दिवाली यानि 20 अक्टूबर की रात जबरदस्त आतिशबाजी और पटाखाबाजी के बाद से दिल्ली में हवा की सेहत खराब है. एक्यूआई 400 के पार पहुंचा हुआ है. आसमान में दो दिनों से स्मॉग है. मौसम अजीब सा फील हो रहा है. जब हवा इस कदर खराब हो जाए तो मूड और ब्रेन पर जबरदस्त असर पड़ता है. हवा की ये खराब सेहत दिमागी तंदुरुस्ती को खराब कर सकती है. साइंस और मेडिकल शोध कहते हैं कि उदासी, चिंता, घबराहट, गुस्सा आप पर हावी होने लगता है. चिड़चिड़ापन बढ़ सकता है.
जब हवा का AQI स्तर ज्यादा होता है यानि हवा में प्रदूषण बढ़ जाता है तो ये ब्रेन में रिलीज होने वाले सेरोटोनिन और डोपामाइन जैसे मस्तिष्क रसायनों को बाधित कर सकता है, जिससे अवसाद, चिंता और मूड संबंधी समस्याएं बढ़ जाती हैं. इससे तनाव हार्मोन जैसे कोर्टिसोल का स्तर बढ़ता है, जो नींद की गड़बड़ी और भावनात्मक अस्थिरता पैदा करता है.
अध्ययनों से पता चलता है कि उच्च प्रदूषण स्तर पर आत्महत्या, स्व-क्षति और अन्य मानसिक स्वास्थ्य जोखिम बढ़ जाते हैं, खासकर बच्चों और युवाओं में जहां मस्तिष्क विकासशील होता है.
जब AQI 400+ हो तो हवा में क्या होता है
हवा में PM2.5 और PM10 कणों की मात्रा बहुत बढ़ जाती है. ये इतने सूक्ष्म होते हैं कि फेफड़ों की झिल्ली पार करके रक्त प्रवाह में पहुंच जाते हैं. इनके साथ नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, ओज़ोन और कार्बन मोनोऑक्साइड जैसी गैसें भी शामिल होती हैं. ये कण ब्रेन-ब्लड बैरियर को पार करके सीधे मस्तिष्क के न्यूरॉन्स को प्रभावित कर सकते हैं.
ब्रेन पर क्या असर होता है
कई न्यूरोसाइंस स्टडीज़ मसलन हार्वर्ड, कोलंबिया यूनिवर्सिटी और लेंसेट न्यूरोलॉजी के जर्नल में प्रकाशित शोध के अनुसार ये असर होता है
– मेमोरी और एलर्टनेस में गिरावट होती है
– लगातार 2–3 दिन तक AQI 400+ रहने पर दिमाग में धुंध छा जाती है.
– ध्यान केंद्रित करना कठिन होता है, छोटी-छोटी बातें भूलने लगते हैं.
– – हवा में प्रदूषण से सेरोटोनिन और डोपामिन का स्तर गिरता है. इससे उदासी या चिड़चिड़ापन बढ़ता है, थकान महसूस होती है, चीज़ों में रुचि कम होती है.
क्या इससे दिमाग के अंदर सूजन भी आ सकती है
PM2.5 कण दिमाग में इंफ्लेमेटरी सिटोकाइंस को सक्रिय करते हैं, जिससे मस्तिष्क में सूजन आती है. इसका असर अल्जाइमर और पार्किसंस जैसी बीमारियों के रिस्क को बढ़ा सकता है.
क्या इससे नींद पर भी असर पड़ता है
हां, प्रदूषित हवा से ऑक्सीजन लेवल घटता है. नाक बंद रहती है. गहरी नींद नहीं आती. नींद पूरी न होने से मूड और भी बिगड़ता है.
मूड और मानसिक स्वास्थ्य पर क्या असर
वर्ल्ड हेल्थ आर्गनाइजेशन और येल स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ की 2023 रिपोर्ट में पाया गया कि AQI 300–500 के दौरान लोगों में एंग्जायटी और डिप्रेशन के केस 15–20% तक बढ़ जाते हैं. सोशल मीडिया डेटा के अनुसार. थकान, गुस्सा और उदासी बढ़ जाती है. बच्चों और बुर्जुर्गों में चिड़चिड़ाहट और कंफ्यूजन ज्यादा होने लगते हैं.
बीजिंग में वर्ष 2021 में एक चीनी अध्ययन में पाया गया कि जब AQI 400 से ऊपर जाता है तो कॉलेज छात्रों का मूड इंडैक्स औसतन 30% तक गिर जाता है.
– दिमाग स्ट्रैस रिस्पांस एक्टिव करता है, जिससे कोर्टिसोल बढ़ता है, तनाव और चिंता महसूस होती है.
– हार्ट रेट बढ़ता है, बेचैनी, सिरदर्द और थकान महसूस होती है. ये सब मिलकर लो मूड और मेंटल फटीग की वजह बनते हैं.
– हवा में प्रदूषण से सेरोटोनिन और डोपामिन का स्तर गिरता है. इससे उदासी या चिड़चिड़ापन बढ़ता है, थकान महसूस होती है, चीज़ों में रुचि कम होती है.
अगर लंबे समय तक ऐसा रहे तो
अगर हवा की ये स्थिति लंबे समय तक बनी रहे तो ये खतरनाक हो जाता है.
– धीरे-धीरे दिमागी कार्यक्षमता में गिरावट होती है
– उदासी और चिड़चिड़ाहट घेर लेती है
– ब्रेन एजिंग में तेजी देखी गई है.
हार्वर्ड के एक अध्ययन (2020) में पाया गया कि जिन शहरों में साल में 60 दिन से ज़्यादा AQI 300+ रहता है, वहां के लोगों की दिमागी क्षमता घट जाती है और 5 साल की उम्र घट जाती है.
जब AQI 400+ हो तो क्या करें
– सुबह या शाम की सैर बंद करें
– एयरटाइट खिड़कियां बंद रखें
– ध्यान करें. इससे कोर्टिसोल कम होता है.