नई दिल्ली (IITian Story). बिहार की राजधानी पटना के पास बाढ़ जैसे छोटे से कस्बे से निकलकर सात समंदर पार लॉस एंजिल्स में ‘बिहारी चाय-गाय’ बन जाना, कोई मामूली बात नहीं है. प्रभाकर प्रसाद की कहानी उस अदम्य साहस की है, जो अभावों में भी हारना नहीं सीखती. एक वक्त था जब कड़कड़ाती ठंड में उनके पास ओढ़ने को रजाई नहीं थी और परिवार दाल की बोरियां ओढ़कर रातें काटता था. आज वही प्रभाकर अमेरिका की सड़कों पर ₹730 की चाय बेच रहे हैं. लेकिन यह कहानी सिर्फ पैसों की नहीं, बल्कि उस आजादी की है, जिसकी तलाश में उन्होंने सिक्योर कॉर्पोरेट करियर को तिलांजलि दे दी.
गरीबी की भट्टी में तपा बचपन
प्रभाकर प्रसाद का जन्म गंगा किनारे बसे बिहार के बाढ़ कस्बे में एक बेहद गरीब परिवार में हुआ था. आर्थिक तंगी का आलम यह था कि उनके पिता के कई बिजनेस फेल हो चुके थे. बुनियादी सुविधाओं के अभाव में पूरा परिवार सर्दियों में अनाज की खाली बोरियां ओढ़कर सोता था. इन सबके बावजूद, प्रभाकर के माता-पिता ने शिक्षा को सबसे ऊपर रखा. उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई हिंदी मीडियम स्कूल से की, जहां वे पढ़ाई के साथ-साथ क्रिकेट और गायकी में भी अव्वल थे.
बिहार से भोपाल और फिर IIT की सीढ़ी
प्रभाकर प्रसाद की जिंदगी में एक मोड़ तब आया, जब उनके भाई के अपहरण की कोशिश हुई. सुरक्षा कारणों से परिवार को रातों-रात बिहार छोड़कर भोपाल शिफ्ट होना पड़ा. यहां की चुनौती अलग थी- हिंदी मीडियम के छात्र को अचानक इंग्लिश मीडियम के माहौल में डाल दिया गया. क्लास में बच्चे उनके ‘एक्सेंट’ का मजाक उड़ाते थे. लेकिन प्रभाकर ने हार नहीं मानी, खूब मेहनत की और आखिरकार IIT स्क्रीनिंग क्लियर कर ली. डिग्री लेने के बाद उन्होंने नौकरी की और कुछ समय मुंबई में मॉडलिंग भी.
अमेरिका का सफर और नाकामियों से जंग
अपनी तत्कालीन गर्लफ्रेंड के पास जाने की चाहत में प्रभाकर ने अमेरिका का रुख किया. दो बार वीजा रिजेक्ट होने के बाद तीसरी कोशिश में सफलता मिली और 2014 में वे एमबीए के लिए टेक्सास पहुंचे. अमेरिका में भी सफर आसान नहीं था. अकेलापन, दर्दनाक ब्रेकअप, हेल्थ इश्यूज और कई बार नौकरी से निकाला जाना-प्रभाकर प्रसाद ने असफलता का हर कड़वा स्वाद चखा. 2025 की शुरुआत में जब टेक सेक्टर में छंटनी हुई तो उनकी नौकरी फिर चली गई.
चाय की चुस्की में मिला सुकून
बेरोजगारी के अंधेरे दौर में प्रभाकर ने खुद से एक सवाल किया- मेरी जिंदगी में वो क्या है जो हमेशा साथ रहा? जवाब मिला ‘चाय’. चाहे दुख हो या खुशी, भारत की याद हो या अमेरिका का सन्नाटा, चाय उनके लिए हमेशा थेरेपी की तरह रही. उन्होंने इसी शौक को बिजनेस बनाने का जोखिम उठाया. लॉस एंजिल्स की सड़कों पर जब उन्होंने पारंपरिक बिहारी अंदाज में चाय बेचना शुरू किया तो अमेरिकियों को वह स्वाद और प्रभाकर का सादगी भरा अंदाज भा गया.
पैसा कम, सुकून और आजादी ज्यादा
प्रभाकर प्रसाद को अपनी पहचान ‘चायवाला’ कहलाने में गर्व महसूस होता है. वे कहते हैं कि कॉर्पोरेट की 9 से 5 वाली नौकरी ने उन्हें पैसा तो दिया लेकिन चैन छीन लिया था. आज वे अपनी मर्जी के मालिक हैं. हालांकि उनकी ChaiGuy वाली डिजिटल पहचान से सीधी कमाई नहीं होती लेकिन यह उनके बिजनेस के लिए बेहतरीन मार्केटिंग टूल बन गई है. उनकी कहानी हर उस युवा के लिए सबक है जो अपनी वर्तमान स्थिति से नाखुश है- किस्मत बदलने के लिए कभी-कभी अपनी जड़ों की तरफ लौटना ही सबसे बड़ा कदम होता है.
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