हैदराबाद की सांस्कृतिक धरोहर: ऐवान-ए-उर्दू की किताबें और पांडुलिपियाँ

हैदराबाद.पंजागुट्टा इलाके में एक पुरानी इमारत है, जिसका नाम ऐवान-ए-उर्दू है. यह जगह अपनी खूबसूरत बनावट के लिए जानी जाती है, लेकिन इसकी असली खासियत यहाँ रखी गई किताबें और पुरानी चीज़ें हैं. यहाँ हजारों कीमती किताबें, पांडुलिपियाँ और कलाकृतियाँ रखी गई हैं, जो बहुत पुरानी हैं. लेकिन अब इस जगह को बचाने के लिए मदद की जरूरत है.

एक महत्वपूर्ण जगह

इसकी शुरुआत सन 1931 में डॉ. सैयद मोहिउद्दीन कादरी ज़ोर ने की थी. उनकी पत्नी, जो एक कवयित्री थीं, ने इसके लिए जमीन दान में दी थी. इसे सिर्फ़ एक लाइब्रेरी नहीं बल्कि एक सांस्कृतिक केंद्र के रूप में बनाया गया था. आज भी यहाँ लगभग 50,000 किताबें और 2,600 से अधिक पुरानी पांडुलिपियाँ हैं. ये किताबें उर्दू, फारसी, अरबी और गुरुमुखी भाषाओं में हैं और इनमें कविता, इतिहास, धर्म और दर्शन जैसे विषय शामिल हैं.

यहाँ एक संग्रहालय भी है, जहाँ पुराने सिक्के, शाही आदेश, पारंपरिक कपड़े, कैलीग्राफी की कलाकृतियाँ और स्थानीय शिल्प की चीज़ें रखी गई हैं. ये सभी चीज़ें हैदराबाद की संस्कृति को दर्शाती हैं.

शिक्षा का केंद्र
यह संस्थान उर्दू लिखावट और कैलीग्राफी सिखाने का काम भी करता है. यहाँ दो साल का मुफ्त डिप्लोमा कोर्स होता है, जिसमें अलग-अलग तरह की लिखावट सिखाई जाती है. अब तक 3,500 से ज्यादा छात्र यहाँ ट्रेनिंग ले चुके हैं. अब्दुल गफ्फार जैसे शिक्षक, जो पहले यहाँ के छात्र रहे हैं, अब दूसरों को पढ़ा रहे हैं.

एक लुप्त होती विरासत
दुर्भाग्य से यह अनमोल विरासत धीरे-धीरे खत्म हो रही है. किताबें पुरानी हो रही हैं, उनके पन्ने खराब हो रहे हैं और स्याही फीकी पड़ रही है. अगर इन्हें जल्द ही संभाला नहीं गया, तो हैदराबाद की यह कीमती धरोहर हमेशा के लिए खो सकती है. पहले दुनिया भर से लोग यहाँ आते थे, लेकिन अब यह चहल-पहल कम हो गई है.

उम्मीद की एक किरण

अच्छी खबर यह है कि रेख़्ता फाउंडेशन की मदद से यहाँ की 22,000 से ज्यादा किताबों और पत्रिकाओं को डिजिटल बनाया जा चुका है. अब इन्हें ऑनलाइन दुनिया में कहीं भी पढ़ा जा सकता है. इससे इन किताबों को सुरक्षित रखने में मदद मिली है. लेकिन डिजिटल किताबें असली किताबों का मज़ा नहीं दे सकतीं. असली किताबों को पढ़ने का अनुभव, उनकी खुशबू और पुराने कागज़ को छूने का अलग ही मज़ा होता है.

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