फेसबुक बनाने वाले मार्क जुकरबर्ग को दुनिया एक जीनियस मानती है, जिसने लोगों के बात करने का तरीका बदल दिया. लेकिन अगर आपने ये कहानी पढ़ ली तो आप उन्हें एक चोर मानना शुरू कर देंगे. जी हां, हम यह बात हवा में नहीं कर रहे, बल्कि इसके पीछे तथ्य हैं. फेसबुक दरअसल मार्क जुकरबर्ग के दिमाग की उपज था ही नहीं. इसके पीछे एक हिंदुस्तानी शख्स का दिमाग था. उसी हिंदुस्तानी के आइडिया से आज की सबसे बड़ी सोशल मीडिया कंपनी की बुनियाद रखी गई. चलते हैं साल 2004 में. उसी साल में फेसबुक लॉन्च हुआ था. जिस दिन यह लॉन्च हुआ, उसी दिन हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के एक कमरे में बैठे तीन दोस्त अवाक रह गए थे. उनमें से एक थे दिव्य नरेंद्र (Divya Narendra). दिव्य को उस वक्त ऐसा लगा, जैसे किसी ने उनके सपने ही चुरा लिए हों. और चोरी करने वाला कोई और नहीं, मार्क जुकरबर्ग ही था.
फेसबुक के आने से पहले की कहानी
दिव्य नरेंद्र का जन्म अमेरिका के न्यूयॉर्क में हुआ था. उनके माता-पिता भारत से अमेरिका जाकर बसे थे और दोनों ही डॉक्टर थे. दिव्य बचपन से ही पढ़ाई में बहुत तेज थे. उन्होंने अपनी स्कूल की पढ़ाई न्यूयॉर्क के एक बेहतरीन स्कूल से की और फिर उनका एडमिशन दुनिया की सबसे मशहूर यूनिवर्सिटी हार्वर्ड में हो गया. हार्वर्ड में पढ़ना किसी भी स्टूडेंट के लिए सपने जैसा होता है. वहां दिव्य की मुलाकात दो जुड़वा भाइयों से हुई, जिनका नाम था कैमरन और टायलर विंकलवोस. दिव्य और इन दोनों भाइयों की दोस्ती जल्द ही गहरी हो गई.
साल 2002-2003 के आसपास इंटरनेट दुनिया में अपनी जगह बना रहा था. उस समय लोग ई-मेल का इस्तेमाल तो करते थे, लेकिन कोई ऐसा प्लेटफॉर्म नहीं था, जहां कॉलेज के स्टूडेंट्स एक-दूसरे से जुड़ सकें, अपनी प्रोफाइल बना सकें या यह देख सकें कि उनके साथ कौन पढ़ रहा है. दिव्य के दिमाग में यह बात बिल्कुल साफ थी कि लोगों को आपस में जोड़ने के लिए एक डिजिटल प्लेटफॉर्म की जरूरत है. उन्होंने अपने दोनों दोस्तों के साथ मिलकर एक प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया, जिसका नाम रखा गया ‘हार्वर्ड कनेक्शन’. यह आइडिया उस वक्त के हिसाब से बेहद नया था. उनका मकसद था कि हार्वर्ड के स्टूडेंट्स एक-दूसरे को ऑनलाइन ढूंढ सकें और दोस्ती कर सकें.
एक कोड करने वाले की खोज
दिव्य नरेंद्र और विंकलवोस ब्रदर्स इस प्रोजेक्ट पर काम तो कर रहे थे, लेकिन उन्हें एक ऐसे कोडर की जरूरत थी, जो उनके विजन को हकीकत में बदल सके. दिव्य ने पूरी प्लानिंग कर ली थी, लेकिन वेबसाइट बनाने के लिए जिस टेक्निकल समझ की जरूरत थी, उसके लिए वे किसी एक्सपर्ट की तलाश में थे. तभी उनकी नजर हार्वर्ड में पढ़ने वाले एक छोटे कद के लड़के पर पड़ी, जो कोडिंग में माहिर माना जाता था. वह लड़का कोई और नहीं, बल्कि मार्क जुकरबर्ग था. दिव्य ने मार्क से मुलाकात की और उसे अपना पूरा आइडिया समझाया. पूरी प्लानिंग के ईमेल भेजे. उन्होंने बताया कि यह वेबसाइट सिर्फ हार्वर्ड के स्टूडेंट्स के लिए होगी, और बाद में इसे दूसरे कॉलेजों तक ले जाया जाएगा.
उस वक्त मार्क जुकरबर्ग ने इस काम में काफी दिलचस्पी दिखाई. दिव्य और मार्क के बीच कई मीटिंग्स हुईं. दिव्य को लगा कि उन्हें अपना कोडर मिल गया है, जो उनके सपने को पूरा करेगा. मार्क ने वादा किया कि वह जल्द ही वेबसाइट तैयार कर देगा.
कोड करने वाला जुकरबर्ग हो गया गायब!
कई महीनों तक दिव्य और उनके दोस्त मार्क के जवाब का इंतजार करते रहे. दिव्य मार्क को ई-मेल करते, उससे अपडेट मांगते, लेकिन उसकी तरफ से जवाब आना धीरे-धीरे कम होने लगा. हर बार मार्क कोई न कोई बहाना बना देता, कभी बिजी होने का, तो कभी कोड में दिक्कत आने का. दिव्य को उस वक्त जरा भी अंदाजा नहीं था कि पर्दे के पीछे कुछ और ही चल रहा है.
फिर एक दिन ऐसा आया, जिसने दिव्य नरेंद्र की दुनिया बदल दी. 4 फरवरी 2004 को हार्वर्ड कैंपस में शोर मच गया कि एक नई वेबसाइट लॉन्च हुई है, जिसका नाम है फेसबुक. जब दिव्य ने अपने कंप्यूटर पर वह वेबसाइट खोली, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई. फेसबुक का मॉडल बिल्कुल वैसा ही था, जैसा दिव्य ने मार्क को समझाया था. दिव्य को समझ आ गया कि मार्क जुकरबर्ग ने उनके आइडिया पर काम करने के बजाय अपना खुद का प्लेटफॉर्म खड़ा कर लिया है. यह दिव्य के लिए एक बड़ा झटका था, क्योंकि उन्होंने मार्क पर भरोसा किया था और अपना पूरा प्लान उसके साथ शेयर किया था.
कॉरपोरेट जगत की मशहूर कानूनी लड़ाई
दिव्य और विंकलवोस ब्रदर चुप बैठने वालों में से नहीं थे. उन्होंने आरोप लगाया कि मार्क ने उनका आइडिया और कॉन्सेप्ट चुरा लिया है. हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रशासन से शिकायत की गई, लेकिन वहां से कोई खास मदद नहीं मिली. इसके बाद शुरू हुई दुनिया की सबसे मशहूर कानूनी लड़ाइयों में से एक लड़ाई.
दिव्य नरेंद्र और उनके साथियों ने मार्क जुकरबर्ग पर मुकदमा कर दिया. यह लड़ाई 2004 से 2008 तक चली. इस दौरान फेसबुक एक बड़ी सोशल मीडिया कंपनी बनती जा रही थी, और दिव्य अपनी पहचान की लड़ाई लड़ रहे थे. कोर्ट में कई ई-मेल सबूत के तौर पर पेश किए गए, जिनसे यह साबित होता था कि दिव्य और मार्क के बीच आइडिया को लेकर बातचीत हुई थी.
जुकरबर्ग ने 65 मिलियन डॉलर देकर किया समझौता
फेसबुक और दिव्य नरेंद्र के बीच यह जंग सिर्फ पैसों की नहीं थी, बल्कि क्रेडिट की थी. दिव्य चाहते थे कि दुनिया को पता चले कि असली सोच किसकी थी. आखिरकार 2008 में दोनों पक्षों के बीच समझौता हुआ. मार्क जुकरबर्ग ने दिव्य नरेंद्र और विंकलवोस भाइयों को करीब 65 मिलियन डॉलर, यानी उस वक्त के हिसाब से लगभग 260 करोड़ रुपये देने पर सहमति जताई. इसमें कुछ रकम नकद थी और कुछ फेसबुक के शेयरों के रूप में. हालांकि यह रकम फेसबुक की असली वैल्यू के मुकाबले बहुत छोटी थी, लेकिन इससे यह साफ हो गया कि दिव्य के दावों में दम था.
दिव्य ने बनाया समजीरो, बन गए हीरो
समझौते के बाद दिव्य नरेंद्र ने अपनी जिंदगी को नई दिशा दी. उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और आगे चलकर फाइनेंस और कानून की डिग्री ली. दिव्य ने साबित किया कि उनके पास सिर्फ एक ही आइडिया नहीं था. साल 2008 में ही उन्होंने एक नया स्टार्टअप शुरू किया, जिसका नाम था समजीरो (SumZero). यह एक ऐसा प्लेटफॉर्म है, जो दुनिया भर के प्रोफेशनल इन्वेस्टर्स को एक साथ लाता है. जहां फेसबुक आम लोगों के लिए थी, वहीं समजीरो खास तौर पर उन लोगों के लिए बनाई गई, जो शेयर मार्केट और निवेश की गहरी समझ रखते हैं. आज समजीरो अपनी फील्ड में एक बड़ा नाम बन चुका है.
एक फिल्म में भी दिखी सेम कहानी
दिव्य नरेंद्र की इस कहानी को हॉलीवुड फिल्म ‘द सोशल नेटवर्क’ में भी दिखाया गया है. हालांकि दिव्य का कहना है कि फिल्म में कई चीज़ों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया, लेकिन इस फिल्म ने दुनिया को यह जरूर बता दिया कि फेसबुक के पीछे एक भारतीय चेहरा भी था.
दिव्य आज एक सफल बिजनेसमैन हैं और न्यूयॉर्क में रहते हैं. वह अक्सर स्टार्टअप और बिजनेस की दुनिया में होने वाले उतार-चढ़ाव पर अपनी राय रखते हैं. उनकी कंपनी समजीरो में हजारों प्रोफेशनल मेंबर्स हैं और इसकी वैल्यू भी करोड़ों में है.
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