HIV पॉजिटिव मरीज को हो जाए गुर्दे की बीमारी, तो क्या किडनी ट्रांसप्लांट हो सकता है?

Kidney Transplant in HIV Positive: जैसे-जैसे खतरनाक बीमारियां बढ़ रही हैं, उनकी काट भी खोजी जा रही है. मॉडर्न मेडिकल साइंस इन बीमारियों का इलाज भी ढूंढ रही है. ऐसी ही एक बीमारी है एचआईवी यानि एड्स, जो एक बार होने के बाद दवाओं से कंट्रोल की जाती है लेकिन कभी ठीक नहीं हो सकती, हालांकि सबसे ज्यादा खतरा तब होता है जब एचआईवी पॉजिटिव मरीज को कोई और गंभीर बीमारी भी हो जाए. ऐसी स्थिति में मरीज के इम्यून सप्रेशन को संभालना काफी कठिन होता है क्योंकि ऐसे मरीज संक्रमण के जल्दी शिकार होते हैं. ऐसे कई बार मरीज सवाल करते हैं कि अगर किसी एचआईवी पॉजिटिव मरीज को किडनी की बीमारी हो जाए तो क्या ऐसे मरीज का किडनी ट्रांसप्लांट हो सकता है? आइए जानते हैं इसका जवाब..

एचआईवी पॉजिटिव मरीज का किडनी टांसप्लांट करना काफी कॉम्पलेक्स केस होता है, लेकिन अब यह करना संभव है. हाल ही में नई दिल्ली के पटपड़गंज अस्पताल में डॉक्टरों ने एचआईवी-पॉजिटिव मरीज का किडनी ट्रांसप्लांट किया है. आज एडवांस्ड मेडिकल केयर की वजह से यह संभव हो सकता है.

बता दें कि मैक्स पटपड़गंज के डॉक्टरों ने एथियोपिया के रहने वाले एक 43-वर्षीय एचआईवी-पॉजिटिव मरीज का लिविंग डोनर किडनी ट्रांसप्लांट सफलतापूर्वक किया है. यह एचआईवी के साथ एंड-स्टेज किडनी डिसीज से जूझ रहे मरीजों के इलाज की दिशा में बड़ी सफलता और उम्मीद है.

10 साल से पॉजिटिव था मरीज
विदेश से आए इन मरीज को पिछले 10 साल से एचआईवी की बीमारी थी. वहीं 3 साल पहले एंड-स्टेज किडनी डिसीज हो गई. तभी से इन्हें लगातार डायलिसिस कराना पड़ रहा था. वहां पर्याप्त इलाज न होने पर ये एडवांस्ड ट्रीटमेंट के लिए भारत आए. यहां मैक्स पटपड़गंज की ट्रांसप्लांट टीम ने उनकी जांच और इलाज किया.

सर्जरी से पहले मरीज की पूरी जांच की गई, ताकि स्टेबल इम्यून प्रोफाइल और अनडिटेक्टेबल वायरल लोड समेत एचआईवी का ऑप्टिमल कंट्रोल तय हो सके. फिर नेफ्रोलॉजिस्ट, ट्रांसप्लांट सर्जन और इन्फेक्शियस डिसीज स्पेशलिस्ट की मल्टी-डिसिप्लिनरी टीम ने मरीज के ट्रीटमेंट का प्लान तैयार किया.

किडनी डोनेट करने के लिए मरीज की 33 वर्षीय पत्नी सामने आई. कम्पैटिबिलिटी टेस्टिंग, ब्लड ग्रुप मैचिंग और निगेटिव क्रॉस-मैच चेक करने के बाद टीम ने ट्रांसप्लांट किया.

इन मरीजों में आती है कठिनाई
एचआईवी-पॉजिटिव मरीजों में किडनी ट्रांसप्लांट करना हमेशा से बड़ी चुनौती रहा है, क्योंकि इन मरीजों में इन्फेक्शन और इम्यून सप्रेशन को संभालना होता है. हालांकि एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी और ट्रांसप्लांट प्रोटोकॉल में हुई प्रगति से अब कुछ मामलों में इस तरह की सर्जरी काफी सुरक्षित हो गई है.

इस बारे में रोबोटिक सर्जरी एंड रीनल ट्रांसप्लांट के सीनियर डायरेक्टर डॉ. परेश जैन ने बताया कि एचआईवी-पॉजिटिव मरीज में किडनी ट्रांसप्लांट करने के लिए बारीक दृष्टिकोण की जरूरत होती है, क्योंकि ऐसे मामले में एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी के साथ इम्यूनोसप्रेशन को बैलेंस करना बहुत कठिन होता है. इस केस में ट्रांसप्लांट के पहले सावधानी से मूल्यांकन किया गया, सटीक तरीके से सर्जरी की गई और ऑपरेशन के बाद पूरी निगरानी की गई, ताकि सही नतीजा मिल सके. यह सर्जरी दिखाती है कि ट्रांसप्लांट के मामले में विज्ञान कितना आगे बढ़ गया है और किस तरह से सर्जिकल विशेषज्ञता से हम ऐसे मरीजों में भी जीवन रक्षक ट्रांसप्लांट कर सकते हैं, जिनके लिए पहले सर्जरी में बहुत ज्यादा खतरे की आशंका रहती थी.’

वहीं ट्रांसप्लांट फिजिशियन डॉ. रवि कुमार सिंह ने कहा कि अगर सही तरह से मैनेज किया जाए तो ऑर्गन ट्रांसप्लांटेशन के मामले में एचआईवी बड़ी रुकावट नहीं रह गई है. सेलेक्शन के सख्त मानकों और विभिन्न विभागों में तालमेल के साथ सही तरह से एचआईवी को नियंत्रण में रखने वाले मरीजों को भी ट्रांसप्लांट के मामले में अन्य सामान्य लोगों जैसा ही फायदा मिल सकता है.

मरीज का बंद हुआ डायलिसिस
ट्रांसप्लांट के बाद मरीज की रिकवरी अच्छी हुई है. उनकी डायलिसिस रोक दी गई है और वह धीरे-धीरे रोजाना की सामान्य गतिविधियां कर पा रहे हैं. इम्यूनोसप्रेशिव और एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी के साथ ध्यान से उनकी निगरानी की जा रही है.

यह मामला ट्रांसप्लांट मेडिसिन के मामले में बढ़ती संभावनाओं को दिखाता है. साथ ही इसने एडवांस्ड इन्फ्रास्ट्रक्चर और कोलैबोरेटिव क्लीनिकल केयर के माध्यम से हाई-रिस्क और कॉम्प्लेक्स मामलों को मैनेज करने में मैक्स हॉस्पिटल की एक्सपर्टीज को भी मजबूत किया है.

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