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ये कहते हुए 45 साल की सुमंतरा बाई अपना बायां हाथ दिखाती है, जो कोहनी से नीचे कट चुका है। दरअसल, सुमंतरा 20 महीने पहले 6 फरवरी 2024 को हरदा की पटाखा फैक्ट्री में हुए धमाके की विक्टिम है। पति आसाराम कहते हैं कि सुमंतरा का हाथ धमाके के दिन नहीं कटा, बल्कि उसके बाद इलाज में कटा।
उस समय प्रशासन ने सुमंतरा को मामूली घायल की कैटेगरी में रखा था इसलिए हमें 50 हजार रु. मुआवजा ही मिला। जबकि इलाज पर खर्च 5 लाख रुपए से ज्यादा हो चुका है। सुमंतरा की तरह हरदा पटाखा फैक्ट्री ब्लास्ट के कई पीड़ित हैं जिन्हें मामूली घायल की कैटेगरी में रखा, लेकिन किसी का हाथ कटा है तो किसी के पैर बेकार हो चुके हैं।
भास्कर ने ऐसे लोगों से बात कर समझा कि आखिर वे किस तरह से परेशानियों के दौर से गुजर रहे हैं। पढ़िए रिपोर्ट
पत्नी की किडनी खराब, पति का पैर लाचार इस त्रासदी के असल पीड़ित वे भी हैं जिनका फैक्ट्री से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था। इसका जीता-जागता उदाहरण फैक्ट्री के पास नर्सरी चलाने वाले 52 वर्षीय दिनेश सोनी हैं। वे अपने घर के आंगन में पेड़-पौधों को लगाते और उन्हें बेचकर शांति से अपना जीवन गुजार रहे थे। लेकिन 6 फरवरी के विस्फोट ने उनकी हरियाली भरी दुनिया को उजाड़ दिया।
दिनेश उस दिन को याद करते हुए सिहर उठते हैं, ‘धमाके के दिन मैं अपने घर के दरवाजे पर खड़ा था, अचानक एक लोहे का एंगल रॉकेट की तरह उड़ता हुआ आया और सीधे मेरे पैर में धंस गया। मैं वहीं गिर पड़ा। मुझे अस्पताल में भर्ती कराया गया। एक के बाद एक तीन ऑपरेशन हुए, लेकिन सुधार नहीं हुआ, फिर डॉक्टरों ने कहा कि पैर काटना पड़ेगा।
बचाने की एक आखिरी कोशिश कर सकते हैं, एक अलग से रॉड डलवा लें, यह एक साल लगाकर रखनी पड़ेगी। हमने यह जंगला लगवाने का रास्ता अपनाया।’

पिछले 20 महीने से दिनेश का पैर ठीक ही नहीं हुआ है। इलाज जारी है।
इलाज में खर्च हो चुके 5 लाख रु. आज दिनेश एक बाहरी लोहे के पिंजरे (External Fixator) के सहारे अपना पैर बचाने की जंग लड़ रहे हैं। वे बताते हैं, ’अब तक इलाज में 4.5 से 5 लाख खर्च हो चुके हैं। काम बंद पड़ा है। यह जंगला ही 2 लाख का है। सरकार से मिले हैं 50 हजार और अभी 23 हजार रुपए और आए हैं। उस दिन जो हुआ उसका दर्द हम आज तक भोग रहे हैं और पता नहीं कितना सहना पड़ेगा…।”
दिनेश की समस्याएं यहीं खत्म नहीं होतीं। उनकी पत्नी सुनीता की दोनों किडनी खराब हैं। सुनीता बताती हैं, ‘मेरी सप्ताह में तीन बार डायलिसिस होती है। मेरा किडनी ट्रांसप्लांट होना है। मेरी मां किडनी देने को तैयार है, लेकिन ट्रांसप्लांट में 10 लाख का खर्च आना है। पहले सोचा था जैसे–तैसे कहीं से रुपए जुटाकर ट्रांसप्लांट करा लेंगे, लेकिन इस बीच उस धमाके ने पति को भी लाचार कर दिया।’

सड़क पर हाथ गिरा, आज भी अस्पतालों के चक्कर काट रही हरदा पटाखा फैक्ट्री की गंभीर घायलों में 48 साल की अमीना नाम सबसे ऊपर आता है। धमाके के बाद जब चारों तरफ अफरा-तफरी मची, तो गीता बाई भी अपनी जान बचाने के लिए भाग रही थीं। तभी एक टीन की चादर उड़ती हुई आकर सीधे उनके कंधे पर लगी और वे गिर गईं। टक्कर इतनी तेज थी कि जिस समय वे सड़क पर गिरीं, उनका हाथ कंधे से उखड़कर नीचे गिर गया।

ब्लास्ट के दिन की तस्वीर। जब अमीना का हाथ कटकर सड़क पर गिर गया था। पुलिस वाले ने उसकी जान बचाई।
पहले से जिंदगी और ज्यादा कठिन हो गई एक पुलिसवाले ने उन्हें उठाकर जीप में बैठाया और अस्पताल पहुंचाया। लगातार खून बह रहा था, महीने भर इलाज चला। इसके बाद छुट्टी तो मिली लेकिन जख्म नहीं भरा। अमीना बताती हैं, ‘आज भी उस दर्द को भोग रही हूं, अभी भी अस्पताल ही आई हुई हूं।
हाथ मौके पर ही कट गया था, इसलिए सरकार से चार लाख की सहायता मिली, लेकिन उतने रुपए तो इलाज में ही खर्च हो गए। हाथ ही नहीं है तो काम कैसे करूं, अब तो घर के काम तक नहीं कर पाती। पहले जैसे जिंदगी थी, अब उससे भी कठिन हो गई है…।’

अमीना का अभी भी अस्पताल में इलाज जारी है।
वकील बोलीं- पीड़ितों के साथ सरकार का दोहरा रवैया हरदा पटाखा फैक्ट्री पीड़ितों के हक की लड़ाई लड़ रहीं सुप्रीम कोर्ट की एडवोकेट अवनी बंसल इस पूरे मामले में सरकारी उदासीनता पर सवाल उठाती हैं। वे बताती हैं, ‘इस मामले में पीड़ितों को अभी सिर्फ अंतरिम मुआवजा दिया गया है। फाइनल मुआवजे के लिए हम लड़ रहे हैं। हमने इस मामले में एनजीटी में याचिका लगाई है, जिसमें जिक्र है कि जिस जगह विस्फोट हुआ वहां भूजल प्रदूषित हो गया है।
पीडब्ल्यूडी की रिपोर्ट में भी भूजल दूषित होने की पुष्टि हुई, लेकिन अगले ही दिन पीडब्ल्यूडी ने नई रिपोर्ट पेश कर दी जिसमें कहा गया कि भूजल विस्फोट के कारण नहीं, बल्कि बरसात के चलते प्रदूषित हुआ है।एडवोकेट बंसल आगे कहती हैं, ‘सरकार ने केवल अंतरिम मुआवजा दिया है। फाइनल मुआवजे के लिए आरोपी राजेश अग्रवाल की प्रॉपर्टी बेचकर मुआवजा देने की बात हुई थी, लेकिन वह भी नहीं हो सका।
सरकार अपनी सारी जिम्मेदारियां आरोपियों पर डाल रही है। यह लड़ाई इस तरह हो गई है कि हम पीड़ितों की ओर से आरोपियों से कोर्ट में लड़ रहे हैं। जबकि होना यह चाहिए कि सरकार नागरिकों को कानूनी मुआवजा दें और फिर आरोपियों से जो भी वसूली करना हो, करें।
