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PM Modi Assamese Shawl: बोर्ड की परीक्षाएं नजदीक हैं और इसी सिलसिले में हर साल की तरह इस साल भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बच्चों के साथ ‘परीक्षा पर चर्चा’ कार्यक्रम में हिस्सा लिया. इस मौके पर पीएम ने बच्चों को असमिया गमोसा (Assamese Gamosa) भेंट किया और इससे जुड़ी जानकारियां भी साझा कीं. उन्होंने बताया कि असम और नॉर्थ ईस्ट के राज्यों में यह महिला सशक्तिकरण (Women Empowerment) का प्रतीक भी है. इसकी बुनाई उन्हें खासा प्रिय है. जब पीएम छात्रों के साथ परीक्षा और तैयारियों पर चर्चा कर रहे थे, तब लोगों की नजर उनके कंधे पर रखी शॉल पर भी गई, जिसे असम राज्य का सांस्कृतिक विरासत (Cultural Heritage) भी कहा जाता है.
PM Modi Assamese Shawl: बोर्ड की परीक्षाएं नजदीक हैं और इसी सिलसिले में हर साल की तरह इस साल भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बच्चों के साथ ‘परीक्षा पर चर्चा’ कार्यक्रम में हिस्सा लिया. इस मौके पर पीएम ने बच्चों को असमिया गमोसा (Assamese Gamosa) भेंट किया और इससे जुड़ी जानकारियां भी साझा कीं. उन्होंने बताया कि असम और नॉर्थ ईस्ट के राज्यों में यह सम्मान और महिला सशक्तिकरण (Women Empowerment) का भी प्रतीक है. उन्होंने बताया कि इसकी बुनाई उन्हें खासा प्रिय है. जब पीएम छात्रों के साथ परीक्षा और तैयारियों पर चर्चा कर रहे थे, तब लोगों की नजर उनके कंधे पर रखी शॉल पर भी गई, जिसे असम राज्य का सांस्कृतिक विरासत (Cultural Heritage) भी कहा जाता है.
बता दें कि असम का यह हैंडलूम शॉल अपनी बारीक बुनाई और पारंपरिक ‘मिरि’ (Miri) डिजाइन के लिए जाना जाता है. तस्वीरों में साफ देखा जा सकता है कि शॉल पर की गई जटिल कढ़ाई और फूलों के पैटर्न असम के स्थानीय बुनकरों के असाधारण हुनर को दर्शाते हैं. यह कला सदियों से असमिया पहचान का एक अटूट हिस्सा रही है.
इस शॉल की सबसे बड़ी विशेषता इसका एरी सिल्क (Eri Silk) होना है. असम में एरी रेशम को ‘अहिंसा सिल्क’ के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि इसे तैयार करने में रेशम के कीड़ों को मारा नहीं जाता. यह शॉल न केवल देखने में सुंदर है, बल्कि सर्दियों के मौसम में यह शरीर को भरपूर गर्माहट भी प्रदान करती है.
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प्रधानमंत्री का इस शॉल को पहनना उनके ‘वोकल फॉर लोकल’ अभियान के प्रति गहरी प्रतिबद्धता को दर्शाता है. जब देश का नेतृत्व इस तरह के क्षेत्रीय वस्त्रों को प्राथमिकता देता है, तो इससे न केवल स्थानीय हस्तशिल्प को पहचान मिलती है, बल्कि ग्रामीण बुनकरों के आर्थिक सशक्तिकरण को भी बल मिलता है.
क्यों खास है असम के लिए ये शॉल- कहते हैं कि असमिया हैंडलूम शॉल का इतिहास सदियों पुराना है और इसका उल्लेख प्राचीन काल के कालिका पुराण और हर्षचरित जैसे ग्रंथों में भी मिलता है. मध्यकाल में अहोम राजाओं के शासन के दौरान इस कला को विशेष संरक्षण प्राप्त हुआ, जहाँ बुनाई केवल एक जरूरत नहीं बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा और संस्कृति का अनिवार्य हिस्सा बन गई. असम के हर घर में करघे (Looms) की उपस्थिति और महिलाओं द्वारा बुनाई में निपुणता को उनके कौशल की पहचान माना जाता था.
ऐतिहासिक रूप से, असम के विभिन्न समुदायों जैसे बोडो, मिश्मी और नागा जनजातियों ने अपनी अलग-अलग बुनाई शैलियों और डिजाइनों के माध्यम से इस इतिहास को समृद्ध किया है. इन शॉलों में इस्तेमाल होने वाला मुगा और एरी रेशम अपनी शुद्धता और टिकाऊपन के लिए विश्व प्रसिद्ध रहा है. समय के साथ, इन शॉलों पर उकेरे गए जटिल ‘मिरि’ और ‘फ्लोरल’ मोटिफ्स असम की प्राकृतिक सुंदरता और वीरता की कहानियों को प्रदर्शित करने का जरिया बने, जो आज भी वहां के हस्तशिल्प को अद्वितीय बनाते हैं.
रंगों का भी है खास इतिहास- असम के हैंडलूम उद्योग में प्राकृतिक रंगों (Natural Dyes) का इतिहास उतना ही पुराना है जितना कि इसकी बुनाई कला. प्राचीन काल से ही असमिया बुनकर पौधों, जड़ों, फलों और छालों का उपयोग करके धागों को रंगते आए हैं. उदाहरण के लिए, गहरा नीला रंग प्राप्त करने के लिए ‘इंडिगो’ (नील) के पौधों का उपयोग किया जाता था, जबकि पीले रंग के लिए हल्दी और लाल रंग के लिए ‘मनजिष्ठा’ की जड़ों का प्रयोग होता था. यह परंपरा न केवल पर्यावरण के अनुकूल थी, बल्कि इन प्राकृतिक रंगों की विशेषता यह थी कि ये समय के साथ फीके पड़ने के बजाय और अधिक निखरते जाते थे.
इन प्राकृतिक रंगों का उपयोग न केवल सूती धागों पर बल्कि प्रसिद्ध मुगा और एरी सिल्क पर भी किया जाता था, जिससे इन शॉल्स को एक अनोखी चमक और जैविक गुणवत्ता मिलती थी. आज भी असम के कई ग्रामीण इलाकों में बुनकर इन पारंपरिक विधियों को जीवित रखे हुए हैं, जो आधुनिक सिंथेटिक रंगों की तुलना में त्वचा के लिए कहीं अधिक सुरक्षित और टिकाऊ हैं.
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