विदिशा की प्राचीन श्रीरामलीला में बुधवार को अहिरावण वध की लीला का भव्य मंचन किया गया। इस दौरान दर्शकों ने भगवान श्रीराम के साहस और हनुमान जी की वीरता के दर्शन किए। यह रामलीला धार्मिक आस्था, सनातन परंपरा और आधुनिक तकनीक का सुंदर संगम प्रस्तुत करती है। इस रामलीला की खास बात यह है कि इसका मंचन केवल एक मंच तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे मैदान में घूम-घूमकर रामकथा का जीवंत प्रदर्शन किया जाता है। इसी अनोखी परंपरा के कारण विदिशा सहित आसपास के जिलों और ग्रामीण क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु इसे देखने पहुंचते हैं। विभीषण का रूप लेकर राम के शिविर में गया अहिरावण
लीला की शुरुआत लंकापति रावण की चिंता से होती है। अपने भाई और पुत्र मेघनाद की मृत्यु के बाद रावण, श्रीराम और लक्ष्मण को पराजित करने का उपाय सोचता है। इसी क्रम में पाताल लोक के स्वामी अहिरावण रावण को सहयोग का भरोसा देता है। देवी से वरदान प्राप्त करने के बाद अहिरावण अदृश्य होकर रूप बदलने की शक्ति हासिल करता है। वरदान के बल पर अहिरावण विभीषण का रूप धारण कर श्रीराम और लक्ष्मण का हरण कर उन्हें पाताल लोक ले जाता है। राम-लक्ष्मण को लेने पाताललोक पहुंचे हनुमान
जानकारी मिलते ही हनुमान जी पाताल लोक जाने का निश्चय करते हैं। वहां उनका मकरध्वज से सामना होता है और सूक्ष्म रूप धारण कर वे भीतर प्रवेश करते हैं। जब अहिरावण बलि की तैयारी कर रहा होता है, तभी हनुमान जी विशाल रूप में प्रकट होते हैं और घमासान युद्ध के बाद अहिरावण का वध कर श्रीराम और लक्ष्मण को मुक्त कराते हैं। इस दौरान पूरा परिसर “जय श्रीराम” के जयघोष से गूंज उठा। लीला के अंत में श्रीराम और लक्ष्मण की विजय की खुशी में भव्य आरती की गई, जिसके साथ अहिरावण वध की लीला का समापन हुआ। .