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Success Story: सीधी जिला की फूलमती पाल की शादी कम उम्र में हो गई थी. पति की कम आमदनी और 150 रुपये की मजदूरी में परिवार चलाना मुश्किल था. हालात बदलने के लिए उन्होंने हथकरघा से जुड़कर कपड़ा बुनना सीखा. अब घर के काम के साथ धागों से कपड़ा तैयार कर सालाना 9 से 10 हजार रुपये कमा रही हैं.
Success Story: मध्य प्रदेश के सीधी जिले के रामपुर नैकिन क्षेत्र की फूलमती पाल आज आत्मनिर्भरता की नई मिसाल बन गई हैं. कभी खेतों में मजदूरी कर 150 रुपये रोज कमाने वाली फूलमती आज हथकरघा के जरिए अपनी जिंदगी सवार रही है. उनकी सफलता की कहानी ग्रामीण महिलाओं के लिए प्रेरणा बन रही है. फूलमती पाल ने लोकल 18 जानकारी देते हुए बताया कि रामपुर नैकिन के बुढ़गौना गांव में कम उम्र में शादी के बाद उनका जीवन संघर्षों से भरा रहा. पति की आमदनी सीमित थी, ऐसे में परिवार का खर्च चलाने के लिए उन्हें खेतों में मजदूरी करनी पड़ती थी. दिनभर मेहनत के बाद भी आमदनी इतनी नहीं होती थी कि परिवार की जरूरतें पूरी हो सकें. इसी दौरान भरतपुर में आजीविका मिशन के तहत हथकरघा और दस्तकारी सहकारी समिति मर्यादित की शुरुआत हुई. समिति प्रबंधक शैलेंद्र सिंह के सलाह से समिति से जुड़ गई.
फूलमती को प्रशिक्षण दिया गया शुरुआत में सामान्य धागों से कपड़ा बुनना सिखाया गया. धीरे-धीरे उन्होंने महीन धागों से आकर्षक और टिकाऊ कपड़े तैयार करना सीख लिया. आज वे खुद अन्य महिलाओं को हथकरघा की ट्रेनिंग दे रही हैं. हथकरघा एक पारंपरिक कला है, जिसमें बिना बिजली के हाथ से करघे पर धागों को पिरोकर कपड़ा तैयार किया जाता है. इस काम से फूलमती की महीने की आय 9 से 10 हजार रुपये तक पहुंच गई है.
कैसे होती है बुनाई?
भरतपुर हथकरघा केंद्र में करीब 150 महिलाओं का समूह कार्यरत है. यहां लकड़ी के फ्रेम की मशीनों पर हाथों से बुनाई की जाती है. तैयार कपड़ों पर सुंदर कलाकृतियां उकेरी जाती हैं. समिति प्रबंधक शैलेंद्र सिंह के अनुसार, एक बुनकर प्रतिदिन 8 से 10 मीटर कपड़ा तैयार करता है, जिससे उसे 400 से 500 रुपये तक की आमदनी हो जाती है. एक मीटर कपड़े की लागत लगभग 145 रुपये आती है, जबकि बाजार में यह 180 रुपये में बिकता है.
इन हाथों से तैयार शुद्ध कॉटन के कपड़ों की मांग अब स्थानीय बाजार तक सीमित नहीं है. भोपाल, दिल्ली और आर्थिक राजधानी मुंबई समेत कई बड़े शहरों में इन उत्पादों की डिमांड है. पिछले वर्ष दिल्ली में आयोजित मेले में भी महिलाओं ने अपने उत्पादों का स्टॉल लगाया, जहां ग्राहकों ने गुणवत्ता और डिजाइन की जमकर सराहना की.
यहां तैयार शॉल 400 से 600 रुपये और डबल बेडशीट 300 से 500 रुपये तक बिकती है. खास बात यह है कि बार-बार धोने के बाद भी कपड़ों का रंग फीका नहीं पड़ता और धागे नहीं निकलते. फूलमती पाल की कहानी बताती है कि सही मार्गदर्शन और अवसर मिले तो ग्रामीण महिलाएं भी अपने हाथों से अपना भविष्य बुन सकती हैं.
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Deepti Sharma, currently working with News18MPCG (Digital), has been creating, curating and publishing impactful stories in Digital Journalism for more than 6 years. Before Joining News18 she has worked with Re…और पढ़ें
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