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Microplastic Pollution : पर्यावरण से लेकर इंसानी सेहत तक, माइक्रोप्लास्टिक का असर हर स्तर पर देखा जा रहा है, जिस पर समय रहते काबू पाना बेहद जरूरी है. ये कण इतने सूक्ष्म होते हैं कि आसानी से हमारे शरीर तक में प्रवेश कर जाते हैं. माइक्रोप्लास्टिक के कई स्रोत हैं. सबसे प्रमुख बड़े प्लास्टिक पदार्थ हैं, जो समय के साथ टूट-फूट कर छोटे-छोटे कणों में बदल जाते हैं. यह रक्त में मिलकर ब्लड फ्लो को बाधित कर सकते हैं. फेफड़ों तक पहुंचने पर सांस लेने में दिक्कतें पैदा हो सकती हैं. लिवर और किडनी तक को खराब कर सकते हैं.
अलीगढ़. आपने कई प्रदूषणों के बारे मे सुना होगा. उन्हीं में शामि है प्लास्टिक प्रदूषण, जो न सिर्फ पर्यावरण को बल्कि मानव शरीर को भी बहुत नुकसान पंहुचा रहा है. प्लास्टिक प्रदूषण अब सिर्फ नदियों, समुद्रों या जमीन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह इंसान के शरीर के भीतर तक पहुंच चुका है. माइक्रोप्लास्टिक नाम के बेहद सूक्ष्म कण आज हवा, पानी और भोजन के जरिये मानव शरीर में प्रवेश कर रहे हैं और गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं की वजह बनते जा रहे हैं. अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) के एग्रीकल्चर माइक्रोबायोलॉजी विभाग के शोधकर्ता शिरजील अहमद सिद्दीकी बताते हैं कि आज के समय में माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण एक गंभीर वैश्विक समस्या बन चुका है, जिसका असर न केवल पर्यावरण बल्कि मानव स्वास्थ्य पर भी गहराई से पड़ रहा है.
माइक्रोप्लास्टिक दरअसल प्लास्टिक के बेहद छोटे-छोटे कण होते हैं, जिनका आकार 5 नैनोमीटर या उससे भी कम हो सकता है. ये कण इतने सूक्ष्म होते हैं कि आसानी से हमारे शरीर और पर्यावरण में प्रवेश कर जाते हैं. माइक्रोप्लास्टिक के कई स्रोत हैं. सबसे प्रमुख स्रोत बड़े प्लास्टिक पदार्थ हैं, जो समय के साथ टूट-फूट कर छोटे-छोटे कणों में बदल जाते हैं. कई कॉस्मेटिक उत्पादों, फूड आइटम्स और टूथपेस्ट जैसे उत्पादों में जानबूझकर प्लास्टिक के माइक्रो-बीट्स मिलाए जाते हैं. इन्हीं माध्यमों से माइक्रोप्लास्टिक हमारे शरीर में प्रवेश करता है.
शोधकर्ता शिरजील बताते हैं कि माइक्रोप्लास्टिक के नुकसान हर स्तर पर देखे जा रहे हैं. खासकर यह फूड चेन को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है. जब यह हवा में मौजूद होता है, तो सांस के जरिये हमारे शरीर में चला जाता है. पानी में पहुंचने पर यह जलीय जीवों को नुकसान पहुंचाता है और वही पानी जब मनुष्य पीता है, तो माइक्रोप्लास्टिक सीधे मानव शरीर में प्रवेश कर जाता है. मानव शरीर में पहुंचने के बाद माइक्रोप्लास्टिक लगभग हर अंग को प्रभावित कर सकता है. यह रक्त में मिलकर ब्लड फ्लो को बाधित कर सकता है. फेफड़ों तक पहुंचने पर सांस लेने में दिक्कतें पैदा हो सकती हैं. जब यह लिवर और किडनी तक पहुंचता है, तो शरीर में पोषक तत्वों के अवशोषण में समस्या पैदा होती है.
3R सिद्धांत
हार्मोनल असंतुलन, प्रजनन क्षमता में कमी और फर्टिलिटी से जुड़ी समस्याएं भी माइक्रोप्लास्टिक के कारण सामने आई हैं. कई शोधों में यह भी पाया गया है कि माइक्रोप्लास्टिक शरीर से न तो पूरी तरह बाहर निकल पाता है और न ही ठीक से अवशोषित हो पाता है. ऐसी स्थिति में यह किडनी तक पहुंचकर गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है और किडनी डैमेज जैसी समस्याएं पैदा कर सकता है. माइक्रोप्लास्टिक से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है प्लास्टिक के उपयोग को कम करना है. इसके लिए 3R सिद्धांत यानी रीडिंयूज, रीयूज और रीसायकल को अपनाना बेहद जरूरी है.
शोधकर्ता शिरजील बताते हैं कि अगर हम प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करेंगे, तो उसका कचरा भी कम बनेगा और पर्यावरण में माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा भी घटेगी. इससे मानव शरीर का एक्सपोजर भी अपने-आप कम हो जाएगा. माइक्रोप्लास्टिक को लेकर जागरूकता फैलाना भी उतना ही जरूरी है. अभी भी बहुत से लोग इसके खतरों से अनजान हैं. जब तक लोग यह नहीं समझेंगे कि माइक्रोप्लास्टिक किस तरह से हमारे शरीर और पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहा है, तब तक इससे बचाव संभव नहीं है. जागरूकता और प्लास्टिक के सीमित उपयोग से ही इस गंभीर समस्या पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है.
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Priyanshu has more than 10 years of experience in journalism. Before News 18 (Network 18 Group), he had worked with Rajsthan Patrika and Amar Ujala. He has Studied Journalism from Indian Institute of Mass Commu…और पढ़ें