अनुशासन से दोस्ती तक, समय के साथ कितना बदल गया परवरिश का अंदाज़?

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अनुशासन से दोस्ती तक, समय के साथ कितना बदल गया परवरिश का अंदाज़?

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Millennial Parenting vs Traditional Parenting : अगर हम आज के ‘मिलेनियल पेरेंट्स’ (Millennial Parents) की तुलना अपने नाना-नानी या दादा-दादी के जमाने के माता-पिता से करें, तो परवरिश के तरीके में जमीन-आसमान का अंतर नजर आता है. पहले जहां अनुशासन का मतलब ‘डर’ होता था, वहीं आज यह ‘दोस्ती’ और ‘संवाद’ में बदल चुका है. आइए समझते हैं कि समय के साथ बच्चों की परवरिश का यह सफर कैसा रहा है.

Modern Day Parenting Challenges:  पुराने जमाने में परवरिश का ढांचा अक्सर ‘अथॉरिटेटिव’ (Authoritative) होता था. माता-पिता का फैसला ही अंतिम होता था और बच्चों से सवाल पूछने की उम्मीद कम ही की जाती थी. “हमने कह दिया तो बस कह दिया” वाला रवैया अनुशासन बनाए रखने का मुख्य जरिया था. उस दौर में संयुक्त परिवार (Joint Families) की ताकत होती थी, जहाँ दादा-दादी और चाचा-चाची की मौजूदगी में बच्चा सामाजिक मर्यादाओं और साझा जिम्मेदारियों को खेल-खेल में ही सीख जाता था.

इसके विपरीत, मिलेनियल पेरेंट्स जेंटल पेरेंटिंग’ (Gentle Parenting) पर यकीन रखते हैं. आज के माता-पिता अपने बच्चों के साथ एक मित्रवत व्यवहार रखते हैं और उनकी भावनाओं को प्राथमिकता देते हैं. अब बच्चों को सिर्फ आदेश नहीं दिए जाते, बल्कि उन्हें हर काम के पीछे का तर्क समझाया जाता है. आज की पीढ़ी बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) को लेकर बहुत जागरूक है, जो पुराने समय में शायद ही कभी चर्चा का विषय बनता था.

पहले बच्चों का मनोरंजन गली-मोहल्ले के खेल और कहानियां तक सीमित थी, लेकिन आज के बच्चों के हाथ में जन्म से ही स्मार्टफोन और टैबलेट हैं. मिलेनियल पेरेंट्स के लिए सबसे बड़ी चुनौती ‘स्क्रीन टाइम’ को मैनेज करना है. तकनीक ने जहाँ जानकारी के दरवाजे खोले हैं, वहीं इसने बच्चों को बाहरी दुनिया से काट कर वर्चुअल दुनिया के खतरों के बीच भी खड़ा कर दिया है.

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एक और बड़ा बदलाव खान-पान और सेहत के प्रति नजरिए में आया है. पहले जो मिल गया वही खा लिया जाता था, लेकिन आज के पेरेंट्स बच्चों की डाइट में प्रोटीन, विटामिन और ओमेगा-3 जैसे तत्वों का हिसाब रखते हैं. वे जंक फूड के बजाय सत्तू, रागी और ओट्स जैसे सुपरफूड्स को बच्चों की थाली में सजा रहे हैं. वे इस बात को लेकर भी सतर्क रहते हैं कि बच्चा शारीरिक रूप से कितना सक्रिय है, क्योंकि आज के समय में मोटापा और कम उम्र में होने वाली बीमारियां एक बड़ी चिंता हैं.

मिलेनियल पेरेंट्स के सामने आज ‘इन्फॉर्मेशन ओवरलोड’ की एक नई चुनौती है. इंटरनेट पर परवरिश से जुड़ी इतनी सलाहें मौजूद हैं कि कई बार माता-पिता कंफ्यूज(Confused) हो जाते हैं. पुराने समय में माँ या नानी की एक सलाह ही काफी होती थी, लेकिन आज हर छोटी समस्या के लिए गूगल और एक्सपर्ट्स की राय ली जाती है. इस ‘परफेक्ट पेरेंट’ बनने की होड़ ने आज के माता-पिता में तनाव और एंग्जायटी (Anxiety) के स्तर को भी बढ़ा दिया है.

आज के दौर में ‘न्यूक्लियर फैमिली’ का बढ़ता चलन भी एक बड़ी चुनौती है. पहले जहाँ घर के बुजुर्ग बच्चों को संभाल लेते थे, अब वर्किंग कपल्स के लिए ऑफिस और बच्चे की परवरिश के बीच संतुलन बनाना मुश्किल हो गया है. बिना किसी पारिवारिक सपोर्ट के बच्चों को पालना और उन्हें सही संस्कार देना मिलेनियल पेरेंट्स के लिए किसी ‘मल्टीटास्किंग’ परीक्षा से कम नहीं है. वे अक्सर इस गिल्ट में रहते हैं कि क्या वे अपने बच्चों को पर्याप्त समय दे पा रहे हैं.

परवरिश का तरीका भले ही बदला हो लेकिन इंटेंशन बच्‍चे का बेहतर भविष्‍य रहता है. पुराने जमाने का अनुशासन बच्चों को मजबूत बनाता था, तो आज की कोमलता उन्हें संवेदनशील और जागरूक बना रही है. मिलेनियल पेरेंट्स के पास चुनौतियां ज्यादा हैं, लेकिन उनके पास संसाधनों और समझ की कमी नहीं है. जरूरत बस इस बात की है कि हम पुराने अनुभवों की गहराई और आधुनिक सोच की नवीनता के बीच एक सही संतुलन (Balance) बिठाएं.

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