Mahayogi Avadhoot Sant Dada Guru: भारत में ऐसे अनेक संत-महात्मा हुए हैं, जिनकी तपस्या और साधना आज भी विज्ञान के लिए रहस्य बनी है. मध्य प्रदेश में भी ऐसे ही एक संत हैं महायोगी अवधूत संत दादा गुरु, जो विज्ञान और मेडिकल जगत के लिए शोध का विषय बन चुके हैं. दादा गुरु ने पांच साल से अन्न का एक दाना तक ग्रहण नहीं किया है. वे केवल मां नर्मदा का जल पीकर जीवित हैं. 2 साल से तो जल का भी कई बार त्याग कर केवल वायु (हवा) के सहारे जीवन जी रहे हैं.
इतनी ठंड में भी बस तन पर लंगोटी
हैरानी की बात ये कि लगभग 1800 दिन से बिना कुछ खाए-पीए दादा गुरु रोज कई किलोमीटर पैदल चलते हैं, दौड़ते हैं और घंटों प्रवचन देते हैं. इसके बावजूद वे पूरी तरह स्वस्थ, ऊर्जावान और निरोगी हैं. इस कड़ाके की ठंड में भी वे सिर्फ एक लंगोट के अलावा तन पर कोई अन्य वस्त्र नहीं पहनते. बड़े-बड़े डॉक्टर और वैज्ञानिक भी यह समझ नहीं पा रहे कि यह कैसे संभव है?
नर्मदा संरक्षण के लिए कठोर साधना
दअरसल, जबलपुर निवासी दादा गुरु ने पांच साल पहले मां नर्मदा के संरक्षण और संवर्धन के उद्देश्य से नर्मदा परिक्रमा शुरू की थी. यह यात्रा अब अपने चौथे चरण में प्रवेश कर चुकी है. वर्तमान में वे सैकड़ों परिक्रमा वासियों के साथ पैदल अपनी सातवीं नर्मदा परिक्रमा कर रहे हैं. सोमवार को दादा गुरु उत्तर तट पर खरगोन जिले की पवित्र नगरी महेश्वर से मंडलेश्वर होते हुए रात्रि विश्राम के लिए ग्राम नांद्रा पहुंचे. इस दौरान उन्होंने मंडलेश्वर में नर्मदा घाट पर विधिवत नर्मदा पूजन और अभिषेक किया, मछलियों को चना खिलाया. नर्मदा आश्रय स्थल पर स्वयं भोजन किया और परिक्रमा वासियों को भी अपने हाथों से भोजन परोसा. इसके बाद उन्होंने प्रवचन देकर नर्मदा संरक्षण और सनातन संस्कृति का संदेश दिया.
दादा गुरु पर हो रहा शोध
वहीं, नर्मदा मिशन से जुड़े दादा गुरु ने लोकल 18 से खुलकर बात की. यह पहला अवसर था जब उन्होंने चलते-चलते इंटरव्यू दिया. फिलहाल, दादा गुरु पर मध्य प्रदेश सरकार और एम्स (AIIMS) की टीमें उनके निराहार जीवन पर शोध कर रही हैं. उन्होंने 1800 दिनों तक अन्न त्यागे रखने और नर्मदा परिक्रमा के दौरान रक्तदान करने के लिए ‘गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड’ में तीन विश्व रिकॉर्ड भी अपने नाम किए हैं. वे नर्मदा जल को सिर्फ पानी नहीं, बल्कि भगवती स्वरूप और शक्ति मानते हैं. उनका मानना है कि नदी ही जीवन का आधार है.
दादा गुरु के Exclusive Interview के अंश
सवाल: इन पांच वर्षों में आपका उद्देश्य कितना सफल हुआ? नर्मदा का जल ओर तट कितना स्वच्छ हुआ?
जवाब: दादा गुरु ने कहा कि, ये हमारी सनातनी परम्परा है, जिसको हम परिक्रमा कह रहे है. लेकिन यह मेरे लिए साधना है. एक ऐसी साधना जो मूल शक्तियों का परिचय कराती है. यह परिक्रमा घर, परिवार, समाज को मूल आधार शक्तियों का परिचय करवा रही है. वह शक्तियां जो जीवन का मूल आधार हैं. यह साधना न सिर्फ लोगों को जगा रही है, बल्कि जीना भी सीखा रही है. अपनी माटी, अपनी संस्कृति पर केंद्रित होना सिखा रही है. जिन्हें हम नदी कहते हैं, वह हमारे लिए मां हैं. यही संदेश मेरी यात्रा से लोगों को मिल रहा है. घर, परिवार और समाज में बदलाव भी आ रहा है.
उन्होंने कहा, ”ये मेरा पांचवा वर्ष है, जबकि पिछले एक दशक से हम मां नर्मदा सहित अन्य नदियों के जल संरक्षण, संवर्धन और शुद्धिकरण के लिए प्रयास कर रहे हैं. साथ ही प्रकृति संरक्षण, संवर्धन का प्रयास भी कर रहे हैं. ये हमारी प्राथमिक भी है. क्योंकि, आज वैश्विक स्तर पर कई संकट और चुनौतियां हैं. कई तरह के संक्रमण और आपदाओं का शिकार दुनिया हो रही है. इन सब से बचने का मूल मंत्र नर्मदा का पथ, सनातन संस्कृति और सभ्यता ही है, ये लोगों को समझने की आज भी जरूरत है. यही संदेश हम दे रहे हैं”.
सवाल: इतने वर्षों से अन्न का त्याग, सिर्फ पानी पर रहना, कई बार पानी का भी त्याग, फिर भी इतनी फुर्ती, ये कैसे होता है?
जवाब: हां, डॉक्टरों की टीम रिसर्च कर रही है. बीच-बीच में शोधकर्ता आते हैं, परीक्षण करते हैं. मैं उनको बोलता हूं कि साथ चलें ओर देखें. मैं प्रकृति केंद्रित, धरा, गंगा, नर्मदा ओर गोदावरी पर केंद्रीय हूं. मेरे लिए ये नदियां नहीं शक्ति हैं. इसी के सहारे मैं चल रहा हूं.
सवाल: नर्मदा के जल में इतनी शक्ति है तो क्या कोई भी जीव सिर्फ इसका जल पीकर जीवित रह सकता है?
जवाब: गुरु गोविंद सिंह ने कई लीलाएं कीं. ये भी सिर्फ एक लीला है. मैं किसी को भूखा रहना नहीं सिखा रहा हूं. ये लीला बोध करा रही है, मूल शक्तियों का जिसपर जीव जगत का आधार है. प्रकृति में सबकुछ व्याप्त है. प्रकृति हर एक क्षति की पूर्ति करने में सक्षम है. हम पेड़, पहाड़ों का पूजन करते हैं. क्योंकि, इन्हीं में वो शक्तियां मौजूद हैं. ये पहली बार नहीं है, हजारों वर्षों का प्रमाण है, पहले भी ऋषि, मुनि ओर योगी हुए, जो बिना किसी अन्न पदार्थ के कई वर्षों तक जीवित रहे. मां नर्मदा और प्रकृति की परिक्रमा भी उसी तरह की साधना है, जो निष्ठा भाव से इसके निकट आएगा वह भी यह कर पाएगा.
कहा, मां के गर्भ में बच्चा 6 महीने तक आहार लेकर जीवित रहता है, उसी तरह गंगा, नर्मदा भी मां हैं. उसके आंचल से हमें मिल रहा है. वो भी हमारे लिए आहार हैं. यही प्रामाणिक भी है. यही संदेश भी है, इसलिए मां के आंचल की स्वच्छता, पवित्रता हमें बनाए रखना जरूरी है.
सवाल: पहले आप भैयाजी सरकार कहलाए, फिर दादा गुरु और अब कई लोग आपको भगवान दादा गुरु कहने लगे?
जवाब: ये आस्था का विषय, श्रद्धा का विषय है. इसमें कोई बात नहीं है.
सवाल: नर्मदा परिक्रमा को लेकर आप लोगों को क्या संदेश देना चाहेंगे?
जवाब: हमें हमारी संस्कृति, धर्म, माटी से जुड़ना चाहिए. लोगों को सनातन ओर अपनी मान्यताओं को जानना चाहिए. क्योंकि, मानना ही काफी नहीं जानना भी जरूरी है. दुनिया के अंदर केवल एक सनातन, एक धर्म, एक संस्कृति है जो धरा पर केंद्रित है. नदियों, पेड़ पहाड़ों पर केंद्रित है. जब हम अपनी संस्कृति और प्रकृति की निकटता में आयेंगे तो इस रहस्य ओर सत्यता को जान पाएंगे कि इसमें कितना सामर्थ है, कितनी शक्ति इसमें व्याप्त है.
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