Anxiety Causes in Gen Z: दुनियाभर की नजरें इस वक्त जेनरेशन जेड (Gen Z) के युवाओं पर टिकी हुई हैं. जेन जेड में वे युवा आते हैं, जिनकी उम्र करीब 20-25 के आसपास है. यह जेनरेशन अभी सबसे ज्यादा यंग है और इससे उम्मीदें भी ज्यादा हैं. हालांकि जेन जेड के युवाओं के लिए यह समय काफी चैलेंजिंग हो गया है और उन्हें कम उम्र में ही मेंटल हेल्थ से जुड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. बदलती लाइफस्टाइल, हद से ज्यादा डिजिटल एक्सपोजर, सोशल मीडिया कल्चर और करियर के बढ़ते दबाव ने आज की युवा पीढ़ी की मेंटल हेल्थ को बुरी तरह प्रभावित कर दिया है.
भारत ही नहीं, बल्कि दुनियाभर में इस पीढ़ी के युवा अत्यधिक तनाव, चिंता और बेचैनी का सामना कर रहे हैं. आधुनिक दौर की तेज रफ्तार और अनिश्चितताओं से भरी जिंदगी युवा मन पर ऐसा बोझ डाल रही है, जिससे कई परेशानियां पैदा हो रही हैं. साल 2023 में आंध्र प्रदेश की एसआरएम यूनिवर्सिटी और कई अन्य संस्थानों ने हैदराबाद, चेन्नई, बैंगलुरु, पुणे, मुंबई, अहमदाबाद, कोलकाता और दिल्ली समेत 8 बड़े शहरों के जेन जी युवाओं को लेकर स्टडी की थी. इस स्टडी में 1628 युवाओं को शामिल किया गया था और इस स्टडी के नतीजे बेहद चौंकाने वाले थे. इसमें युवाओं की मेंटल हेल्थ से जुड़ी परेशानियां सामने आई थीं.
इस स्टडी में शामिल जेनरेशन जेड के करीब 70% युवाओं को मीडियम से सीवियर एंजायटी थी. करीब 60% युवाओं को डिप्रेशन और 70% से अधिक युवाओं में हाई लेवल डिस्ट्रेस दर्ज किया गया. ये आंकड़े बताते हैं कि युवाओं में मानसिक स्वास्थ्य समस्या अब कॉमन हो चुकी है. इस रिसर्च के अनुसार युवाओं में एंजायटी बढ़ने के कई वैज्ञानिक और सामाजिक कारण हैं. सबसे बड़ा कारण लगातार बढ़ता कॉम्पटीशन है, जो करियर चुनने से लेकर नौकरी पाने तक हर कदम पर तनाव पैदा करता है. इसके साथ करियर की अनिश्चितता, आर्थिक दबाव और समाज व परिवार की अपेक्षाएं एंजायटी को बढ़ा रही हैं.
सोशल मीडिया ने अन्य लोगों से जेनरेशन जेड युवाओं की तुलना को बढ़ा दिया है. यहां हर पोस्ट, लाइक और उपलब्धि देखकर युवा खुद की क्षमता को कमतर आंकते हैं. यह हीन भावना, दूसरों से तुलना और डिजिटल थकान मानसिक संतुलन को प्रभावित करती है. दूसरी ओर नींद की कमी, अनियमित दिनचर्या और शारीरिक गतिविधि में गिरावट भी वैज्ञानिक रूप से एंजायटी को बढ़ाने वाले प्रमुख फैक्टर्स हैं. युवाओं में बढ़ती चिंता केवल इमोशनल अनस्टेबिलिटी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उनकी प्रोडक्टिविटी, रिश्ता, सेल्फ कॉन्फिडेंस और फैसला लेने की क्षमता को भी प्रभावित करती है.
लंबे समय तक तनाव रहने से कोर्टिसोल नामक हार्मोन बढ़ जाता है, जो मानसिक थकावट, मूड स्विंग्स, चिड़चिड़ापन और स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बनता है. टीनएजर्स और यंग एज भावनात्मक रूप से सेंसिटिव होती है. ऐसे में लॉन्ग टर्म एंजायटी कुछ लोगों में पैनिक अटैक तक ले जा सकती है. इसलिए यह समस्या अनदेखी करने लायक नहीं है. अध्ययन बताता है कि समय पर सही कदम उठाने से युवाओं की एंजायटी को काफी हद तक कंट्रोल किया जा सकता है.
साइकोलॉजिकल हेल्फ और काउंसलिंग युवाओं को अपनी भावनाएं समझने और कंट्रोल करने में मदद करती है. रेगुलर एक्सरसाइज, योग और मेडिटेशन तनाव कम करने में असरदार होते हैं. सोशल मीडिया का सीमित उपयोग मानसिक बोझ घटाता है. पर्याप्त नींद और अच्छी डाइट भी मेंटल हेल्थ सुधारने में मददगार है. इसके अलावा परिवार और दोस्तों के साथ खुलकर अपनी भावनाएं शेयर करने से भी मानसिक दबाव काफी कम हो जाता है. युवाओं को समझना होगा कि चिंता कमजोरी नहीं, बल्कि जीवन के दबावों पर शरीर की प्राकृतिक प्रतिक्रिया है. समय रहते सहायता लेना और स्वस्थ आदतें अपनाना उन्हें मानसिक रूप से मजबूत और स्थिर बना सकता है.