US vs Denmark Elite Arctic Unit: ग्रीनलैंड की जमी हुई धरती को लेकर डोनाल्ड ट्रंप ने जो बवाल छेड़ दिया है, उसे लेकर पूरी दुनिया हैरान है. खासतौर पर यूरोपीय देशों की नींदें उड़ी हुई हैं कि आखिर वो नाटो देश के खिलाफ कार्रवाई की धमकी कैसे दे सकते हैं? हालांकि ट्रंप अपनी बात पर अड़े हुए हैं और वो सिर्फ बंदूकों से नहीं, बयानों से भी लड़ रहे हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने डेनमार्क की ग्रीनलैंड सुरक्षा व्यवस्था का मजाक उड़ाते हुए एक ऐसा बयान दिया, जिसने आर्कटिक की सबसे खतरनाक सैन्य इकाई को सुर्खियों में ला दिया है.
दुनिया की सबसे खतरनाक आर्मी को कहा ‘लप्पू’?
डोनाल्ड ट्रंप ने अपने विमान एयरफोर्स वन के आरामदेह केबिन में खड़े होकर ग्रीनलैंड के मामले पर हंसते हुए कहा- ‘डेनमार्क ने ग्रीनलैंड की सुरक्षा बढ़ाने के लिए क्या किया? एक और डॉग स्लेज जोड़ दी. उन्हें लगा यह बड़ा कदम है. नहीं ये काफी नहीं है.’ हैरानी की बात ये है कि डोनाल्ड ट्रंप जिसे मजा समझ रहे थे, वह दरअसल बर्फीले रेगिस्तान में तैनात एक एलीट सैन्य दस्ता है, जिसका नाम है – सिरियस डॉग स्लेज पेट्रोल.
इस जगह हथियार भी नहीं चलते, बस कुत्ते ही दौड़ पाते हैं. (Credit- Reuters)
किन परिस्थितियों में सर्वाइव करती है ये खतरनाक यूनिट?
ग्रीनलैंड के उत्तर-पूर्वी हिस्से में ये सैन्य दस्ता तैनात रहता है. याहं पर तापमान माइनस 50 डिग्री तक गिर जाता है. चौंकाने वाली बात ये है कि यहां सड़कें नहीं हैं, शहर नहीं हैं और दुनिया के जितने भी आधुनिक हथियार हैं, वो ठंड में बेकार हो जाते हैं. सोचिए ऐसी परिस्थिति में डेनमार्क की ये पेट्रोल यूनिट लगातार तैनात रहती है.
क्यों कुत्तों को लगाया जाता है कार्ट में, मशीनें हुईं फेल?
आपको ये जानकर हैरानी लोगी कि ये करीब 1.6 लाख वर्ग किलोमीटर का इलाका है. यहां पर सैनिक स्की, स्लेज और खास नस्ल के कुत्तों के साथ गश्त करते हैं क्योंकि और कुछ भी इस बर्फिस्तान पर चल नहीं सकता. हर साल 15 से 20 हजार किलोमीटर की गश्त की जाती है, वो भी कुत्तागाड़ी के सहारे. इस यूनिट में 12-14 एलीट सैनिक होते हैं, जिन्हें ठंड से तो अपनी रक्षा करनी ही होती है, इस इलाके में मौजूद पोलर बियर से बचने के लिए भी हथियार रखने होते हैं.
क्या अमेरिका के खिलाफ ये यूनिट लड़ाई में उतरेगी?
जी नहीं, ये कोई आक्रमण रोकने वाली सेना नहीं है बल्कि संप्रभुता का झंडा हैं. ये यूनिट इस विकट परिस्थिति में सिर्फ इसलिए घूमती रहती है क्योंकि वो ये संदेश देने चाहती है कि यह जमीन खाली नहीं है. इस चौकसी की शुरुआत दूसरे विश्व युद्ध से शुरू हुई थी. तभी इस यूनिट की स्थापना भी हुई थी. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जब नाजी जर्मनी ने डेनमार्क पर कब्जा कर लिया था, तब ये यूनिट बनाई गई थी. सोचिए, आज उसी ग्रीनलैंड की सुरक्षा के लिए आज जर्मनी नाटो जैसे गठबंधन की पहल कर रहा है.
क्यों वीरान पड़े ग्रीनलैंड को पड़ती है सुरक्षा की जरूरत?
जब इस इलाके में कोई रहता ही नहीं है. परिस्थितियां इतनी विकट हैं कि सर्वाइव करना मुश्किल है, तो भला शीत युद्ध तक इस यूनिट को यहां क्यों लगाया गया? आखिर आज भी ये गश्त क्यों जरूरी है? तो इसका जवाब ये है कि रूस-चीन की बढ़ती आर्कटिक मौजूदगी की वजह से सिरियस पेट्रोल डेनमार्क की आंख और कान बना हुआ है. आज भी यह यूनिट निगरानी, कानून व्यवस्था और स्थायी सैन्य मौजूदगी बनाए रखने का काम करती है.
आर्कटिक में तैनात सैनिकों की जीवन आसान नहीं
- इस दस्ते में यूं ही किसी को नहीं चुना जाता. इसमें चुनिंदा सैनिक होते हैं, जिन्हें शारीरिक के साथ-साथ मानसिक तौर पर भी फिट रहना होता है क्योंकि उन्हें महीनों तक तन्हाई में काम करना होता है.
- इस दस्ते में एक समय में केवल 12 सैनिक होते हैं और उनकी दो-दो की टीमें होती हैं.
- इसके लिए शारीरिक और मानसिक परीक्षा बेहद कठोर होती है.
- जो सैनिक चुने जाते हैं, उन्हें महीनों तक आर्कटिक सर्वाइवल, स्कीइंग, नेविगेशन और प्रकृति पर निर्भर जीवन की ट्रेनिंग दी जाती है.
कभी-कभी ये सैनिक महीनों तक दुनिया से कटे रहते हैं.
डोनाल्ड ट्रंप बार-बार कह चुके हैं कि ग्रीनलैंड अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बेहद अहम है. उनका दावा है कि रूस और चीन के जहाज आर्कटिक में बढ़ती मौजूदगी दिखा रहे हैं. डेनमार्क ग्रीनलैंड की रक्षा नहीं कर सकता, यह कहकर ट्रंप ने सियासी आग और भड़का दी है. आर्कटिक में जो पुराना दिखता है, वही अक्सर जिंदा रहता है और बर्फ की इस जंग में, डॉग स्लेज अब भी हथियार है.
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