CAR T Cell Therapy for Cancer Treatment: कई तरह के ब्लड कैंसर के इलाज में सबसे लेटेस्ट तकनीक CAR T-सेल थेरेपी है, जो प्राइवेट अस्पतालों में इतनी महंगी है कि मरीजों को इससे इलाज कराने में अपने घर और खेत तक बेचने पड़ जाते हैं. निजी अस्पतालों में करीब 50 से 60 लाख रुपये के खर्च में होने वाली यह तकनीक काफी कारगर है. ऐसे में मरीज अक्सर पूछते हैं कि क्या यह थेरेपी सरकारी अस्पतालों में भी मौजूद है? क्या सरकारी अस्पतालों में इस थेरेपी से इलाज पूरी तरह मुफ्त है या यहां मरीजों को खर्च भी उठाना पड़ता है. आइए आपको बताते हैं विस्तार से…
प्राइवेट अस्तालों के अलावा दिल्ली के दो बड़े सरकारी अस्पतालों ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज और सफदरजंग अस्पताल में भी CAR T-सेल थेरेपी से कैंसर का सफल इलाज होता है. इन अस्पतालों में इस थेरेपी के लिए पूरा इन्फ्रास्ट्रक्चर बना हुआ है. अभी तक इन अस्पतालों में कुछ मरीजों का इलाज इस थेरेपी से पूरी तरह मुफ्त किया गया है.
आइए सफदरजंग अस्पताल के हेड ऑफ द डिपार्टमेंट, मेडिकल ऑन्कोलॉजी, प्रोफेसर कौशल कालरा से विस्तार से तमाम सवालों के जवाब जानते हैं कि यहां CAR T-सेल थेरेपी से इलाज की क्या-क्या व्यवस्था है, इसमें कितना खर्च आता है और यहां कि कितने मरीजों का इलाज किया जा चुका है?
क्या होती है CAR T सेल थेरेपी?
यह रक्त कैंसर के इलाज की एडवांस टेक्नोलॉजी है और बोन मेरो ट्रांसप्लांट से ज्यादा सेफ, कम टॉक्सिक और एक कदम आगे है. इस थेरेपी में कैंसर के मरीज की ही इम्यून सेल यानि टी-सेल्स को निकालकर इकठ्ठा किया जाता है.फिर इनको कैंसर एंटीजन के खिलाफ लैब में एक्सपोज किया जाता है. इन विट्रो में इन्हें ट्रेन करते हैं, और जब ये ट्रेंड हो जाती हैं तो CAR T सेल कहलाती हैं. फिर कैंसर के खिलाफ तैयार हो चुकीं इन ट्रेंड टी सेल्स को मरीज के शरीर में दोबारा डाला जाता है. वहां ये सेल्स जहां-जहां कैंसर सेल्स छुपी हुई हैं वहां-वहां पहुंचकर उनको मारती हैं. इसमें टॉक्सिसिटी कम होती है.
इस थेरेपी में कितना समय लगता है?
इस थेरेपी में दो से 3 हफ्ते का समय लगता है. सबसे पहले मरीज आता है तो उसके टी-सेल्स का सैंपल निकालकर उस कंपनी को भेज देते हैं जो CAR T बनाती है. उस कारटी को बनने में दो से 3 हफ्ते का समय लगता है. जब यह बनकर आ जाती है तो मरीज को अस्पताल में भर्ती किया जाता है और उसे 2 से 3 हफ्ते तक अस्पताल में पूरी तरह आइसोलेशन में रहना होता है.
क्या थेरेपी के बाद मरीज जिदंगी भर फॉलोअप के लिए आता है?
कैंसर के मरीज को फॉलोअप के लिए तो जिंदगी भी अस्पताल आना ही होता है, लेकिन अगर थेरेपी के बाद मरीज पूरी तरह ठीक हो जाता है तो 5 साल बाद उसे फॉलोअप के लिए नहीं बुलाया जाता लेकिन कोई भी कॉम्पलिकेशन होने पर मरीज आ सकता है.
किन सरकारी अस्पतालों में है इसका इलाज
इस थेरेपी का इन्फ्रास्ट्रक्चर और यूनिट दिल्ली के सिर्फ दो सरकारी अस्पतालों में है, एक है एम्स और दूसरा है सफदरजंग अस्पताल. दिल्ली से बाहर कई अस्पतालों में इस थेरेपी के क्लिनिकल ट्रायल भी चल रहे हैं.
यह थेरेपी कितनी महंगी है?
CAR T सेल थेरेपी काफी महंगी है. यह 30 लाख की सिर्फ थेरेपी है. सरकारी अस्पतालों में एडमिशन, बेड, डॉक्टरों का चार्ज नहीं देना होता इसलिए थेरेपी का ही खर्च आता है. जबकि प्राइवेट अस्पतालों में यह और भी महंगी हो जाती है और अस्पताल के अन्य खर्च को मिलाकर करीब 50 लाख रुपये में होती है.
क्या इसके लिए कोई सरकारी मदद की पेशकश हो रही है?
हां. 30 लाख रुपये की इस थेरेपी के लिए 50-50 खर्च पर कोशिश हो रही है कि आधा खर्च अगर मरीज उठा ले और आधा खर्च सरकार उठा ले तो यह थेरेपी मरीजों को दी जा सकती है. राष्ट्रीय आरोग्य निधि के तहत गरीब मरीजों के लिए केंद्र सरकार की ओर से 15 लाख रुपये कैंसर के इलाज के लिए दिए भी जाते हैं ऐसे में अगर आधे खर्च के लिए मरीज भी तैयार हो पाए तो इस थेरेपी से इलाज का विकल्प खुल सकता है.
क्या अभी तक कोई खर्च उठाने वाला मरीज आया?
नहीं अभी तक तो ऐसा कोई मरीज नहीं आया जो 50 फीसदी खर्च उठाने को तैयार हो, लेकिन अगर ऐसा मरीज आता है तो 15 लाख रुपये सरकार की तरफ से मिलने की पूरी संभावना है और इस तरह सरकारी अस्पताल में इलाज मिलना संभव है.
इस थेरेपी से कितने मरीजों का इलाज हुआ है?
जिस कंपनी ने यह थेरेपी तैयार की है, उन्होंने देश के कुछ महत्वपूर्ण सरकारी अस्पतालों में यह थेरेपी मुफ्त में दी थी जो मरीजों को लगाई गई. अभी तक अस्पताल में दो मरीजों को CAR T-सेल थेरेपी दी गई है. एम्स में भी लगभग यही आंकड़ा है.
कैंसर का सामान्य इलाज कितना महंगा है?
अगर मरीज बोन मेरो ट्रांसप्लांट या CAR T-सेल थेरेपी से इलाज नहीं कराता है और सामान्य रूप से कीमोथेरेपी, रेडियोथेरपी या ड्रग्स से इलाज लेता है तो यह भी सस्थ नहीं है. कुछ दवाएं इतनी महंगी हैं कि मरीज को एक एक बार में लाखों रुपये खर्च करने पड़ते हैं. हालांकि केंद्र सरकार समय-समय पर कैंसर की दवाओं में राहत देती रहती है लेकिन बहुत सारी दवाएं अभी भी बहुत महंगी हैं.
डॉ. कौशल कालरा आगे कहते हैं कि यह कैंसर की एडवांस और लेटेस्ट तकनीक है, जिसके फायदे तो दिखाई दिए हैं लेकिन बहुत महंगी होने के कारण सरकारी अस्पतालों में इस थेरेपी से इलाज की गति काफी धीमी है. हालांकि संभावना है कि आने वाले दिनों में इस थेरेपी का लाभ ज्यादा से ज्यादा मरीजों को मिल सकेगा. वहीं सबसे अच्छी बात है कि कैंसर के इलाज में अब टार्गेटेड थेरेपी जैसी नई चीजें भी जुड़ रही हैं, जो कैंसर के मरीजों के लिए राहत की बात है.