Ground Report: केंद्र सरकार की योजना से खोदे गए तालाब पर अब बच्चे खेल रहे क्रिकेट, किसानों ने बो डाली फसल

Jabalpur News: केंद्र सरकार की महत्वकांक्षी ‘अमृत सरोवर योजना’ का अनोखा रूप में जबलपुर में देखने को मिला. इस योजना के तहत तालाबों को बनाया जा रहा या जीर्णोद्धार किया जा रहा है, ताकि जलस्तर बढ़ सके और किसानों को फसल से लेकर मछली उत्पादन में भी मदद मिल सके. लेकिन, जबलपुर में कई ऐसे तालाब हैं, जिनकी स्थिति बनने के बाद और भी ज्यादा खराब होती जा रही है.

दरअसल, जबलपुर में अमृत सरोवर योजना के तहत दर्जन भर से अधिक तालाबों का जीणोद्धार और निर्माण कराया गया है. लेकिन, अधिकांश तालाब कागजों में बने हुए हैं. जमीन में उतरी यह योजना दम तोड़ रही है. इसका रियलिटी चेक करने लोकल 18 की टीम पहुंची, जबलपुर से तकरीबन 40 किलोमीटर दूर शहपुरा तहसील के गांव शीतलपुर में. इस गांव की आबादी करीब साढ़े 800 है.

तालाब सूखने के बाद वहां क्रिकेट 
ग्रामीणों के मुताबिक, 3 साल पहले अमृत सरोवर योजना के तहत गांव में तालाब का निर्माण कराया गया था. बकायदा जेसीबी की मदद से तालाब की खुदाई की गई थी. पत्थर लगाकर स्टॉप डैम भी बनाया गया था. लेकिन, यह तालाब बरसात के मौसम के दौरान एक या दो महीने भरा रहता है. इसके बाद तालाब पूरी तरीके से सूख जाता है. ग्रामीण अर्जुन बर्मन ने बताया, तालाब के पहले क्रिकेट खेलने की जगह थी, लेकिन तालाब बनने के कारण गांव के युवा क्रिकेट नहीं खेल पाते, इसी कारण तालाब सूखने पर पिच बनाकर गांव के सभी यूथ क्रिकेट खेलते हैं.

गांव का जलस्तर बढ़ा, बरसात में दिखा अदभुत नजारा
ग्रामीणों ने बताया, तालाब सूखने पर गांव के कुछ लोग फसल की भी बोनी कर देते हैं. हालांकि, तालाब बनने के बाद बरसात में तालाब में जब पानी भरता हैं, तब नजारा अद्भुत दिखाई देता है. जिसमें ग्रामीण मछली पालन का भी काम करते हैं, इतना ही नहीं फसल में भी तालाब के पानी से काफी मदद मिलती है और तालाब की खुदाई के बाद से गांव के जलस्तर में भी बढ़ोतरी हुई है. लेकिन, युवाओं के लिए क्रिकेट का मैदान छिन चुका है.

तालाब सूखा, मछली गायब!
ग्रामीणों का कहना है बरसात के तीन से चार महीनों के दौरान तालाब में मछली पालन करते हैं, लेकिन जैसे ही तालाब सूखता है, मछलियां भी गायब हो जाती हैं. जिस तरीके से सुविधा मिलनी थी, वैसी सुविधाएं अमृत सरोवर योजना के तहत नहीं दी गई. हालांकि, जिला प्रशासन फाइलों से बाहर निकल कर जमीनी स्तर पर काम करे, तब ग्रामीणों के लिए यह योजना कारगर सिद्ध हो सकती है.

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