कैंटीन की उधारी से बना Evergreen हिट! किशोर दा की ये कहानी जानते हैं आप?

Khandwa News: मध्यप्रदेश की धरती ने कई महान कलाकारों को जन्म दिया है, लेकिन जब बात सुरों और मस्ती की आती है तो सबसे पहला नाम आता है किशोर कुमार का. खंडवा में जन्मे इस सुरों के बादशाह ने न सिर्फ अपनी आवाज़ से लोगों को दीवाना बनाया बल्कि अपने अनोखे अंदाज़ से हर दिल में एक अलग जगह बना ली. आज भी जब उनका नाम लिया जाता है, तो लोग उन्हें “महान गायक” या “फिल्मी स्टार” कहने के बजाय प्यार से “खंडवा वाले किशोर दा” कहकर याद करते हैं. और सच कहें तो यही नाम उन्हें सबसे ज़्यादा पसंद था.

खंडवा का बेटा, देश का दिग्गज गायक
किशोर कुमार का असली नाम था आभास कुमार गांगुली. उनका जन्म 4 अगस्त 1929 को खंडवा में हुआ था. खंडवा की गलियों से निकला यह लड़का आगे चलकर हिंदी सिनेमा का सबसे बड़ा गायक बना. किशोर दा में संगीत जैसे रग-रग में बसा हुआ था. वे न सिर्फ गायक थे, बल्कि अभिनेता, निर्देशक, संगीतकार और निर्माता भी थे. लेकिन उनकी जड़ें खंडवा की मिट्टी में गहराई से जुड़ी थीं.कहा जाता है कि उन्होंने कई बार इंटरव्यू में कहा था  “मुझे जो कुछ भी मिला, वो खंडवा की मिट्टी से मिला. मैं जहां भी रहूं, मेरा दिल हमेशा खंडवा में ही रहता है.

कॉलेज कैंटीन और “5 रुपया 12 आना” की दिलचस्प कहानी
अब बात करते हैं उस अनसुनी मगर मज़ेदार कहानी की, जिससे जुड़ा है किशोर दा का एक अनोखा गीत  “पांच रुपया बारह आना”. खंडवा के ही किशोर प्रेमी सुनील जैन बताते हैं कि जब किशोर कुमार कॉलेज में पढ़ाई कर रहे थे, तब उनकी कैंटीन में काफी उधारी चलती थी. कैंटीन मालिक बार-बार पैसे मांगता, लेकिन किशोर दा मस्ती में मुस्कुराते हुए बात टाल देते.
एक दिन जब कैंटीन वाले ने उनसे सख्ती से पैसे मांगे, तो किशोर दा ने हंसते हुए कहा “भाई, गाना गाकर ही पैसे दे दूं?”कैंटीन वाला भी हंसी में कह बैठा  “गाना गाकर ही दे दो, लेकिन उधारी खत्म होनी चाहिए. और बस, इसी मज़ाक से जन्म हुआ था उस मशहूर गीत का  “पांच रुपया बारह आना, मारे गए दिलवाला…”

ये गीत दरअसल उनके कॉलेज जीवन के उस मज़ेदार किस्से से प्रेरित था, जिसमें उनकी 5 रुपये 12 आना की उधारी का जिक्र था. किशोर दा ने बाद में इस घटना को याद करते हुए इसे गीत का रूप दिया. इस गाने में उनकी वही मस्ती, वही बेफिक्री और वही ‘हरफनमौला’ अंदाज़ झलकता है जिसके लिए वे जाने जाते थे.

मस्तमौला और थोड़ा कंजूस भी
किशोर दा के बारे में कहा जाता है कि वे जितने उदार दिल के थे, उतने ही थोड़े कंजूस भी. वे पैसों को लेकर हमेशा सावधान रहते थे. कई किस्सों में बताया गया है कि उन्होंने खुद स्वीकार किया था कि “मैं पैसा फालतू में खर्च नहीं करता, क्योंकि पैसा कमाना आसान नहीं. लेकिन उनका ये स्वभाव कभी नकारात्मक नहीं था. वे इसे मज़ाक में बदल देते थे. “5 रुपया 12 आना” वाला गीत भी इसी हास्य भावना और आत्म-व्यंग्य का बेहतरीन उदाहरण है.

पुण्यतिथि पर खंडवा में आज भी गूंजती है उनकी आवाज़
हर साल 13 अक्टूबर को जब किशोर दा की पुण्यतिथि आती है, तो खंडवा शहर जैसे फिर से उनकी आवाज़ में डूब जाता है. उनके प्रशंसक “गौरीकुंज” में जुटते हैं, गीतों की महफिलें सजती हैं, और लोग कहते हैं . “आज भी किशोर दा जिंदा हैं अपनी आवाज़ में. उनके चाहने वाले खंडवा में हर साल श्रद्धांजलि सभा आयोजित करते हैं. वहां “रिमझिम गिरे सावन”, “छू कर मेरे मन को”, “रूप तेरा मस्ताना” और “ज़िंदगी एक सफर है सुहाना” जैसे गीतों की गूंज सुनाई देती है. लेकिन सबसे ज़्यादा दिल छू जाने वाला पल होता है जब कोई वहां “पांच रुपया बारह आना” गुनगुनाता है. क्योंकि यही गीत खंडवा की यादों से सबसे गहराई से जुड़ा है.

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