‘दज्जाल’ का खौफ या डिजिटल अफवाह? सोशल मीडिया पर क्यों मचा है ‘कयामत’ का शोर, जानें पूरी सच्चाई

दज्जाल आने वाला है? सोशल मीडिया पर ‘Dajjal Coming Soon’, ‘Signs of Dajjal’ और ‘Qayamat Near’ जैसे कीवर्ड्स के साथ जो वीडियो तेजी से वायरल हो रहे हैं, उन्होंने लोगों के बीच एक डर और जिज्ञासा दोनों पैदा कर दी है, लेकिन सीधा और फेक्ट आधारित जवाब यही है कि अभी तक ऐसा कोई प्रमाणिक संकेत या पुष्टि नहीं है जो यह साबित करे कि दज्जाल के आने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है.

इस्लामी मान्यताओं में Dajjal (दज्जाल) का जिक्र जरूर मिलता है, जहां उसे कयामत से पहले आने वाला एक बड़ा धोखेबाज बताया गया है, लेकिन यह एक भविष्य से जुड़ी अवधारणा है और इसे लेकर अलग-अलग विद्वानों की अलग-अलग व्याख्याएं भी मौजूद हैं.

समस्या तब शुरू होती है जब Instagram Reels, YouTube Shorts और TikTok जैसे प्लेटफॉर्म पर बिना संदर्भ के हदीस, एडिटेड वीडियो और सनसनीखेज टाइटल्स के जरिए यह दावा किया जाने लगता है कि ‘End Time शुरू हो चुका है’ या ‘Dajjal आने वाला है’, जबकि इन दावों का कोई ठोस धार्मिक या तथ्यात्मक आधार नहीं होता.

सोशल मीडिया के इस दौर में असल में यह पूरा मामला एल्गोरिथम और यूजर बिहेवियर का है. डर और रहस्य से जुड़ा कंटेंट सबसे ज्यादा क्लिक और शेयर पाता है, इसलिए प्लेटफॉर्म्स उसे और ज्यादा लोगों तक पहुंचाते हैं.

हाल के समय में युद्ध, आर्थिक अनिश्चितता, प्राकृतिक आपदाएं और Artificial Intelligence (AI) जैसी चीजों को जोड़कर एक नैरेटिव बनाया जा रहा है कि ये ‘Signs of Dajjal’ हैं, जबकि सच्चाई यह है कि ऐसी घटनाएं इतिहास के हर दौर में अलग-अलग रूप में मौजूद रही हैं. धार्मिक ग्रंथों में जो संकेत बताए गए हैं, जैसे झूठ का बढ़ना, नैतिक गिरावट या भ्रम का फैलना, वे व्यापक हैं और उनकी कई व्याख्याएं हो सकती हैं, इसलिए हर वर्तमान घटना को सीधे ‘Qayamat’ से जोड़ना सही नहीं माना जाता.

कई आधुनिक स्कॉलर्स दज्जाल को सिर्फ एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक प्रतीक के रूप में भी देखते हैं, ऐसी शक्ति जो सच और झूठ के बीच की रेखा को धुंधला कर देती है. अगर इस नजरिए से आज के डिजिटल दौर को देखें, तो Deepfake, AI-generated content और Fake News का तेजी से फैलना इस बात की ओर जरूर इशारा करता है कि सूचना का संकट पहले से ज्यादा गहरा हो चुका है, लेकिन इसे सीधे इस निष्कर्ष से जोड़ देना कि Dajjal आ चुका है या आने वाला है, एक गलत और जल्दबाजी में लिया गया निष्कर्ष है.

विश्वसनीयता के नजरिए से इस विषय पर वही जानकारी मान्य है जो प्रमाणिक धार्मिक स्रोतों, स्थापित इस्लामी विद्वानों और शोध आधारित व्याख्याओं से आती है. सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे क्लिप्स, अनजान पेजों या बिना स्रोत वाले वीडियो को अंतिम सत्य मान लेना न केवल भ्रामक है बल्कि कई बार अनावश्यक डर भी पैदा करता है. ऐसे विषय, जो आस्था और भय दोनों से जुड़े हों, उनमें संतुलन और समझ सबसे ज्यादा जरूरी होती है.

अंत में सच्चाई यही है कि Dajjal का जिक्र धार्मिक परंपराओं में जरूर है, लेकिन ‘Dajjal Coming’ का जो ट्रेंड सोशल मीडिया पर चल रहा है, वह वास्तविकता से ज्यादा एक वायरल नैरेटिव है, जो डर, जिज्ञासा और क्लिकबेट पर आधारित है. ऐसे में सबसे समझदारी भरा कदम यही है कि हम हर जानकारी को जांचें, प्रमाणिक स्रोतों पर भरोसा करें और बिना वजह के डर को अपने ऊपर हावी न होने दें, क्योंकि आज के डिजिटल युग में सबसे बड़ा धोखा वही है जो सच की तरह दिखता है, लेकिन होता नहीं है

यह भी पढ़ें- फिलीपींस में खनन अभियान के दौरान मिले 10,000 साल पुराने त्रिशूल और वज्र! शोधकर्ता हुसैन का चौंकाने वाला दावा!

Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

.

Share me..

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *