आपका बच्चा भी मोबाइल से रहता है चिपका, तो हो जाएं सावधान, बन रहा साइलेंट खतरा, ऐसे छुड़ाएं लत

नैनीताल. आज के डिजिटल युग में मोबाइल फोन हमारी जिंदगी का अभिन्न हिस्सा बन चुका है. पढ़ाई, मनोरंजन, जानकारी और संपर्क हर जरूरत मोबाइल से पूरी हो रही है. लेकिन इसी सुविधा के बीच एक गंभीर सवाल भी खड़ा हो रहा है कि कहीं माता-पिता अनजाने में अपने बच्चों को एक “साइलेंट खतरे” की ओर तो नहीं धकेल रहे हैं? छोटे बच्चों के हाथ में मोबाइल और टैबलेट अब आम नज़ारा बन चुका है, जो आने वाले समय में उनके भविष्य के लिए चुनौती बन सकता है.

डॉक्टरों का मानना है कि कम उम्र में जरूरत से ज्यादा मोबाइल और स्क्रीन का उपयोग बच्चों के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास पर गहरा असर डाल रहा है. लंबे समय तक स्क्रीन देखने से आंखों की रोशनी कमजोर होना, सिरदर्द, नींद न आना, गर्दन और पीठ दर्द जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं. इसके साथ-साथ शारीरिक गतिविधियां कम होने से मोटापा और आलस्य भी तेजी से बढ़ रहा है, जो आगे चलकर गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है.

मानसिक बीमारियों को जन्म दे रही स्क्रीन

नैनीताल के बीडी पांडे जिला अस्पताल में तैनात मनोचिकित्सक डॉ. गरिमा कांडपाल बताती हैं कि आजकल अस्पताल में आने वाले मामलों में बच्चों का बढ़ता स्क्रीन टाइम एक बड़ी वजह बन रहा है. उन्होंने बताया कि जिन बच्चों का स्क्रीन टाइम ज्यादा होता है, उनकी ध्यान अवधि यानी अटेंशन स्पैन प्रभावित हो जाती है. ऐसे बच्चे किसी भी चीज़ पर लंबे समय तक फोकस नहीं कर पाते, जिसका सीधा असर उनकी पढ़ाई और सीखने की क्षमता पर पड़ता है. डॉ. गरिमा के अनुसार मानसिक स्तर पर भी इसके गंभीर दुष्प्रभाव देखने को मिल रहे हैं. मोबाइल और डिजिटल गेम्स की अधिकता से बच्चों में चिड़चिड़ापन, गुस्सा, बेचैनी और अकेलेपन की भावना बढ़ रही है. सोशल मीडिया और वीडियो देखने की आदत बच्चों को वास्तविक दुनिया से दूर कर रही है. वे दोस्तों के साथ बाहर खेलना, परिवार के साथ समय बिताना और रचनात्मक गतिविधियों में हिस्सा लेना कम कर रहे हैं, जिससे उनका सामाजिक विकास बाधित हो रहा है. उन्होंने यह भी बताया कि जिन बच्चों को पहले से ही न्यूरो-संबंधित समस्याएं हैं, उनके लिए कम उम्र में स्क्रीन देखना और भी ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता है. ऐसे बच्चों को आगे चलकर व्यवहारिक और मानसिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है.

माता-पिता की लापरवाही बन रही वजह

आज की व्यस्त जीवनशैली भी इस समस्या को बढ़ा रही है. डॉ. गरिमा बताती हैं कि कई माता-पिता बच्चों को शांत रखने या खुद के काम निपटाने के लिए उनके हाथ में मोबाइल या टैबलेट थमा देते हैं. धीरे-धीरे बच्चों को इसकी आदत लग जाती है. स्थिति यहां तक पहुंच जाती है कि कई बच्चे मोबाइल देखे बिना खाना तक नहीं खाते. यह आदत आगे चलकर बेहद गंभीर रूप ले सकती है. एक ओर जहां बच्चों का मन पढ़ाई में नहीं लगता, वहीं दूसरी ओर उनके अकादमिक करियर पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. उन्होंने बताया कि अस्पताल में रोजाना ऐसे कई मामले सामने आ रहे हैं, जिनमें 1 साल से लेकर 6 साल तक के बच्चे शामिल हैं. इतनी कम उम्र में स्क्रीन से जुड़ाव बच्चों के संपूर्ण विकास के लिए खतरे की घंटी है.

कैसे बचाएं बच्चों को ?

डॉ. गरिमा कांडपाल का कहना है कि इस समस्या का सबसे बड़ा और प्रभावी इलाज माता-पिता की जागरूकता है. बच्चों को मोबाइल देने के बजाय उन्हें खिलौने, किताबें और रचनात्मक गतिविधियों से जोड़ना चाहिए। माता-पिता को बच्चों के साथ समय बिताना, उन्हें पार्क, घूमने या खेलकूद के लिए बाहर ले जाना चाहिए. उन्होंने साफ तौर पर कहा कि 6 साल तक के बच्चों को मोबाइल फोन से पूरी तरह दूर रखना चाहिए. बच्चों की अतिरिक्त देखभाल, प्यार और सही दिशा में मार्गदर्शन ही उनके बेहतर और सुरक्षित भविष्य की नींव रख सकता है.

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