मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर में वोटर लिस्ट के विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) यानी SIR अभियान के दौरान एक बड़े फर्जीवाड़े का खुलासा हुआ है। यहां उषागंज क्षेत्र में खाली पड़े प्लॉट पर न केवल पूरे-पूरे परिवार को मतदाता के रूप
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इस मामले ने न केवल बूथ लेवल अधिकारियों (बीएलओ) की कार्यप्रणाली बल्कि पूरी एसआईआर प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि ऐसे फर्जीवाड़े हो रहे हैं तो फिर SIR का क्या मतलब है? क्या इंदौर में फर्जी वोटिंग की तैयारी की जा रही है? वहीं बीएलओ का कहना है कि ऐसे वोटर को शिफ्ट कैटेगरी में डालने की तैयारी है।
पहले जानिए क्या है पूरा मामला इस मामले का खुलासा तब हुआ जब वार्ड क्रमांक 55 की भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की पार्षद, पंखुड़ी जैन डोसी ने इंदौर कलेक्टर और जिला निर्वाचन अधिकारी को एक शिकायत सौंपी। अपनी शिकायत में उन्होंने आरोप लगाया कि जोन क्रमांक 11 के तहत आने वाले वार्ड 55 के बूथ नंबर 178 और 179 में बीएलओ की तरफ से गंभीर लापरवाही बरती जा रही है।
शिकायत में लिखा है कि एसआईआर (SIR) फॉर्म का मकसद मतदाता सूची को अपडेट और शुद्ध करना है। बीएलओ के लिए निर्देश हैं कि वह घर-घर जाकर फॉर्म बांटे और इन्हें सत्यापित कराए। ये करने के बजाय बीएलओ एक ही जगह पर बैठकर फॉर्म बांट रहे हैं। इसकी वजह से उन लोगों ने भी फॉर्म भरकर जमा कर दिए जो वास्तव में दिए गए पते पर कभी रहे ही नहीं।
शिकायत में यह भी कहा गया कि बीएलओ ने मतदाताओं के घरों का कोई भौतिक निरीक्षण नहीं किया, जिससे फर्जी पतों पर नाम जुड़वाने का एक संगठित खेल खेला गया।
बीजेपी पार्षद ने जिला निर्वाचन अधिकारी को एसआईआर प्रक्रिया फर्जीवाड़े की शिकायत की है।
खाली प्लॉट पर पूरा परिवार, निरीक्षण हुआ तो खुली पोल शिकायतकर्ताओं में से एक, बीजेपी नेता सुमित तलेजा ने इस लापरवाही को ‘बेहद गंभीर’ बताते हुए कहा, ‘यह सिर्फ एक चूक नहीं, बल्कि चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने का एक संगठित प्रयास हो सकता है।’ उन्होंने बताया कि बूथ क्रमांक 179, जो उषागंज क्षेत्र में आता है, वहां बीएलओ ने नियमों को ताक पर रखकर काम किया।
शिकायत के बाद जब प्रशासनिक अधिकारी और शिकायतकर्ता मौके पर पहुंचे, तो जो सच सामने आया, वह चौंकाने वाला था। तलेजा ने एक घटना का जिक्र करते हुए बताया, ‘हमने एक व्यक्ति को बुलाया और उससे पूछा कि वह कहां रहता है। उसने उषागंज स्थित एक खाली प्लॉट का पता बताया। जब हम उस पते पर पहुंचे, तो वहां कोई मकान था ही नहीं।’
हैरानी की बात यह है कि जिस प्लॉट को वह व्यक्ति अपना निवास बता रहा था, उस पर बने अवैध निर्माण को नगर निगम ने दिसंबर 2023 में ही गिरा दिया था। मौके पर सिर्फ एक बोरिंग मशीन मिली, घर का कोई नामोनिशान नहीं था।

एक ही परिवार के नाम बार-बार जुड़े शिकायतकर्ताओं ने अपनी शिकायत में कुछ खास नामों का जिक्र किया है। उन्होंने बताया कि फिरोज, मोहम्मद युनूस खान, उनकी पत्नी नूरजहां बी, और रुबीना बी समेत पूरे परिवार ने खुद को उसी खाली जमीन का निवासी बताया है। इन नामों को पहले भी सूची से हटाया गया था, लेकिन आरोप है कि ये लोग बार-बार कलेक्टर कार्यालय पहुंचकर फर्जी दस्तावेजों के आधार पर अपने नाम फिर से जुड़वा लेते हैं।
इसी तरह, अब्दुल, सायरा बानो, इम्तियाज, और फैजल समेत कई अन्य नामों की एक सूची भी शिकायत के साथ संलग्न की गई है, जो कथित तौर पर फर्जी पतों पर मतदाता सूची में शामिल हैं। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि उनके पास वीडियो सबूत भी हैं, जिनमें ये लोग खुद स्वीकार कर रहे हैं कि वे आजाद नगर या गुलजार कॉलोनी में रहते हैं, फिर भी उनके नाम उषागंज की गली नंबर एक में जोड़ दिए गए हैं।

वोटर लिस्ट में एक ही परिवार के नाम बार-बार जोड़ने की शिकायत की गई है।
बीएलओ बोले- हम शिफ्ट कैटेगरी में डाल रहे हैं जब इन गंभीर आरोपों पर संबंधित बीएलओ रोशन रहमान से बात की गई, तो उन्होंने अपना बचाव किया। उन्होंने कहा, ‘यह मामला मेरे संज्ञान में है। हमें सभी को फॉर्म देने के निर्देश थे, और मैंने घर-घर जाकर ही एसआईआर फॉर्म बांटे हैं।’ उन्होंने आगे कहा, ‘जहां तक गलत पते पर रहने वाले लोगों की बात है, हम ऐसे मामलों को शिफ्ट कैटेगरी में डाल रहे हैं।’
रहमान ने यह भी सफाई दी कि बीएलओ के पास ऑनलाइन सिस्टम में किसी का नाम सीधे हटाने का अधिकार नहीं होता है, और यह एक तकनीकी प्रक्रिया के तहत ही संभव है। हालांकि, उनकी यह सफाई शिकायतकर्ताओं के गले नहीं उतर रही है, जिनका कहना है कि अगर भौतिक सत्यापन ही नहीं हुआ, तो ‘शिफ्ट’ कैटेगरी का निर्धारण कैसे किया जा रहा है?

शिकायत के बाद भौतिक निरीक्षण करते अधिकारी।
शिकायतकर्ता बोले- चुनाव पर पड़ सकता है असर शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यह मामला सिर्फ कुछ नामों को गलत तरीके से जोड़ने या हटाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका चुनाव में असर पड़ सकता है।
- फर्जी वोटिंग की आशंका: मतदाता सूची में फर्जी नामों की मौजूदगी सीधे तौर पर फर्जी मतदान का खतरा पैदा करती है, जो किसी भी चुनाव के परिणाम को प्रभावित कर सकता है।
- चुनावी समीकरण में बदलाव: किसी एक क्षेत्र में अपात्र मतदाताओं के नाम जोड़ने से वहां के वास्तविक मतदाताओं का संख्यात्मक संतुलन बिगड़ सकता है, जिससे बूथ की राजनीतिक स्थिति कृत्रिम रूप से बदल सकती है।
- एसआईआर प्रक्रिया का औचित्य: यदि बीएलओ बिना सत्यापन के फॉर्म बांटते रहेंगे, तो एसआईआर जैसी महत्वपूर्ण प्रक्रिया का मूल उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा। यह प्रक्रिया मतदाता सूची को शुद्ध करने के लिए है, न कि उसे और अधिक अशुद्ध करने के लिए।
- प्रशासनिक विफलता: यह घटना स्थानीय चुनाव मशीनरी की विफलता को दर्शाती है। बीएलओ, जो इस प्रणाली की सबसे जमीनी और महत्वपूर्ण कड़ी है, यदि अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन ठीक से नहीं करता, तो पूरी चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता दांव पर लग जाती है।

वोटर लिस्ट में गड़बड़ी के बाद उसकी जांच करते शिकायतकर्ता।
वरिष्ठ अधिकारियों ने दिया जांच का भरोसा शिकायतकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो वे औपचारिक रूप से आपत्ति दर्ज कराएंगे और मामले की रिपोर्ट भारत निर्वाचन आयोग को भी भेजेंगे। अफसरों ने उन्हें जांच का भरोसा दिया है। सूत्रों ने बताया कि इस मामले में प्रशासन 5 पॉइंट्स पर आगे की कार्रवाई कर सकता है…
- विस्तृत जांच: एक उच्च-स्तरीय जांच समिति का गठन कर पूरे मामले की गहन पड़ताल की जाएगी।
- भौतिक सत्यापन: शिकायत में उल्लिखित सभी पतों और नामों का फिर से भौतिक सत्यापन किया जाएगा।
- कार्रवाई: यदि शिकायतें सही पाई जाती हैं, तो दोषी बीएलओ के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई हो सकती है।
- नामों का विलोपन: फर्जी पतों पर जोड़े गए सभी अपात्र नामों को मतदाता सूची से हटाया जाएगा।
- कानूनी केस: फर्जी दस्तावेज देकर मतदाता सूची में नाम जुड़वाने वाले लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी की जा सकती है।
मैपिंग त्रुटियां और कानूनी चुनौतियां यह समस्या केवल उषागंज तक ही सीमित नहीं है। हाल ही में इंदौर में मतदाता सूची पुनरीक्षण के दौरान बड़े पैमाने पर मैपिंग त्रुटियों की खबरें भी सामने आई हैं। कई मतदाताओं ने शिकायत की है कि उनके वास्तविक पते के बजाय उनके नाम किसी अन्य बूथ या गलत पते से जोड़ दिए गए हैं। इस मामले को लेकर एक कानूनी याचिका भी दायर की गई है।
जिसमें दलील दी गई है कि इंदौर में हजारों मतदाताओं का पता ‘भवन क्रमांक 0’ के रूप में दर्ज है, जो एक अस्पष्ट और अस्थिर पता है। याचिकाकर्ता ने यह भी मुद्दा उठाया है कि कुछ बूथों पर मतदाताओं की संख्या असामान्य रूप से कम (कहीं-कहीं मात्र 40) है, और शहर में 1200 की सीमा के बजाय 1761 मतदान केंद्र बना दिए गए हैं, जो नियमों का उल्लंघन है।