इजराइल की खुफिया एजेंसियों ने तेहरान के ट्रैफिक कैमरों को हैक करके एक बेहद खुफिया और बड़े ऑपरेशन को अंजाम दिया. इन कैमरों के जरिए ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनी और उनके करीबियों को ट्रैक किया गया. फिर उन्हीं जगहों पर बम गिराए गए और खामेनी को मार डाला गया. यह घटना साइबर सुरक्षा की दुनिया में एक बड़ा सबक है कि कैसे रोजमर्रा की साधारण दिखने वाली चीजें, खतरनाक खुफिया हथियार बन सकती हैं. चलिए समझते हैं कि हैकिंग का यह जाल कैसे बुना गया.
यह कोई रातों-रात किया गया काम नहीं था. इजराइल की टेक्नोलॉजी जासूसी यूनिट (जैसे यूनिट 8200) और खुफिया एजेंसी मोसाद ने सालों तक ईरान के ट्रैफिक कैमरा सिस्टम में सेंध लगाने का काम किया. उन्होंने तेहरान की सड़कों पर लगे कैमरों को अपने कंट्रोल में ले लिया और उनकी लाइव वीडियो फीड (तस्वीरें) खुफिया तरीके से सीधे इजराइल पहुंचने लगीं.
उन्होंने अपना ध्यान खास तौर पर उन कैमरों पर लगाया जो बड़े अधिकारियों, उनके बॉडीगार्ड्स और ड्राइवरों की पार्किंग के आस-पास लगे थे. रोजमर्रा की इन फुटेज को देखकर इजराइल ने अधिकारियों की दिनचर्या का एक पूरा खाका तैयार कर लिया. उन्हें पता चल गया कि कौन अधिकारी किस समय घर से निकलता है, किस रास्ते से जाता है और उसकी ड्यूटी का समय क्या है. जासूसी की दुनिया में इसे “पैटर्न ऑफ लाइफ” समझना कहते हैं. इसी पुख्ता जानकारी के आधार पर इजराइल ने पाश्चर स्ट्रीट के पास एक मीटिंग के दौरान सटीक हमला किया.
आखिर कैमरे हैक कैसे होते हैं?
ट्रैफिक कैमरे असल में इंटरनेट से जुड़ी मशीनें होती हैं. अगर इनका नेटवर्क या पासवर्ड कमजोर हो, तो हैकर्स के लिए इनमें घुसना बहुत आसान हो जाता है. इसके लिए मुख्य रूप से तीन तरीके अपनाए जाते हैं:
- डिजिटल सेंधमारी (वायरस के जरिए): हैकर्स किसी फर्जी ईमेल या कमजोर सॉफ्टवेयर अपडेट के जरिए कैमरा सिस्टम में एक छिपा हुआ वायरस (मैलवेयर) डाल देते हैं. यह वायरस बिल्कुल एक घुसपैठिए की तरह काम करता है, जो अंदर बैठकर चुपचाप कैमरों की वीडियो फीड को इजराइल के सर्वर पर भेजता रहता है.
- कमजोर लॉक का फायदा उठाना: कई बार कैमरे बहुत पुराने सॉफ्टवेयर पर चलते हैं या उनका पासवर्ड कंपनी की तरफ से सेट किया गया बहुत आसान सा शब्द (जैसे admin) होता है. हैकर्स इसी पुरानी खामी या कमजोर पासवर्ड का फायदा उठाकर घर बैठे कैमरों का पूरा कंट्रोल अपने हाथ में ले लेते हैं.
- बीच रास्ते में डेटा चुराना: इसे ‘मैन-इन-द-मिडल’ अटैक कहते हैं. यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे डाकिया आपकी चिट्ठी आप तक पहुंचने से पहले बीच रास्ते में ही पढ़ ले. हैकर्स कैमरे और उसके मेन सर्वर के बीच हो रही बातचीत को बीच में ही रोक कर उसका डेटा चुरा लेते हैं.
AI के इस्तेमाल से डेटा को समझना
हजारों कैमरों की लाखों घंटे की वीडियो कोई इंसान बैठकर नहीं देख सकता. यहीं पर कंप्यूटर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल होता है. इजराइल ने सुपरकंप्यूटर्स और AI की मदद से इस अथाह डेटा का विश्लेषण किया.
मशीनें यह आसानी से पकड़ लेती हैं कि अगर कोई खास गाड़ी हर शनिवार सुबह एक तय जगह पर खड़ी होती है, तो इसका क्या मतलब है. चेहरों की पहचान और गाड़ियों के नंबर प्लेट को ट्रैक करके, AI ने यह बता दिया कि बॉडीगार्ड्स कब, कहां और कैसे मूवमेंट कर रहे हैं. इस तकनीक ने ईरान के सुरक्षा चक्र की हर छोटी-बड़ी गतिविधि को इजराइल की स्क्रीन पर खोल कर रख दिया.
हमले के वक्त मोबाइल नेटवर्क ठप करना
अपने ऑपरेशन को पूरी तरह सफल बनाने के लिए इजराइल ने सिर्फ कैमरे हैक नहीं किए, बल्कि हमले के वक्त इलाके का मोबाइल नेटवर्क भी जाम कर दिया. उन्होंने पाश्चर स्ट्रीट के पास लगे मोबाइल टावरों पर डिजिटल हमला किया.
उन्होंने मोबाइल नेटवर्क पर एक साथ इतना ज्यादा लोड डाल दिया कि टावर जाम हो गए. यह नकली लोड था. इसके कारण वहां मौजूद सभी लोगों के फोन की लाइनें कट गईं और स्क्रीन पर सिर्फ “बिजी” लिखा आने लगा. फोन न लगने की वजह से कोई भी समय पर अलर्ट नहीं भेज पाया और मदद नहीं बुला सका.
हमारे लिए एक सीख
हम सब अपने घरों, दुकानों और सोसायटियों में सुरक्षा के लिए वाई-फाई वाले सीसीटीवी कैमरे लगवाते हैं. अगर हमारा सिस्टम सुरक्षित नहीं है, तो हमारी निजी जिंदगी भी खतरे में पड़ सकती है. इसलिए, अगर आपने भी ऐसे कैमरे लगवाए हैं, तो हमेशा एक बहुत मजबूत पासवर्ड बनाएं, कैमरे के सॉफ्टवेयर को समय-समय पर अपडेट करते रहें और किसी भी अनजान लिंक या ईमेल पर क्लिक करने से बचें. सावधानी ही इस डिजिटल दुनिया में सबसे बड़ी सुरक्षा है.
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