एक फिल्म और मां के उधार के रुपयों ने कैसे राजा नायक को बनाया ‘बिजनेस टायकून’?

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Success story- राजा नायक का जन्म बेंगलुरु के एक बेहद साधारण और गरीब परिवार में हुआ था. हालात इतने चुनौतीपूर्ण थे कि परिवार के पास दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना भी मुश्किल था. आर्थिक तंगी के कारण उन्हें महज 15 साल की उम्र में अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी.

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1991 में राजा नायक ने जोखिम लिया और पैकेजिंग के क्षेत्र में कदम रखा.

नई दिल्‍ली. यह कहानी किसी फिल्म की पटकथा जैसी लग सकती है, लेकिन यह बेंगलुरु के राजा नायक की असली और प्रेरणादायक जीवन यात्रा है. यह एक ऐसी दास्तां है जो साबित करती है कि अगर इंसान के पास अडिग इरादे और सही दिशा हो, तो फुटपाथ से लेकर महल तक का सफर तय करना नामुमकिन नहीं है. बचपन में गरीबी के कारण पढाई न कर पाने वाले और भूखे तक सोने वाले राजा नायक आज 100 करोड़ की संपत्ति के मालिक हैं.

मां के उधार दिए गए पैसों ने उन्हें ‘पूंजी’ दी तो ‘त्रिशूल’ फिल्म ने उन्हें ‘सपना’ दिया. लेकिन उस पूंजी और सपने को साम्राज्य में बदलने का काम राजा नायक की उस अटूट मेहनत ने किया, जो उन्होंने बेंगलुरु की तपती सड़कों पर फुटपाथ पर बैठकर की थी. आज वे उन लाखों युवाओं के लिए रोल मॉडल हैं. उनका कहना है कि आंखें खुली रखिए, क्योंकि प्रेरणा कहीं भी मिल सकती है.

अभावों में बीता बचपन

राजा नायक का जन्म बेंगलुरु के एक बेहद साधारण और गरीब परिवार में हुआ था. हालात इतने चुनौतीपूर्ण थे कि परिवार के पास दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना भी मुश्किल था. आर्थिक तंगी के कारण उन्हें महज 15 साल की उम्र में अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी. 17 साल की उम्र में कुछ कर दिखाने के जुनून के साथ वे मुंबई पहुंचे. लेकिन काफी हाथ पैर मारने के बावजूद सफलता नहीं मिली. वे वापस बेंगलुरु लौटने पर मजबूर हो गए. वह दौर उनके जीवन का सबसे कठिन समय था, जहां एक ओर भविष्य धुंधला था और दूसरी ओर समाज की नजरों में वे एक ‘ड्रॉपआउट’ असफल युवक थे.

मां से पैसे उधार ले शुरू किया काम

जब दुनिया ने राजा नायक से उम्मीदें छोड़ दी थीं, तब उनकी मां ने उन पर भरोसा जताया. राजा ने व्यापार शुरू करने की इच्छा जताई तो मां ने अपनी छोटी सी बचत में से कुछ पैसे उन्हें उधार दिए. इन चंद रुपयों से राजा नायक ने तमिलनाडु के तिरुपुरर से सस्ते दामों पर शर्ट खरीदीं और उन्हें बेंगलुरु की व्यस्त सड़कों पर फुटपाथ पर बेचना शुरू किया.

यहीं से राजा का पहला बिजनेस लेसन शुरू हुआ. उन्होंने देखा कि पास की फैक्ट्री के मजदूर अक्सर नीले और सफेद रंग की शर्ट पहनते हैं. उन्होंने अपनी रणनीति बदली और केवल उन्हीं रंगों की शर्ट बेचना शुरू किया जिनकी मांग सबसे ज्यादा थी. ₹50 की कीमत वाली इन शर्ट्स ने उन्हें पहले ही दिन ₹5,000 का मुनाफा दिया. यह उनके जीवन की पहली बड़ी जीत थी.

त्रिशूल फिल्म ने दिए सपनों को पंख

फुटपाथ पर सामान बेचते हुए राजा नायक के दिल में एक चिंगारी हमेशा जलती रहती थी. मुंबई यात्रा के दौरान उन्होंने अमिताभ बच्चन की सुपरहिट फिल्म ‘त्रिशूल’ देखी थी. उस फिल्म में नायक को शून्य से शुरू करके एक विशाल बिजनेस साम्राज्य खड़ा करते हुए दिखाया गया था. वह फिल्म राजा के लिए केवल सिनेमा नहीं, बल्कि एक विजन बन गई. फुटपाथ पर बैठे हुए वे अक्सर सोचते थे कि अगर पर्दे पर नायक संघर्षों से लड़कर बड़ा आदमी बन सकता है, तो हकीकत में वे क्यों नहीं? ‘त्रिशूल’ के उस किरदार ने उन्हें सिखाया कि व्यापार के लिए केवल पैसा नहीं, बल्कि जिगर और सही योजना की जरूरत होती है. इसी प्रेरणा ने उन्हें फुटपाथ से निकलकर कुछ बड़ा करने का साहस दिया.

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