्लेक्सिवल माइंड (Resilient Mind) हमेशा एक टॉपर दिमाग से बेहतर परिणाम देता है.

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टॉपर बच्चा भी जिंदगी में हो सकता है फेल! अगर आपने उसे ‘ना’ सुनना नहीं सिखाया

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