कैसे काम करता है इज़राइल का गॉस्पेल AI सिस्टम? जो सेकंडों में चुन लेता है बमबारी के टार्गे

आज के दौर में युद्ध केवल गोलियों और टैंकों से नहीं लड़ा जा रहा, बल्कि कंप्यूटर के बंद कमरों में लिखे गए ‘कोड’ और ‘एल्गोरिदम’ से तय हो रहा है. कल्पना कीजिए एक ऐसी मशीन की, जो पलक झपकते ही हजारों लोगों के डेटा को खंगाल लेती है और सेकंडों में यह बता देती है कि किस इंसान को टार्गेट बनाया है, या किस इमारत पर बम गिराना है. यह कोई साइंस-फिक्शन फिल्म की कहानी नहीं, बल्कि हकीकत है. इज़राइल की सेना एक ऐसे ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) सिस्टम का इस्तेमाल कर रही है, जिसका नाम है ‘हब्सोरा’ या ‘गॉस्पेल’.

यह सिस्टम युद्ध के मैदान में एक ‘डिजिटल आंख’ की तरह काम करता है, जो उन ठिकानों को चुनता है, जिन्हें इंसान शायद हफ्तों की मेहनत के बाद भी न ढूंढ पाएं. लेकिन क्या मशीन पर इतना भरोसा करना सही है? क्या एक सॉफ्टवेयर यह तय कर सकता है कि किसकी जान जानी चाहिए और किसकी नहीं? इस बारे में विवाद हैं, आलोचनाएं हैं, लेकिन इज़राइल इस तकनीक को धड़ल्ले से इस्तेमाल कर रहा है. आइए, समझते हैं कि यह ‘गॉस्पेल’ सिस्टम आखिर है क्या? और यह कैसे पूरी दुनिया के लिए चर्चा का विषय बन गया है.

क्या है गॉस्पेल? कैसे करता है काम?

‘गॉस्पेल’ या ‘हब्सोरा’ इज़राइल की सेना द्वारा विकसित एक अत्यंत शक्तिशाली AI आधारित सिस्टम है. इसे इज़राइल की प्रसिद्ध खुफिया इकाई ‘यूनिट 8200’ ने तैयार किया है. यह एक बहुत बड़ा ‘डेटा प्रोसेसिंग प्लांट’ है. यह सिस्टम दिन-रात काम करता है और अलग-अलग स्रोतों से जानकारी इकट्ठा करता है.

  • सैटेलाइट तस्वीरें: आसमान से ली गई हर छोटी-बड़ी हरकत की फोटो.
  • ड्रोन फुटेज: युद्ध क्षेत्र के ऊपर उड़ रहे ड्रोंस से मिलने वाला लाइव वीडियो.
  • इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल: मोबाइल फोन की बातचीत, रेडियो संदेश और इंटरनेट का इस्तेमाल.
  • पुराना रिकॉर्ड: दुश्मनों के ठिकानों का पुराना डेटाबेस.

यह AI सिस्टम इन लाखों जानकारियों को कुछ ही सेकंड में आपस में जोड़ता है. यह देखता है कि किस घर में संदिग्ध हलचल हो रही है, कहां हथियारों का भंडार हो सकता है या कहां से रॉकेट दागे जा सकते हैं. इसके बाद, यह सिस्टम उन जगहों की एक लिस्ट बनाता है और सेना के अधिकारियों को बमबारी के लिए सुझाव देता है.

इंसानों से 50 गुना तेज है इसकी रफ्तार

इज़राइल के इस नए AI सिस्टम की सबसे हैरान कर देने वाली खूबी इसकी अविश्वसनीय रफ्तार है, जो इंसानी दिमाग के मुकाबले कई गुना तेज काम करती है. अगर हम पुराने दौर की बात करें, तो सैन्य इंटेलिजेंस के करीब 20 अनुभवी अधिकारी नक्शों, तस्वीरों और खुफिया दस्तावेजों को खंगालकर साल भर की कड़ी मेहनत के बाद मुश्किल से 50 से 100 टार्गेट चुन पाते थे. लेकिन गॉस्पेल (Habsora) ने युद्ध के इस पारंपरिक तरीके को पूरी तरह बदल दिया है. जहां इंसानों को टार्गेट ढूंढने में महीनों लग जाते थे, वहीं यह सिस्टम महज 10 से 12 दिनों के भीतर 200 से ज्यादा सटीक सैन्य लक्ष्यों की पहचान कर लेता है.

आज की डिजिटल युद्ध नीति में इसकी क्षमता इतनी बढ़ चुकी है कि यह सिस्टम अकेले एक दिन में करीब 100 संभावित टार्गेट सुझाने की ताकत रखता है. यही कारण है कि इज़राइल सेना के भीतर इसे ‘टार्गेट फैक्ट्री’ के नाम से जाना जाता है. जैसे किसी आधुनिक कारखाने में मशीनों के जरिए सामान का उत्पादन बहुत तेजी से होता है, ठीक वैसे ही यह AI सिस्टम बिना थके और बिना रुके युद्ध के मैदान के लिए नए-नए लक्ष्यों की लिस्ट तैयार करता रहता है. तकनीकी रूप से देखें तो यह इंसानों की तुलना में लगभग 50 गुना अधिक प्रभावी साबित हो रहा है.

गाजा युद्ध में किया बड़े स्तर पर इस्तेमाल

इज़राइल ने इस सिस्टम का ट्रेलर 2021 के संघर्ष में दिखाया था, लेकिन 2023 के गाजा युद्ध में इसका बड़े पैमाने पर उपयोग हुआ. आंकड़ों की मानें तो, इस सिस्टम की मदद से इज़राइल सेना ने 12,000 से अधिक संभावित ठिकानों की पहचान की.

इतना ही नहीं, ‘गॉस्पेल’ के साथ एक और सिस्टम काम करता है जिसे ‘फायर फैक्ट्री’ (Fire Factory) कहते हैं. जैसे ही गॉस्पेल टार्गेट चुनता है, फायर फैक्ट्री यह तय करता है कि उस टार्गेट को उड़ाने के लिए कौन-सा फाइटर जेट जाएगा, कितने किलो का बम इस्तेमाल होगा और हमला किस समय किया जाएगा. यानी निशाना चुनने से लेकर हमला करने तक, सब कुछ कंप्यूटर की निगरानी में होता है.

गॉस्पेल और लैवेंडर में अंतर?

इज़राइल की सैन्य तकनीक में ‘गॉस्पेल’ और ‘लैवेंडर’ दो अलग-अलग हथियार हैं, जो एक-दूसरे के पूरक के रूप में काम करते हैं. इन दोनों के बीच के अंतर को समझना इसलिए जरूरी है क्योंकि इनका मकसद पूरी तरह अलग है. जहां ‘गॉस्पेल’ (Habsora) का मुख्य काम भौतिक ढांचों यानी इमारतों, कार्यालयों, सुरंगों या संदिग्ध घरों को टार्गेट के रूप में पहचानना है, वहीं लैवेंडर (Lavender) पूरी तरह से इंसानों पर केंद्रित है.

लैवेंडर सिस्टम की कार्यप्रणाली किसी डरावनी फिल्म जैसी लगती है. यह गाजा के लगभग 23 लाख निवासियों के डेटा को स्कैन करता है और एआई (AI) के जरिए हर व्यक्ति को 1 से 100 के बीच एक स्कोर देता है. यह स्कोर इस आधार पर तय होता है कि उस व्यक्ति की गतिविधियां किसी उग्रवादी संगठन से कितनी मिलती-जुलती हैं. जिस व्यक्ति का स्कोर ज्यादा होता है, उसे सिस्टम द्वारा ‘आतंकी’ की श्रेणी में डाल दिया जाता है. सीधे शब्दों में कहें तो, गॉस्पेल यह तय करता है कि ‘कहां’ बम गिराना है, जबकि लैवेंडर यह तय करता है कि ‘किसे’ निशाना बनाना है.

AI सिस्टम पर विवाद क्यों है?

जब कोई मशीन टार्गेट चुनती है, तो वह केवल डेटा देखती है, भावनाएं नहीं. और यही इस सिस्टम को विवादित बना देता है. आलोचकों का कहना है:

  • गलती की गुंजाइश: अगर किसी मासूम नागरिक का फोन गलती से किसी संदिग्ध के संपर्क में आ गया, तो AI उसे भी टार्गेट की लिस्ट में डाल सकता है.
  • कोलेटरल डैमेज: मशीन यह तो बता देती है कि इमारत में हथियार हैं, लेकिन वह यह नहीं देख पाती कि उस इमारत के बगल में बच्चे खेल रहे हैं या कोई अस्पताल है.
  • जवाबदेही की कमी: अगर AI की गलती से किसी बेगुनाह की जान जाती है, तो जिम्मेदार कौन होगा? वह सॉफ्टवेयर बनाने वाला इंजीनियर या वह अफसर जिसने केवल कंप्यूटर का बटन दबाया?

इज़राइल सेना का दावा बनाम आलोचना

विशेषज्ञों का कहना है कि हम एक ऐसे दौर में पहुंच गए हैं जहां युद्ध का फैसला OODA Loop (Observe, Orient, Decide, Act – यानी देखो, समझो, फैसला लो और हमला करो) पर टिका है. AI इस चक्र को इतना तेज कर देता है कि इंसान को सोचने का मौका ही नहीं मिलता.

इज़राइल सेना का दावा है कि अंतिम फैसला हमेशा एक इंसान ही लेता है, लेकिन आलोचकों का तर्क है कि जब सिस्टम हर मिनट दर्जनों टार्गेट दे रहा हो, तो एक इंसान के लिए हर टार्गेट को बारीकी से जांचना नामुमकिन है. वह बस मशीन पर भरोसा करके ‘ओके’ का बटन दबाता चला जाता है.

इज़राइल का ‘गॉस्पेल’ सिस्टम तकनीक की एक बड़ी कामयाबी तो है, लेकिन यह मानवता के लिए एक बड़ी चेतावनी भी है. यह युद्ध को ‘कुशल’ तो बना रहा है, लेकिन उसे ‘निर्दयी’ बनाने का जोखिम भी बढ़ा रहा है.

.

Share me..

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *