हिम्मत की मिसाल! दोनों पैरों से दिव्यांग, पर हौसले से श्रवण ने बदली किस्मत, सालाना कमा रहे 5 लाख

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Success Story: गुमला के जगबगीचा गांव के दिव्यांग श्रवण उरांव आज के युवाओं के लिए प्ररेणास्त्रोत है. रेल हादसे में दोनों पैर गंवाने के बाद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. सूअर पालन से सालाना 4-5 लाख रुपये कमाकर मिसाल कायम की है. आज तीन लोगों का परिवार खुद पाल रहे हैं. उनका कहना है कि दिव्यांग हूं तो क्या हुआ, किसी के सामने भीख नहीं मांगता हूं. खुद की मेहनत से लाखों की कमाई करता हूं.

गुमला: कहते हैं अगर इरादा मजबूत हो और मेहनत सच्ची हो तो कोई भी मजबूरी इंसान की राह नहीं रोक सकती. इसी बात को सच कर दिखाया है गुमला जिले के घाघरा प्रखंड के जगबगीचा गांव निवासी दिव्यांग श्रवण उरांव ने. दोनों पैरों से दिव्यांग होने के बावजूद श्रवण आज सालाना 4 से 5 लाख रुपये की कमाई कर रहे हैं. सम्मान के साथ अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं.

पैरों से दिव्यांग, पर लाखों का सफर किया तय
श्रवण उरांव एक साधारण परिवार से आते हैं. वे काम की तलाश में अक्सर घर से बाहर दूसरे राज्यों में जाते थे. लेकिन कुछ साल पहले उनके जीवन में बड़ी दुर्घटना हुई. सफर के दौरान रेल हादसे में श्रवण के दोनों पैर ट्रेन से कट गए. लगभग एक महीने तक अस्पताल में इलाज चला. इसके बाद वे घर लौट आए, लेकिन जिंदगी कठिन हो चुकी थी. चलना-फिरना मुश्किल था और काम करने की उम्मीद भी टूट चुकी थी.

श्रवण ने बताया कि हादसे के बाद वे पूरी तरह निराश हो गए थे. इस दौरान उनकी शादी भी हो गई. पत्नी भी दिव्यांग हैं. ऐसे में घर चलाना चुनौती बन गया. लेकिन श्रवण टूटे नहीं. उन्होंने सोचा कि अगर नौकरी नहीं मिलती तो खुद का काम शुरू करेंगे.

फूफा के घर ने दिखाया सफल रास्ता
इसी दौरान वे अपने फूफा के घर गए. वहां देखा कि फूफा सूअर पालन कर अच्छा कमा रहे हैं. श्रवण के मन में उम्मीद की किरण जगी और उन्होंने भी सूअर पालन शुरू करने का फैसला किया. उन्होंने किसी तरह व्यवस्था करके दो सूअर खरीदे और घर के आंगन में उनका पालन शुरू कर दिया. उन्होंने बताया कि शुरुआत में बहुत मुश्किल हुई. कई सूअर बीमारी से मर भी गए. लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी.

यहां से सीखा सही तरीका
इसके बाद श्रवण को जानकारी मिली कि गुमला के सिलम स्थित बैंक ऑफ इंडिया ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान (RSETI) में सूअर पालन की मुफ्त ट्रेनिंग दी जाती है. उन्होंने ट्रेनिंग ली और बीमारी से बचाव, दवाई, सही खान-पान और देखभाल के तरीके सीखे. ट्रेनिंग के बाद उनकी मेहनत ने रफ्तार पकड़ ली. अब उनके यहां 25 से ज्यादा सूअर हमेशा रहते हैं. एक सूअर 10-12 महीने में तैयार हो जाता है. 2 सूअर 25-30 हजार रुपए में बिकता है. तैयार सूअर को व्यापारी खुद उनके घर आकर खरीद लेते हैं.

हादेस ने पैर छीने, लेकिन हौसला नहीं
श्रवण कहते हैं कि हादसे ने मेरे पैर छीन लिए, लेकिन हौसला नहीं. आज श्रवण हर साल 4 से 5 लाख रुपये तक कमा लेते हैं. वह अपनी ट्राईसाइकिल से खुद चारा लाते हैं. साफ-सफाई और दवाइयों का सारा काम खुद करते हैं. उनकी पत्नी भी उनका पूरा साथ देती हैं. उनका कहना है कि सरकार और समाज अगर मदद करे तो मेरे जैसे कई लोग अपनी जिंदगी बदल सकते हैं. गांव के लोग भी अब श्रवण को प्रेरणा के रूप में देखते हैं. उनका जीवन बताता है कि मुश्किलें चाहे कितनी भी बड़ी हों, मेहनत और आत्मविश्वास के आगे हार नहीं सकतीं.

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Amit ranjan

मैंने अपने 12 वर्षों के करियर में इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम किया है। मेरा सफर स्टार न्यूज से शुरू हुआ और दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर डिजिटल और लोकल 18 तक पहुंचा। रिपोर्टिंग से ले…और पढ़ें

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दिव्यांग हूं तो क्या हुआ? मेहनत से 5 लाख कमाता हूं, कहीं हाथ नहीं फैलाता

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