1 घंटे पहले
- कॉपी लिंक
आज गोपाष्टमी है। यानी कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की अष्टमी। इस तिथि पर गाय और बछड़े की पूजा होती है। पुराणों का कहना है कि इनकी पूजा से श्रीकृष्ण की पूजा हो जाती है। गोपाष्टमी ब्रज की संस्कृति का खास त्योहार है। पद्म पुराण के अनुसार ये परंपरा कार्तिक शुक्ल अष्टमी को मानी जाती है। इसी दिन श्रीकृष्ण ने गायों की सेवा और गाय पालने का संदेश भी दिया है। गोपाष्टमी पर्व भगवान श्रीकृष्ण के बचपन और जीवन के संदेश, दोनों ही दिखाता है। विष्णु पुराण में लिखा है कि श्री कृष्ण गौ और ब्राह्मण के हितकारी है।
हमारी परंपरा में गाय को माँ का दर्जा दिया गया है। महाभारत के अनुशासन पर्व में ये बात लिखी हुई है। दयालुता, सहनशीलता, पोषण, शांति, ममता, अनुशासन, बुद्धि, पवित्रता और साथ मिलकर जीने जैसे गुण गाय से जोड़े जाते हैं। ये बातें ऋग्वेद के गौ सूक्त और महाभारत के अनुशासन पर्व में भी है।
गौ पूजन यानी श्रीकृष्ण की पूजा श्रीमद्भागवत में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि – मैं गायों में कामधेनु हूँ, यानी गाय भगवान कृष्ण का ही रूप है। स्कन्द पुराण के अनुसार गाय की पूजा और सेवा से मन शांत होता है, बुराइयां कम होती हैं और अच्छा फल मिलता है। वहीं अथर्ववेद और स्कंद पुराण में बताया है कि गाय के दूध, घी, गोमूत्र और गोबर के औषधीय और आध्यात्मिक फायदे भी हैं। ऋग्वेद में गाय को अघ्न्या यानी अदिति कहा गया है। मतलब गाय न मारने योग्य है।
गाय से पर्यावरण संतुलन और अच्छी सेहत गाय का स्पर्श और गौ सेवा से शरीर, मन और वातावरण को सकारात्मक ऊर्जा मिलती है। इस ऊर्जा को विज्ञान की भाषा में “ग्राउंडिंग इफेक्ट” कहा जाता है, जो मानसिक संतुलन और हार्मोनल हेल्थ को मजबूत बनाती है। गाय के गोबर से जैविक खाद बनती है और वातावरण को फायदा मिलता है। परंपरागत उपचार यानी आयुर्वेद में गोमूत्र का और दूध, घी का जिक्र है।
कैसे मनाएं गोपाष्टमी
- गाय और बछड़ों का नहलाएं। फल और माला से श्रंगार करें। अक्षत, धूप-दीप से पूजन करें। हरी घास और गुड़ का भोग लगाएं।
- गोशाला और गांवों में सामूहिक पूजा, परिक्रमा और दान करना चाहिए।
- परिवार वाले अपने बच्चों को गाय का महत्व और उपयोगिता समझाएं।
गोपाष्टमी सिर्फ त्योहार नहीं बल्कि आस्था और विज्ञान का दिन भी है गाय की पूजा आस्था का विषय हो सकता है, लेकिन गाय के स्पर्श और गौमूत्र थेरेपी के साथ गोबर का विज्ञान भी मायने रखता है। गाय से सिर्फ पुण्य ही नहीं बढ़ते, पर्यावरण भी संतुलित रहता है। इसलिए इसे आस्था के साथ विज्ञान का दिन भी कहा जा सकता है।
– श्री पुंडरीक गोस्वामी (वृंदावन)
.