राजगढ़ के जीरापुर तहसील के पास बसे ग्राम कहारखेड़ा और आसपास के गुर्जर समाज के गांवों में दीपावली का त्योहार केवल रोशनी और खुशियों का नहीं, बल्कि पूर्वजों को याद करने का पर्व भी माना जाता है। यहां दीपावली की सुबह समाज के लोग जलाशय, नदी या कुएं के किना
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यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है। दीपावली के दिन परिवार के सभी सदस्य एक साथ इकट्ठा होकर जल से तर्पण करते हैं और फिर “अपमार्ग” नामक एक विशेष बेल घर या खेत की सीमा पर लगाते हैं। मान्यता है कि यह बेल वंश वृद्धि और परिवार की समृद्धि का प्रतीक होती है।
गुर्जर समाज के बुजुर्ग बताते हैं कि अपमार्ग की बेल को “देव नारायण” और पूर्वजों का आशीर्वाद माना जाता है। इसे लगाने से घर-परिवार में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है। समाज के युवा भी इस परंपरा को पूरे श्रद्धा भाव से निभा रहे हैं।
दीपावली की सुबह समाजजन घी के दीपक जलाकर, तिल, जौ और जल अर्पित करते हैं। यह तर्पण सामूहिक रूप से किया जाता है, जिससे समाज में एकता और पारिवारिक भावना बनी रहती है।
समाज के पटेल सुजान सिंह, कालू सिंह और डॉ. विजय सिंह गुर्जर बताते हैं कि “हमारे पूर्वजों ने सिखाया है कि दीपावली सिर्फ लक्ष्मी पूजन का पर्व नहीं, बल्कि पितरों से आशीर्वाद लेने का भी दिन है।” आज जब आधुनिकता के कारण कई परंपराएं खत्म हो रही हैं, ऐसे में गुर्जर समाज द्वारा दीपावली पर पितृ तर्पण की यह परंपरा नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति और जड़ों से जोड़ने की एक सुंदर मिसाल है।
