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HbA1c and Diabetes Diagnosis: डायबिटीज का पता लगाने के लिए अधिकतर लोग समय-समय पर HbA1c टेस्ट कराते हैं. अगर यह टेस्ट नॉर्मल आता है, तो डायबिटीज का खतरा नहीं माना जाता है. हालांकि लैंसेट की एक नई स्टडी में पता चला है कि डायबिटीज के डायग्नोसिस के लिए सिर्फ HbA1c टेस्ट काफी नहीं है. कई मामलों में इससे डायबिटीज डिटेक्ट करना मुश्किल है.
डायबिटीज का पता लगाने के लिए HbA1c के अलावा OGTT और अन्य ब्लड टेस्ट भी कराने चाहिए.
New Lancet Study on HbA1c Test: भारत में डायबिटीज के 10 करोड़ से भी ज्यादा मरीज हैं. शुगर के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. जब भी किसी व्यक्ति को डायबिटीज के लक्षण नजर आते हैं, तो डॉक्टर आमतौर पर HbA1c टेस्ट कराने की सलाह देते हैं. HbA1c टेस्ट रिपोर्ट 5.7 से कम हो, तो इसे नॉर्मल माना जाता है, जबकि 6.5 या इससे अधिक आने पर मरीज को डायबिटिक माना जाता है. देशभर में डायबिटीज का पता लगाने के लिए HbA1c टेस्ट को सबसे अच्छा माना जाता है, लेकिन लैंसेट की एक नई स्टडी में चौंकाने वाली बात सामने आई है.
लैंसेट की नई स्टडी में पता चला है कि टाइप-2 डायबिटीज की पहचान के लिए केवल HbA1c टेस्ट पर निर्भर रहना खतरनाक हो सकता है. शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि सिर्फ HbA1c टेस्ट को डायग्नोस्टिक टूल मानने से डायबिटीज के कई मामले सामने ही नहीं आ पाते हैं और इलाज में काफी देर हो जाती है. इससे शुगर के मरीजों को कई तरह की कॉम्प्लिकेशंस पैदा हो जाती हैं. टाइप 2 डायबिटीज के सही डायग्नोसिस के लिए मल्टीपल टेस्ट करने की जरूरत होती है. यह स्टडी प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल ‘द लैंसेट रीजनल हेल्थ- साउथईस्ट एशिया’ में प्रकाशित हुई है, जिसमें शोधकर्ताओं ने कई हैरान करने वाली बातें बताई हैं.
रिसर्च के अनुसार भारतीय आबादी में एनीमिया, जेनेटिक हीमोग्लोबिन डिसऑर्डर और ग्लूकोज-6-फॉस्फेट डिहाइड्रोजनेज की कमी से HbA1c टेस्ट का रिजल्ट गड़बड़ हो सकता है. ऐसे में यह टेस्ट लोगों के सही ब्लड शुगर लेवल का पता नहीं लगा पाता है. HbA1c टेस्ट खून में मौजूद उस हीमोग्लोबिन का प्रतिशत मापता है, जिस पर ग्लूकोज चिपका होता है, और इससे पिछले 2-3 महीनों का औसत ब्लड शुगर लेवल पता चलता है. भारत जैसी विविध और स्वास्थ्य चुनौतियों से जूझ रही आबादी में यह मानक हर व्यक्ति पर समान रूप से लागू नहीं होते हैं. ऐसे में यह टेस्ट सभी का शुगर लेवल सटीक नहीं बता पाता है.
TOI की रिपोर्ट के मुताबिक स्टडी के कॉरेस्पॉन्डिंग ऑथर और दिल्ली के फोर्टिस C-DOC सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर डायबिटीज, मेटाबॉलिक डिजीज एंड एंडोक्राइनोलॉजी के चेयरमैन प्रोफेसर अनूप मिश्रा ने कहा कि HbA1c पर पूरी तरह निर्भर रहना डायबिटीज की स्थिति को गलत डायग्नोज कर सकता है. कुछ मरीजों में डायबिटीज का पता जरूरत से काफी देर से चलता है, जबकि कुछ लोगों में गलत डायग्नोसिस हो सकता है. इससे समय पर इलाज शुरू नहीं हो पाता और बीमारी की जटिलताएं बढ़ने का खतरा रहता है.
रिसर्च में यह भी बताया गया कि आयरन की कमी से होने वाला एनीमिया भारत के कई राज्यों में 50 प्रतिशत से ज्यादा वयस्कों को प्रभावित करता है. यह एनीमिया HbA1c के स्तर को गलत तरीके से बढ़ा सकता है. वहीं सिकल सेल डिजीज, अन्य हीमोग्लोबिनोपैथी और G6PD की कमी जैसी स्थितियां HbA1c को आर्टिफिशियल तरीके से कम दिखा सकती हैं, जिससे असली हाई ब्लड शुगर छिप जाता है. भारत में विशेष रूप से आदिवासी समुदायों में सिकल सेल रोग और G6PD की कमी का बोझ दुनिया में सबसे अधिक माना जाता है.
एक्सपर्ट्स की मानें तो डायबिटीज की सही पहचान और मॉनिटरिंग के लिए HbA1c के साथ-साथ ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट (OGTT), ब्लड शुगर की नियमित जांच और ब्लड से जुड़ी अन्य जांचों को भी शामिल किया जाना चाहिए. शोधकर्ताओं का मानना है कि इस समग्र दृष्टिकोण से न सिर्फ मरीजों का इलाज बेहतर होगा, बल्कि देश में डायबिटीज के वास्तविक बोझ का सही आकलन और स्वास्थ्य संसाधनों का बेहतर वितरण भी संभव हो सकेगा.
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अमित उपाध्याय News18 Hindi की लाइफस्टाइल टीम के अनुभवी पत्रकार हैं, जिनके पास प्रिंट और डिजिटल मीडिया में 9 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे हेल्थ, वेलनेस और लाइफस्टाइल से जुड़ी रिसर्च-बेस्ड और डॉक्टर्स के इंटरव्…और पढ़ें