बेगुनाह होकर भी 900 दिन जेल में रही: एमपी हाईकोर्ट ने 10 मिनट में बरी किया; 200 रु. के लिए बिखरा परिवार, पति की मौत – Madhya Pradesh News

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ये सवाल भोपाल के इतवारा इलाके में रहने वाली 50 साल की रेखा बाई का है। बेगुनाह होकर भी 900 दिन तक जेल में रहने वाली रेखा की आवाज में रिहाई की खुशी कम, सिस्टम के दिए जख्मों का दर्द ज्यादा है।

रेखा का कसूर केवल इतना था कि वह पढ़ी लिखी नहीं है और बिना सोचे समझे उसने 200 रु. के लिए अंगूठे का निशान कागजों पर लगा दिया था। धोखाधड़ी के आरोप में पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया।

निचली अदालत ने रेखा को 7 साल की सजा सुनाई, लेकिन जब मामला एमपी हाईकोर्ट पहुंचा तो कोर्ट ने 8 सितंबर को 10 मिनट में ही रेखा को सारे आरोपों से बरी कर दिया, लेकिन 9 साल की लंबी कानून लड़ाई में रेखा ने अपने पति के साथ बेटे का भविष्य और सामाजिक सम्मान खो दिया।

बता दें कि जिस दिन रेखा को हाईकोर्ट ने रिहा किया उसी दिन सुप्रीम कोर्ट ने मप्र सरकार को फटकार लगाई थी। दरअसल, रेप के एक आरोपी की सजा हाईकोर्ट ने कम कर 7 साल कर दी थी इसके बाद भी वह 11 साल तक जेल में रहा।

सुप्रीम कोर्ट ने इसे गंभीर चूक और प्रशासनिक विफलता माना था। रेखा के साथ क्या हुआ था और हाईकोर्ट ने 10 मिनट में उसे कैसे बरी किया। पढ़िए रिपोर्ट…

पहले जानिए रेखा बाई गिरफ्तार क्यों हुई?

विनोद कुमार सोनी ने पुलिस में शिकायत की थी कि भोपाल में उनके परिवार के स्वामित्व वाला एक भूखंड, जिस पर उनकी दिवंगत मां कौशल्या देवी सोनी का नाम दर्ज था, उस पर फर्जी दस्तावेजों के आधार पर अवैध कब्जा कर लिया गया है। शिकायत के अनुसार, विनोद कुमार की मां कौशल्या देवी का निधन 1996 में हो गया था।

इसके बाद किसी महिला ने खुद को कौशल्या देवी बताकर एक जाली पावर ऑफ अटॉर्नी तैयार की। इस जाली दस्तावेज का उपयोग करके, उस भूखंड को मनोहर पुरविया के माध्यम से शैल कुमार सिंह और सरोज सिंह को बेच दिया गया था। पुलिस की जांच में यह सामने आया कि रेखा बाई ने ही कौशल्या देवी के फर्जी साइन किए और मनोहर पुरविया को पावर ऑफ अटॉर्नी दी थी।

इसके बाद रेखा बाई को फरवरी 2015 में अशोका गार्डन थाना पुलिस ने गिरफ्तार किया और दोषी मानकर जेल भेज दिया था। वे तकरीबन एक साल तक जेल में रही। कई बार आवेदन देने के बाद उन्हें स्वास्थ्य कारणों के चलते हाइकोर्ट से 10,000 रूपए मुचलके पर जमानत मिली। उसके बाद 29 जनवरी 2024 को जिला एवं सत्र न्यायालय, भोपाल ने रेखा बाई को दोषी माना और 7 साल की सजा सुनाई ।

हाईकोर्ट में एक भी दावा सही साबित नहीं हुआ हाईकोर्ट में रेखा बाई को न्याय दिलाने वाले वकील मनोज चतुर्वेदी कहते हैं कि रेखाबाई की जमानत की 3 याचिकाएं खारिज हो चुकी थीं। इसके बाद हमने अर्जेंट हियरिंग के लिए अपील की। फाइनल हियरिंग के दौरान जस्टिस राजेंद्र कुमार वाणी ने कहा कि आपकी अपील सुनने में टाइम लगेगा। मैंने कहा कि आप मुझे 10 मिनट से ज्यादा का समय मत देना।

यदि 10 से 11 मिनट का समय होता है, तो आप इस केस को चार महीने के लिए और बढ़ा दीजिएगा। मैंने अपना पूरा आर्ग्युमेंट 10 मिनट में पूरा कर दिया। जस्टिस राजेंद्र कुमार वाणी ने दोनों पक्षों के तर्क सुनने और सारे कागजात देखने के बाद अपना फैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने पाया-

  • अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि जब्त की गई पावर ऑफ अटॉर्नी पर अंगूठे का निशान रेखा बाई का था।
  • दस्तावेजों पर लगी तस्वीरें रेखा बाई की हैं, यह साबित करने के लिए कोई विश्वसनीय सबूत नहीं था।
  • शिकायतकर्ता विनोद कुमार सोनी के बयानों में विसंगतियां थीं, क्योंकि उन्होंने भूखंड पर घर मिलने के समय के बारे में अलग-अलग बातें कहीं।
  • जांच अधिकारी अरविंद खरे ने भी माना कि उनके पास रेखा बाई के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं था।
  • रेखा बाई द्वारा बैंक खाता खोलने से संबंधित सबूत अभियोजन पक्ष के लिए बेकार था, क्योंकि इस संबंध में उनके खिलाफ कोई आरोप नहीं लगाया गया था।

इन तथ्यों के आधार पर कोर्ट ने रेखा बाई को न सिर्फ़ बरी किया, बल्कि उन पर लगाया गया जुर्माना भी वापस करने का आदेश दिया।

वकील बोले- न्याय व्यवस्था में कमियां दूर करने की जरूरत रेखाबाई का हाईकोर्ट में केस लड़ने वाले एडवोकेट मनोज चतुर्वेदी कहते हैं कि रेखाबाई को जानबूझकर इस मामले में फंसाया गया था। पुलिस ने रेखाबाई के साथ एक और आरोपी बनाया था। सत्र न्यायालय ने अपने फैसले में दूसरे आरोपी को दोषमुक्त कर दिया, जबकि रेखाबाई को दोषी ठहराते हुए सात साल की सजा सुनाई ।

यहां पर सत्र न्यायालय को यह देखना चाहिए था कि जब दूसरे आरोपी को बरी कर दिया गया और रेखाबाई के खिलाफ भी कोई और सबूत नहीं था, तो उन्हें सजा क्यों दी गई? इस बात की अनदेखी करते हुए, माननीय सत्र न्यायालय ने रेखाबाई को अनावश्यक रूप से दोषी ठहराया।

चतुर्वेदी कहते हैं कि हमारे न्याय व्यवस्था में कुछ कमियां हैं, जिन्हें दूर करने की जिम्मेदारी माननीय उच्च न्यायालय की है। अधीनस्थ न्यायालय के अधिकारियों को सही ट्रेनिंग नहीं मिलती। वहीं जिला कोर्ट में रेखा बाई के केस की पैरवी करने वाले एडवोकेट अमित दुबे का कहना है कि पुलिस की गलत जांच का खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा। दोषी पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई होना चाहिए। असली दोषी अभी भी बाहर है।

अब जानिए कैसे बदली रेखा बाई की जिंदगी

200 रुपए के लिए दस्तावेजों पर साइन किए रेखा बाई कहती हैं कि ये साल 2006 की बात है। मैं दूसरों के घरों में काम करती थी और पति दिहाड़ी मजदूर थे। दोनों को दिन भर की मेहनत के बाद 70-80 रुपए मिलते थे। एक दिन एक व्यक्ति मेरे पास आया और सरकारी योजना का फायदा दिलाने का झांसा दिया। उसने कुछ घंटों के काम के बदले 200 रुपए देने का वादा किया।

रेखा बाई बताती हैं, ‘पति ने कहा कि चली जाओ, कुछ पैसे आ जाएंगे। मैं उस आदमी के साथ गई। उसने मेरी एक फोटो खिंचवाई और एक कागज पर दो जगह अंगूठा लगवाया। मुझे 200 रुपए मिल गए। उस दिन के बाद न तो वह आदमी कभी दिखा और न ही मुझे कोई योजना का फायदा मिला। मुझे ये भी पता नहीं था कि उसने किन दस्तावेजों पर साइन लिए थे।’​​​

रेखा बाई को पता ही नहीं कि जिन दस्तावेजों पर अंगूठा लिया गया उनमें क्या लिखा था।

रेखा बाई को पता ही नहीं कि जिन दस्तावेजों पर अंगूठा लिया गया उनमें क्या लिखा था।

9 साल बाद पुलिस ने किया गिरफ्तार और बिखर गया परिवार इस घटना के ठीक 9 साल बाद, फरवरी 2015 की एक सुबह, जब मेरा 15 साल का बेटा सो रहा था और घर में बेटी को देखने लड़के वाले आने वाले थे, तो घर पर पुलिस आई। मुझे अशोका गार्डन थाने ले गई। मैंने पुलिस वालों से पूछा कि मुझे यहां क्यों लाए, तो बोले कि मैंने एक प्लॉट को उसकी मालकिन कौशल्या देवी बनकर बेच दिया है।

मैंने पुलिस वालों को कहा कि मेरे पति की किडनी खराब है, बेटे की 10वीं की परीक्षा है, बेटी की शादी की बात चल रही है। मैंने कुछ नहीं किया, लेकिन मेरी एक नहीं सुनी गई। उस दिन के बाद मेरा पूरा परिवार बिखर गया। पति की तबीयत बिगड़ती चली गई। बेटे के हाथ से कलम छूट गई और उसने 10वीं की परीक्षा की जगह मंडी में बोरियां उठाने का काम थाम लिया। बेटी की शादी टूट गई।

जेल से बाहर आई तब तक पति का देहांत हो चुका था रेखा बाई बताती हैं कि 2015 में जब मुझे गिरफ्तार किया, तब मेरे पेट की गांठ का इलाज चल रहा था। कुछ दिनों पहले ही ऑपरेशन हुआ था। घाव ठीक भी नहीं हुआ था। मैंने पुलिसवालों को बताया तो उन्होंने कहा कि जेल चले जाओ वहां इलाज हो जाएगा। जेल में इलाज में बहुत लापरवाही बरती गई।

मेरे पेट का घाव ठीक होने की बजाय और ज्यादा बिगड़ गया। ऐसे हालात बने कि दोबारा ऑपरेशन करना पड़ा। मेरी तबीयत और ज्यादा खराब हो गई। इसी आधार पर मुझे हाईकोर्ट से जमानत मिली। जब मैं जेल से बाहर आई तो तीसरी बार ऑपरेशन करना पड़ा। एक लाख रुपए खर्च हो गए। सारी जमा पूंजी खर्च हो गई और इसी साल मेरे पति का भी देहांत हो गया।

रेखा बाई को जिला कोर्ट में कुछ कहने का मौका ही नहीं मिला।

रेखा बाई को जिला कोर्ट में कुछ कहने का मौका ही नहीं मिला।

बेटा बोला- इस घटना ने मेरी दुनिया ही बदल दी रेखा बाई का बेटा विनोद इस समय एक मेडिकल शॉप पर काम करता है। विनोद ने बताया कि जब ये पूरा मामला हुआ तो मैं 15 साल का था। मैं 10वीं का एग्जाम नहीं दे पाया। मां के जेल जाने के बाद घर की कमाई बंद हो गई। मैंने पढ़ाई छोड़कर फल मंडी में काम करना शुरू किया। उसके बाद एक दुकान पर 1500 रुपए महीने की नौकरी की।

एक साल बाद जब 2017 में हाईकोर्ट से जमानत हुई तब तक हमारी जमा पूंजी खत्म हो चुकी थी। साल 2024 में एक बार फिर मां को दोषी पाते हुए कोर्ट ने सजा दी। मैंने मां से कहा कि मैं आपको बरी कराउंगा। मैं जो भी कमाता वो सारा केस में लगा देता था। अब मां केस से बरी हो गई है लेकिन इन 9 सालों ने हमारे परिवार को बर्बाद कर दिया।

ये खबर भी पढ़ें… एमपी सरकार को रेपिस्ट को 25 लाख मुआवजा देने का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने रेप के मामले में दोषी को 4 साल 7 महीने अतिरिक्त जेल में रखने के मामले में मप्र सरकार को 25 लाख का मुआवजा देने का आदेश दिया है। सागर जिले के इस मामले में आरोपी को सात साल की सजा सुनाई गई थी, लेकिन सजा की अवधि पूरी होने के बाद भी उसे रिहा नहीं किया गया। पढ़ें पूरी खबर…

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