अमेरिकी सेना जब किसी युद्ध या आपरेशन में उतरती है तो उसका सबसे पहला मोटो या नारा होता है – लिव नो मैन बिहाइंड यानि कभी अपने किसी साथी को पीछे मत छोड़ो. अगर वो छूट गया है या फंस गया है तो जान की बाजी लगाकर भी उसे वापस लेकर आना.
अमेरिका की सेना में ये भावनात्मक सिद्धांत गहराई से स्थापित है कि “अपने साथी को कभी मत छोड़ो”. ये अमेरिकी सेना सबसे प्रसिद्ध मोटो है. अमेरिकी सेना और अमेरिकी मैरीन कोर इसके लिए जान तक लड़ा देती है. चाहे हालात कितने भी खतरनाक क्यों न हों, किसी भी सैनिक को दुश्मन के इलाके में अकेला नहीं छोड़ा जाएगा – जीवित या मृत. ये केवल एक नारा नहीं, बल्कि ऑपरेशन प्लानिंग का हिस्सा होता है.
ईरान ने शुक्रवार को एक एफ-15ई स्ट्राइक ईगल विमान को मार गिराया. ये 20 सालों में पहली बार हुआ जबकि अमेरिका ने दुश्मन की गोलीबारी में अपना कोई सैन्य लड़ाकू विमान खोया. पिछली बार ऐसा 2003 में इराक में हुआ था. विमान में दो चालक दल के सदस्य सवार थे – पायलट और एक हथियार प्रणाली अधिकारी. दोनों ने इजेक्ट किया. पायलट को जल्द ही बचा लिया गया. लेकिन दूसरा अधिकारी लापता हो गया. उसको अमेरिका ने रेस्क्यू अभियान चलाकर ईरान से सकुशल निकाला.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इसे “अमेरिकी इतिहास के सबसे साहसी खोज और बचाव अभियानों में से एक” बताया.
अगर ऐसा हुआ तो तुरंत क्या करते हैं?
जब कोई पायलट या सैनिक दुश्मन क्षेत्र में गिर जाता है तो उसे निकालने के लिए खास मिशन होते हैं, जिन्हें CSAR यानि कांबैट सर्च एंड रेस्क्यू कहा जाता है. इन्हें अमेरिकी एयरफोर्स की पैराशूट यूनिट्स, अमेरिकी नेवी की सील्स यूनिट और अमेरिकी सेना की स्पेशल फोर्सेज मिलकर हिस्सा लेते हैं. उनकी ट्रेनिंग इस मोटो को हमेशा मजबूत करती है कि साथी को कभी पीछे मत छोड़ो.
अमेरिका का कांबैट सर्च एंड रेस्क्यू ऑपरेशन दुनिया में बेस्ट माना जाता है. (news18 ai image)
क्या है अमेरिकी सेना का मोटो
पैराशूट का मोटो है – दैट अदर्स मे लिव यानि हम अपनी जान जोखिम में डालेंगे ताकि दूसरे जीवित रह सकें. ये उनके उन मिशन की मानसिक रीढ़ है, जहां पायलट को दुश्मन इलाके से निकालना होता है. अमेरिकी सैनिकों को एक आधिकारिक आचार संहिता सिखाई जाती है जिसे अमेरिकी मिलिट्री कोड ऑप कंडक्ट कहते हैं. इसमें साफ कहा गया है, कैद होने पर भी अपने साथियों के बारे में जानकारी नहीं देंगे. हर संभव कोशिश करेंगे कि वापस लौटें और अपने साथियों के प्रति वफादार रहेंगे.
ये अमेरिकी सेना ने कहां सबसे ज्यादा किया
ये सोच यूं ही नहीं. इसे कई युद्धों ने मजबूत किया. दरअसल वियतनाम युद्ध में जहां कई पायलट दुश्मन क्षेत्र में गिरते थे, वहां ऐसे रेस्क्यू ऑपरेशन आम हो गए. इन युद्धों ने सिखाया कि अगर सैनिक को भरोसा हो कि उसे छोड़ा नहीं जाएगा, तो उसका मनोबल कई गुना बढ़ जाता है.
कैसे इसकी कड़ी ट्रेनिंग लेती है अमेरिकी सेना
दुश्मन के इलाके में दुर्घटनाग्रस्त विमानों से सैनिकों को बचाना सबसे जोखिम भरे और जटिल सैन्य अभियानों में से एक है. अमेरिकी सेनाएं ऐसे अभियानों के लिए व्यापक प्रशिक्षण लेती हैं, जबकि पायलट दुश्मन की सीमा के पीछे फंस जाने की स्थिति में जीवित रहने के लिए कठोर प्रशिक्षण लेते हैं.
सैनिकों को युद्ध क्षेत्र में दुश्मन के इलाके में फंस जाने की स्थिति में क्या करना है, इसका काफी तगड़ा प्रशिक्षण दिया जाता है. इसे दूसरे वर्ल्ड वार के दौरान अंग्रेजों द्वारा विकसित किया गया था. अमेरिका ने इसे अपने तरीके से ढाला. उन्हें ये मालूम होता है कि उन्हें बचाने के लिए हरसंभव कोशिश की जाएगी, लिहाजा उन्हें दुश्मन द्वारा पकड़े जाने से बचने के तरीके सिखाए जाते हैं कि खुद को कैसे दुश्मन के हाथों में नहीं पड़ने दें.
रेस्क्यू टीम किस तरह बनती है
असल बात यह है कि अमेरिका में ऐसी टीम घटना के बाद नहीं बनाई जाती. वह पहले से स्टैंडबाय रहती है. इसमें अमेरिकी एयरफोर्स के सीएसएआर यूनिट्स, नौसेना की सील टीम और थल सेना के 160 सोर यूनिट्स के लोग शामिल होते हैं. सोर यूनिट्स के लोग रात के आपरेशन में माहिर होते हैं. ये पूरी टीम 24 घंटे के भीतर क्विक रिएक्शन फोर्स के तौर पर तैयार की जाती है.
मतलब ये है कि जैसे ही कोई पायलट गिरता है तो टीम बनाना नहीं पड़ता, बस इसे एक्टिवेट किया जाता है.
अमेरिका में रेस्क्यू टीम किसी घटना के बाद नहीं बनाई जाती. वह पहले से स्टैंडबाय रहती है. (news18 ai image)
कितनी देर में एक्टिवेशन होता है
ये पूरी प्रक्रिया मिनटों में शुरू हो जाती है. लोकेशन मिनटों में ट्रैक कर लेते हैं. फिर 15 मिनट के भीतर नजदीकी CSAR यूनिट को अलर्ट किया जाता है. हेलीकॉप्टर, फाइटर एस्कॉर्ट और ड्रोन तैयार हो चुके होते हैं. तीसरा चरण 15 मिनट बाद शुरू होता है. हेलीकॉप्टर उड़ान भर देता है. उसे फाइटर जेट्स कवर करते हैं. कई मामलों में आधे घंटे के अंदर रेस्क्यू मिशन हवा में होता है.
गोल्डेन ऑवर क्या होता है
रेस्क्यू ऑपरेशन में एक अहम सिद्धांत होता है कि पहला घंटा गोल्डेन ऑवर है. इसका मतलब अगर पायलट को 1 घंटे के भीतर लोकेट और सुरक्षित किया जाए तो बचने की संभावना बहुत ज्यादा होती है. दुश्मन के हाथ लगने का खतरा भी कम रहता है. इसलिए कोशिश होती है कि लापता सैनिक या अफसर से 1-2 घंटे में संपर्क करके उसे कुछ घंटों में निकाल लिया जाए.
ऑपरेशन की टाइमलाइन क्या होती है
ऑपरेशन की टाइमलाइन हालात के हिसाब से बदलती है. पहले एक से दो घंटे को आसान परिस्थिति माना जाता है, जिसमें आसानी से रेस्क्यू हो जाता है. अगर ऑपरेशन दुश्मन के क्षेत्र में करना होता है तो इसे मध्यम खतरा माना जाता है, इसमें रेस्क्यू में 2 से 6 घंटे लग सकते हैं. इसमें पहले सर्विलांस करके साथी को निकालने का काम होता है. अगर दुश्मन ईरान जैसा देश हो जहां ये ऑपरेशन करना हो तो इसे हाई रिस्क माना जाता है. इसमें तुरंत रेस्क्यू नहीं करते बल्कि पहले जितनी भी खुफिया जानकारियां जुटाई जा सकती हैं, वो सब जुटाते हैं.
कई बार इस काम में 24 घंटे से 48 घंटे का समय भी लग जाता है. हालांकि रेस्क्यू तेजी से करने के भी कारण होते हैं
– गिरते ही दुश्मन भी पायलट को खोजने निकल जाता है
– पायलट के पास सीमित खाना, पानी और छिपने की क्षमता होती है
– अगर पायलट पकड़ा गया तो मामला कूटनीतिक संकट बन जाता है
क्या अमेरिका का इस तरह का रेस्क्यू ऑपरेशन दुनिया में बेस्ट है
ये कहा जा सकता है – हां. लेकिन ये भी कहना चाहिए कि अमेरिका इस क्षेत्र में सबसे आगे जरूर है, पर कुछ खास परिस्थितियों में दूसरे देश भी उतने ही सक्षम या कभी-कभी बेहतर साबित होते हैं. दरअसल अमेरिका का इसके लिए पूरा एक डेडिकेटेड सिस्टम है. इसके लिए जो काम्बेट सर्च और रेस्क्यू टीम बनती है, उस नेटवर्क को दुनिया में सबसे विकसित माना जाता है. कई देशों में रेस्क्यू एक काम है, अमेरिका में यह पूरी अलग स्पेशलाइज्ड फोर्स है. वो इस काम को दुनिया में कहीं भी पहुंचकर अंजाम देने में सक्षम हैं.
यूएस मिलिट्री की सबसे बड़ी ताकत ये है कि दुनियाभर में उसके बेस हैं. एयरक्राफ्ट करियर हैं और एयर रिफ्यूलिंग है. इसलिए अमेरिका हजारों किलोमीटर दूर भी रेस्क्यू कर सकता है.
इसके लिए उनके पास एडवांस तकनीक है. पायलट का लोकेशन मिनटों में ट्रैक हो जाता है. अमेरिका ने लगातार ऐसे ऑपरेशन किए हैं. लेकिन इस काम में इजरायल भी कम नहीं है. वो भी बहुत तेज और सटीक ऑपरेशन में माहिर हैं. दुश्मन इलाके में घुसकर अपने लोगों को निकालने का उनका रिकॉर्ड रहा है. कई विशेषज्ञ मानते हैं कि हाई रिस्क सर्जिकल रेस्क्यू में इज़राइल टॉप पर है.
ब्रिटिश स्पेशल एयरफोर्स भी इसमें माहिर मानी जाती है, वो इस काम की सबसे पुरानी और एलीट स्पेशल फोर्सेज में एक हैं. रूस भी इस मामले में कम नहीं. यहां तक कि इंडियन आर्म्ड फोर्सेज शानदार तरीके से कई अभियानों को अंजाम दिया है. लेकिन अभी उसकी ग्लोबल रीज नहीं है. वैसे ये कह सकते हैं कि इस मामले में अमेरिका का सिस्टम सबसे बड़ा और सबसे एडवांस है.
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