थकान तुरंत फुर्र, दर्द छूमंतर…इतना ताकतवर पहाड़ों का ये कंद, खून की कमी का तगड़ा उपाय

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उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में उगने वाला तरूड़ पारंपरिक कंदमूल आहार है. यह अधिकतर बेल के रूप में जंगलों में पाया जाता है. पुराने समय में यह कंद पहाड़ों में रहने वाले लोगों के लिए ऊर्जा का बड़ा स्रोत हुआ करता था. आज भी बागेश्वर जैसे जिलों में इसे पारंपरिक आहार के रूप में खाया जाता है. कई बार एक ही बेल से कई किलो वजन का तरूड़ निकल आता है. इसे निकालते समय अनुभव की जरूरत होती है, क्योंकि गलत खुदाई से कंद खराब हो सकता है.

तरूड़ एक जंगली कंद है, जो बेल के रूप में जंगलों, झाड़ियों और खेतों की मेड़ों पर उगता है. यह मिट्टी के अंदर गहराई में विकसित होता है, ऊपर से इसकी पहचान पत्तियों और बेल से की जाती है. पहाड़ी क्षेत्रों में यह प्राकृतिक रूप से उगता है. बिना ज्यादा देखभाल के भी तैयार हो जाता है. पुराने समय में जब अनाज की कमी होती थी, तब तरूड़ लोगों के लिए भोजन और ऊर्जा का बड़ा सहारा था. आज भी बागेश्वर जैसे जिलों में इसे पारंपरिक आहार के रूप में जाना जाता है. यह कंद स्थानीय भोजन संस्कृति और वन आधारित जीवनशैली का अहम हिस्सा माना जाता है.

तरूड़ को निकालने की प्रक्रिया आसान नहीं होती है. यह जमीन के अंदर टेढ़ा-मेढ़ा और गहराई में फैला होता है. ग्रामीण लोग पहले बेल की दिशा और पत्तियों की बनावट से इसकी जड़ का अनुमान लगाते हैं. इसके बाद कुदाल या फावड़े से सावधानीपूर्वक खुदाई की जाती है ताकि कंद टूटे नहीं. कई बार एक ही बेल से कई किलो वजन का तरूड़ निकल आता है. इसे निकालते समय अनुभव की जरूरत होती है, क्योंकि गलत खुदाई से कंद खराब हो सकता है. यही कारण है कि यह काम अधिकतर अनुभवी ग्रामीण या बुजुर्ग ही करते हैं.

बागेश्वर के स्थानीय जानकार किशन मलड़ा बताते हैं कि तरूड़ की सही पहचान बेहद जरूरी है, क्योंकि कुछ जंगली कंद जहरीले भी हो सकते हैं. इसकी बेल लंबी होती है, पत्ते चौड़े व दिलनुमा आकार के होते हैं. कंद का बाहरी रंग भूरा और अंदर से हल्का सफेद या पीला होता है. अनुभवी लोग इसके स्वाद और गंध से भी पहचान लेते हैं. कच्चा तरूड़ हल्का कड़वा हो सकता है, इसलिए पकाने से पहले इसे ठीक से उबालना जरूरी माना जाता है. स्थानीय ज्ञान के बिना इसे तोड़ना या खाना सुरक्षित नहीं माना जाता है.

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तरूड़ को कंदमूल आहार इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह जमीन के अंदर विकसित होता है. सीधे जड़ के रूप में खाया जाता है. पहाड़ी इलाकों में कंद-मूल भोजन का महत्त्व इसलिए भी है क्योंकि यह कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में भी उपलब्ध रहता है. तरूड़ लंबे समय तक ऊर्जा देता है और पेट भरा-भरा महसूस कराता है. यही कारण है कि पुराने समय में यह मजदूरों, यात्रियों और किसानों का प्रिय भोजन रहा है. आज भी उपवास और पारंपरिक पकवानों में इसका उपयोग किया जाता है.

आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉ. ऐजल पटेल लोकल 18 से बताते हैं कि तरूड़ में आयरन, फास्फोरस, कैल्शियम और फाइबर अच्छी मात्रा में पाए जाते हैं. यह शरीर को ताकत देने के साथ-साथ खून की कमी को दूर करने में भी सहायक है. इसमें मौजूद फाइबर पाचन तंत्र को मजबूत बनाता है, कब्ज जैसी समस्याओं में राहत देता है. ग्रामीण क्षेत्रों में इसे बच्चों और बुजुर्गों के लिए भी लाभकारी माना जाता है. संतुलित मात्रा में सेवन करने से यह शरीर की इम्यूनिटी बढ़ाने में मदद करता है.

तरूड़ को आयुर्वेद में बलवर्धक और पाचन सुधारक माना गया है. यह कमजोरी, थकान और ऊर्जा की कमी में उपयोगी है. कुछ जगहों पर इसे जोड़ों के दर्द और सूजन में भी लाभकारी माना जाता है. उबालकर या भूनकर खाने से इसके दुष्प्रभाव नहीं होते हैं. नियमित लेकिन सीमित मात्रा में सेवन शरीर को अंदर से मजबूत बनाता है.

तरूड़ के नाम क्षेत्र के अनुसार बदल जाते हैं. कुमाऊं में इसे तरूड़ या तौड़ कहा जाता है, जबकि गढ़वाल में तैड़ू या टेडू नाम प्रचलित है. नाम भले अलग हों, लेकिन इसका महत्त्व हर क्षेत्र में समान है. लोकगीतों, कहावतों और पारंपरिक व्यंजनों में भी इसका जिक्र मिलता है. यह कंद पहाड़ की लोक-संस्कृति और प्रकृति से जुड़ाव का प्रतीक माना जाता है.

आज जब लोग प्रोसेस्ड भोजन की ओर बढ़ रहे हैं, ऐसे में तरूड़ जैसे पारंपरिक आहार को बचाना जरूरी है. यह न केवल सेहतमंद है, बल्कि पर्यावरण के अनुकूल भी है. जंगल और खेतों की मेड़ों पर उगने वाला यह कंद जैव विविधता का हिस्सा है. अगर नई पीढ़ी इसके महत्त्व को समझे, तो यह लोक-संस्कृति और स्वास्थ्य दोनों के लिए लाभकारी होगा है.

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