Last Updated:
4 Test for early detection : कैंसर आज भी इस धरती की सबसे खतरनाक बीमारी मानी जाती है. आज भी इसका पूरी तरह इलाज नहीं है. कैंसर की कई दवाएं आ गई हैं. बहुत हद तक इसका इलाज हो भी जाता है लेकिन पूरी तरह इसका इलाज नहीं है. इसलिए इसकी शुरुआती पहचान बहुत जरूरी है. डॉक्टर कैंसर को पहले से पहचानने के लिए 4 टेस्ट के बारे में बता रहे हैं.
4 Test for early detection : कैंसर जब किसी को होती है तो यह बाहर से नहीं आती. शरीर की कोशिकाएं ही कैंसर कोशिकाओं में बदल जाती है. इसे बदलने में सालों लग जाता है. यानी कैंसर को पूरी तरह बीमारी बनने 5-7 या 10 साल भी लग सकता है. इस दौरान कैंसर का एक भी लक्षण नहीं दिखता. दर्द, खून आना या वजन कम होना जैसे लक्षण तब दिखाई देते हैं जब बीमारी काफी आगे बढ़ चुकी होती है. ऐसे समय तक पहुंचने पर इलाज कठिन हो जाता है और जीवित रहने की उम्मीद भी कम हो सकती है.ऐसे में सवाल यह है कि क्या कैंसर का पहले से पता लगाया जा सकता है. क्योंकि अधिकांश कैंसर का इलाज तभी संभव है जब उसका पहले से पता लग जाए. कोलोरेक्टल और फेफड़ों के कैंसर जैसे रोगों को शुरुआती चरण में पकड़ लेने से औसतन कई महीनों-सालों तक जीवन बढ़ सकता है. यदि इसे ट्यूमर स्थानीय स्तर पर पकड़ा जाए तो इलाज से ठीक होने की संभावना बहुत अधिक होती है. चूंकि किसी हेल्दी कोशिका को कैंसर कोशिका में बदलने में सालों लग जाता है, इसलिए आधुनिक तकनीकें इस बात की जांच करती है कि कोशिकाओं में कोई बदलाव हो रहा है या नहीं. इससे टिश्यू में शुरुआती प्री-कैंसरस बदलाव ढूंढना संभव हो पाया है. यानी अगर कोशिका और उसके अंदर के डीएनए में बदलाव हो रहा है तो क्या यह कैंसर कोशिका में बदल जाएगा, इसकी जांच से पता चल सकता है. ऐसे में उस खास टिशू को निकालकर बाहर कर दिया जाएगा जिससे कैंसर होगा ही नहीं. इसके लिए डॉ. वास ने ऐसी 4 तरह की जांचों की सलाह दी है.
कैंसर का पहले पता लगाने के लिए चार जांचें
1. स्टैंडर्ड स्क्रीनिंग टेस्ट-इसमें कई टेस्ट आ जाते हैं जो 25 साल के बाद हर वयस्क को कराना चाहिए. इसमें ब्रेस्ट कैंसर के लिए मैमोग्राम, सर्वाइकल कैंसर के लिए पैप और एचपीवी टेस्ट, कोलोरेक्टल कैंसर के लिए कोलोनोस्कोपी या स्टूल टेस्ट, स्मोक करने वालों में फेफड़ों के लिए लो-डोज़ सीटी स्कैन और प्रोस्टेट कैंसर के लिए पीएसए टेस्ट शामिल है. दरअसल, इन टेस्ट से शुरुआती चरण के कैंसर या प्री-कैंसरस बदलावों को जाना जा सकता है. जैसे यदि किसी को गुदा मार्ग वाला कोलोन कैंसर होगा तो उसके कोलन पॉलिप्स होना शुरू हो जाएगा. इसी तरह महिलाओं में अगर सर्वाइकल कैंसर होगा तो गर्भाश्य ग्रीवा में पोलिप होने लगेगा. यह कोशिकाओं का गुच्छा है जिसमें कैंसर वाला बदलाव होना शुरू हो जाता है. यह टेस्ट इसका पता लगा लेता है. उदाहरण के लिए कोलोनोस्कोपी को गोल्ड स्टैंडर्ड कहा जाता है, क्योंकि यह न केवल प्रीकैंसरस पॉलिप्स का पता लगाती है बल्कि उन्हें हटाती भी है, जिससे भविष्य में कोलोरेक्टल कैंसर का जोखिम सीधे कम हो जाता है.
xr:d:DAF2lgMz1Y8:317,j:4120081085137637277,t:23122418
2. गैलेरी और मल्टी-कैंसर ब्लड टेस्ट-गैलेरी टेस्ट एक मल्टी-कैंसर अर्ली डिटेक्शन ब्लड टेस्ट है, जो किसी एक विशेष प्रकार के ट्यूमर को खोजने की बजाय कैंसर कोशिकाओं द्वारा रक्त में छोड़े जाने वाले सेल-फ्री डीएनए में असामान्य पैटर्न को खोजता है. पाथ फाइंडर 2 जैसे बड़े स्क्रीनिंग अध्ययनों में पाया गया कि नियमित स्क्रीनिंग के साथ गैलेरी टेस्ट जोड़ने से एक वर्ष के भीतर कैंसर की पहचान सात गुना से भी अधिक बढ़ गई और इनमें से लगभग तीन-चौथाई कैंसर ऐसे थे जिनके लिए वर्तमान में कोई मानक स्क्रीनिंग उपलब्ध नहीं है. MCED टेस्ट सीधे कैंसर को रोक नहीं सकता लेकिन वे उन छिपे हुए और आक्रामक ट्यूमर को कई साल पहले पकड़ सकते हैं. यह अंडाशय, किडनी या गले में होने वाले कैंसर को पहले पकड़ लेता है.
3. जेनेटिक टेस्टिंग-यह टेस्ट उन लोगों के लिए है जिनके परिवार में पहले से किसी न किसी को कैंसर हुआ है. यह टेस्ट जीन-म्यूटेशन को खोजती है जो कैंसर के जोखिम को बढ़ाता है. जैसे BRCA1/2, TP53 और अन्य जीन जो जीवनभर स्तन, अंडाशय, कोलोरेक्टल और कई अन्य कैंसरों का खतरा काफी बढ़ा देते हैं. इमेजिंग या ब्लड टेस्ट के विपरीत यह जांच आमतौर पर जीवन में एक बार की जाती है और यह किसी भी कोशिका में प्री-कैंसरस बदलाव आने से बहुत पहले ही जोखिम का पता लगा सकती है. इससे स्क्रीनिंग और रोकथाम जल्दी शुरू की जा सकती है और अधिक गहन की जा सकती है. जिन लोगों को जीन संबंधी सिंड्रोम है, उनके लिए भी यह टेस्ट जरूरी है. जैसे हेरिडिटरी ब्रेस्ट–ओवेरियन–पैंक्रियाटिक सिंड्रोम या हेरिडिटरी कोलोरेक्टल–एंडोमेट्रियल–गैस्ट्रिक कैंसर सिंड्रोम.
xr:d:DAFywrjeD18:4,j:8136160382302188283,t:23103018
4. फुल-बॉडी एमआरआई- Whole-body MRI एक इमेजिंग टेस्ट है जो सिर से लेकर कमर तक और अक्सर हाथ-पैरों सहित पूरे शरीर को एक ही बार में स्कैन करता है. इसमें रेडिएशन नहीं होता, और इसका उद्देश्य शरीर में कहीं भी मौजूद ट्यूमर को खोज निकालना होता है.वर्तमान दिशानिर्देश में फुल बॉडी एमआरआई की सलाह मुख्य रूप से उन लोगों के लिए देते हैं जिनमें कैंसर का बहुत अधिक अनुवांशिक जोखिम होता है. ज्यादा खतरे वाले लोगों पर किए गए अध्ययनों से पता चला है कि WB-MRI ऐसे महत्वपूर्ण और अक्सर बिना लक्षण वाले कैंसर पकड़ सकता है जिन्हें अन्य इमेजिंग में नहीं देखा जाता. इस जांच से ऐसे मरीजों में इलाज की संभावना बढ़ जाती है. हालांकि ये सारे टेस्ट ऐसे नहीं है कि हर साल कराने चाहिए. ये टेस्ट डॉक्टरों की सलाह पर कराने चाहिए.
About the Author
Excelled with colors in media industry, enriched more than 19 years of professional experience. Lakshmi Narayan is currently leading the Lifestyle, Health, and Religion section at News18. His role blends in-dep…और पढ़ें