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भरतपुर की ठंड में ताज़ा और पौष्टिक चने का साग हर थाली में खुशबू और स्वाद भर देता है. देसी तरीके से उगा यह साग न केवल खाने में लाजवाब है, बल्कि शरीर को गर्माहट और स्वास्थ्य भी देता है. भरतपुर के ग्रामीण क्षेत्रों में तो कई घरों में सर्दियों के दिनों की शुरुआत ही चने के साग से मानी जाती है. स्वादिष्ट और पौष्टिक होने के कारण यह स्थानीय खानपान का अहम हिस्सा बन चुका है.
भरतपुर. सर्दियों की शुरुआत के साथ ही भरतपुर के बाजारों में चने का साग खूब दिखाई देने लगा है, खेतों में भी इसकी तुड़ाई तेजी से चल रही है. यह मौसमी साग हर साल ठंड के दिनों में सिर्फ कुछ ही समय के लिए मिलता है, इसलिए लोग इसे बड़े चाव से खरीदते हैं. देसी खुशबू और पारंपरिक स्वाद से भरपूर यह साग न केवल खाने में लाजवाब होता है, बल्कि सेहत के लिए भी बेहद फायदेमंद माना जाता है.
ठंड बढ़ते ही चने के पौधों में साग की तुड़ाई शुरू हो जाती है, सुबह-सुबह खेतों में ताजा हरा साग कटकर शहर के मुख्य बाजारों, मोहल्लों और ग्रामीण हाटों में पहुंच जाता है. इसकी खासियत यह है कि यह बिना किसी रासायनिक खाद के प्राकृतिक रूप से खेतों में उग आता है, जिसे ग्रामीण परिवार पीढ़ियों से अपने भोजन में शामिल करते रहे हैं. आयुर्वेदाचार्य डॉ. चंद्रप्रकाश दीक्षित बताते हैं कि सर्दियों के दिनों में चने का साग शरीर के लिए बेहद लाभकारी माना गया है.
यह साग शरीर को देता है प्राकृतिक गर्माहट
यह साग शरीर को प्राकृतिक गर्माहट देता है और ठंड से होने वाली तकलीफों, जैसे जोड़ों में दर्द, जकड़न और कमजोरी, को दूर करने में सहायक होता है. चने के साग में आयरन, कैल्शियम, फाइबर और विटामिन की अच्छी मात्रा पाई जाती है, जो खून बढ़ाने, पाचन सुधारने और शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में मदद करती है. डॉ. दीक्षित का कहना है कि जिन लोगों को पाचन संबंधी दिक्कतें रहती हैं या ठंड के मौसम में थकान और सुस्ती महसूस होती है, उन्हें यह साग जरूर खाना चाहिए.
इसकी सब्जी बनाना भी बेहद आसान है, इसे आलू या मूंग दाल के साथ पकाने पर स्वाद और भी बढ़ जाता है, या फिर इसे खाली मनाना भी बहुत आसान और अच्छा माना जाता है. बाजार में सब्जी विक्रेता बताते हैं कि चने का साग आते ही इसकी मांग काफी बढ़ जाती है. भरतपुर के ग्रामीण क्षेत्रों में तो कई घरों में सर्दियों के दिनों की शुरुआत ही चने के साग से मानी जाती है. स्वादिष्ट और पौष्टिक होने के कारण यह स्थानीय खानपान का अहम हिस्सा बन चुका है.
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