‘खाली सड़कें, स्कूल-दफ्तर ऑनलाइन’ होर्मुज चोकहोल्ड से इन देशों की रुकी ‘सांस’

Energy Crisis: ईरान युद्ध का असर पूरे विश्व पर दिखने लगा है. ऊर्जा संकट से त्राहिमाम मचा हुआ है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बंद होने से तेल और गैस की सप्लाई भी रूक गई है. इससे एशिया के 80 फीसदी तेल का व्यापार होता था. इसके बंद होने से कई एशियाई देशों ऊर्जा संकट से जूझने लगे हैं. इन देशों में कोविड के लॉकडाउन की स्थिति बन गई है. इस संकट से कैसे निपट रहे हैं, ये देश? स्कूलों और दफ्तरों को ऑनलाइन मोड में किया जा रहा है. वर्किंग डे चार दिनों की जा रही है, पेट्रोल-डीजल भरवाने के लिए कई कड़े नियम लागू किए जा रहे हैं. आखिर कैसे निपटने की कोशिश कर रहे हैं. इस संकट और होर्मुज के बंद होने का असर कुछ गिने चुने देशों पर काफी कम है क्योंकि ईरान ने उनको अपना मित्र राष्ट्र बताते हुए तेल टैंकरों की आवाजाही में छूट दे रखी है.

हालांकि, ईरान ने अपने चुनिंदा मित्र देशों को अपने तेल के टैंकर निकालने की पूरी छूट दे रखी है, जिसमें भारत, रूस और चीन जैसे देश शामिल हैं. भारत ने अपनी कूटनीति से हालात को कंट्रोल कर रखा है, वरना इन देशों वाली स्थिति बन जाती है, जहां ईंधन बचाने के लिए अपने पुराने कोविड-काल के नियम वापस लागू करने पड़ रहे हैं.

खाली पड़ा श्रीलंका का रेलवे स्टेशन. (वीडियो ग्रैब)

लौटा ‘कोविड’ वाला खौफ!

मिडिल ईस्ट के तेल पर अत्यधिक निर्भर रहने वाले एशियाई देश इस संकट से निपटने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. ऊर्जा की एक-एक बूंद बचाने के लिए आपातकालीन कदम उठाए जा रहे हैं.

श्रीलंका में वर्क फ्रॉम होम: श्रीलंका पर तेल संकट का बड़ा असर पड़ा है. रेल-बस स्टेशन खाली पड़े हुए हैं. स्कूलों और दफ्तरों में ताले लग रहे हैं. कड़े ‘वर्क फ्रॉम होम’ नियम फिर से लागू कर दिए हैं. ईंधन बचाने के लिए बुधवार को पब्लिक हॉलिडे घोषित कर दिया गया है. सरकारी दफ्तरों में AC बंद हैं. सड़कों के साथ-साथ होर्डिंग्स की लाइटें भी बुझा दी गई हैं.

पाकिस्तान की सड़कों पर पसरा सन्नाटा: पहले से आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान पर ऊर्जा संकट का ज्यादा असर दिख रहा है. हालात बेकाबू हैं. सरकार ने सरकारी कर्मचारियों के लिए हफ्ते में केवल चार दिन काम का नियम लागू कर दिया है. उनके फ्यूल अलाउंस (ईंधन भत्ते) में भारी कटौती की गई है. सड़कों पर वाहनों की भीड़ कम करने के लिए कई स्कूलों को फिर से ऑनलाइन क्लास मोड पर शिफ्ट कर दिया गया है.

फिलीपींस में राष्ट्रीय ऊर्जा आपातकाल: फिलीपींस के राष्ट्रपति फर्डिनेंड मार्कोस जूनियर ने देश में नेशनल एनर्जी इमरजेंसी की घोषणा की है. अधिकारियों के लिए 4-दिन का वर्किंग वीक लागू किया गया है. एयर-कंडीशनर के इस्तेमाल पर सख्त पाबंदियां लगा दी गई हैं. सरकार जमाखोरी और मुनाफाखोरी के खिलाफ सीधे एक्शन ले रही है और टोल टैक्स सस्पेंड कर दिए गए हैं.

एशिया के अमीर देशों के भी छूटे पसीने

सिर्फ गरीब या विकासशील देश पर ही नहीं, बल्कि एशिया की बड़ी आर्थिक ताकतें भी इस ऊर्जा संकट के आगे बेबस नजर आ रही हैं, जैसे

  1. जापान: दुनिया के पांचवें सबसे बड़े तेल आयातक देश जापान को अपने स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व का दरवाजा खोलना पड़ा है. जापान के पास करीब 254 दिनों का रिजर्व है. इसके अलावा, पेट्रोल पंपों पर कीमतों को कंट्रोल करने के लिए सरकार 800 अरब येन ($5 बिलियन) के रिजर्व फंड का इस्तेमाल कर रही है.
  2. दक्षिण कोरिया और थाईलैंड: दोनों देशों में ‘एनर्जी-सेविंग कैंपेन’ शुरू किए हैं. दक्षिण कोरिया अपने नागरिकों से नहाने में कम समय लेने, फोन को सिर्फ दिन में चार्ज करने और वैक्यूम क्लीनर का इस्तेमाल केवल वीकेंड पर करने की अपील कर रहा है. वहीं, थाईलैंड ने अधिकारियों को लिफ्ट के बजाय सीढ़ियों का इस्तेमाल करने और विदेशी दौरे रद्द करने को कहा है.

दुनिया के नक्शे पर कैसे चमका भारत?

एक तरफ एशिया ऊर्जा की कमी से हाहाकार मचा हुआ है, लॉकडाउन जैसी स्थिति हो रही है. वहीं, भारत की स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत और बेहद स्थिर है. इसके पीछे उसकी दूरदर्शी रणनीतियां हैं. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तनाव की आशंकाओं को भांपते हुए, भारत ने पहले ही अपने आयात के विकल्पों को डायवर्सिफाई कर लिया था. मिडिल ईस्ट पर अपनी निर्भरता को कम करते हुए, भारत ने रूस और अन्य गैर-पारंपरिक ऊर्जा बाजारों से लगातार कच्चे तेल की सप्लाई चेन मजबूत की.

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