Dasha Mata Vrat 2026: दशा माता व्रत की कथा, घर की बिगड़ी दशा सुधारने वाला व्रत!

दशा माता व्रत की कथा

पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन समय में राजा नल और दमयंती राज्य करते थे. उनके दो पुत्र थे. उनके राज्य में प्रजा बहुत सुखी रहती थी. एक दिन की बात है उस दिन होली दशा थी.एक ब्राह्मणी राज्य महल में आई और रानी से डोरा बांधने को कहा तब रानी की दासी बीच में बोल आज के दिन सभी सुहागिन महिलाएं दशा माता का पूजन और व्रत करती हैं. इस धागे को गले में पहनती है जिससे घर में सुख समृद्धि बनी रहती है.

ऐसा सुनकर रानी ने ब्राह्मणी से उस डोरे को लिया और विधि अनुसार अपने गले में डाल लिया. कुछ समय पश्चात जब राजा ने अपनी रानी दमयंती के गले में वह धागा को दिखा तो राजा ने कहा इतने सोने और चांदी और हीरे जवाहरात के गहने होने के बाद भी आप अपने गले में यह डोर क्यों पहने हैं. इससे पहले रानी कुछ कहती तब तक राजा नल ने उस धागे को रानी के गले से निकालकर जमीन पर फेंक दिया तब रानी ने उस धागे को जमीन से उठाकर राजा से कहा यह डोरा तो दशा माता का डोर है. अपने यह डोरा फेक कर अच्छा नहीं किया.

जब रात्रि के समय राजा सो रहे थे. तब दशा माता बुढ़िया का रूप धारण करके स्वप्न में आए और राजा से कहा है, राजा तेरी अच्छी दशा जा रही है और बुरी दशा आ रही है. तूने मेरा अपमान करके अच्छा नहीं किया इतना कहते ही दशा माता अंतरध्यान हो गई. जैसे जैसे समय बिता वैसे-वैसे कुछ ही दिनों में राजसी ठाठ, हाथी, घोड़े, धान्य, धन, सुख, शांति सब कुछ नष्ट होने लगी.

राजा ने अपनी पत्नी दमयंती से कहा कि तुम अपने दोनों पुत्रों को लेकर अपने माता-पिता के यहां चली जाओ, तब उनकी पत्नी ने कहा कि मैं आपको ऐसे हालात में छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगी. जिस प्रकार आप रहेंगे इस स्थिति में मैं भी रह लूंगी. राजा नल ने कहा चलो हम दोनों कहीं दूसरे देश में चले जाएंगे. यहां यदि हम कोई कार्य करेंगे तो हमें कोई काम नहीं देगा. इस तरह नल राजा अपने परिवार सहित अपने देश को छोड़कर चल दिए.

चलते-चलते रास्ते में भील राजा का महल दिखाई दिया. वहां राजा ने अपने दोनों बच्चों को अमानत के तौर पर छोड़ दिया. चलते-चलते राजा नल नदी के पास पहुंचे और भूख प्यास से व्याकुल रानी से कहा मैं यहां से मछलियां निकाल कर देता हूं तुम इन्हें पका लो. मैं गांव से पसार लेकर आता हूं. नल राजा गांव से से परोसा भोजन लेकर चले वैसे ही एक चिल ने झपट्टा मार दिया तो सारा भोजन नीचे गिर गया. उधर रानी मछलियों को पका रही थी वह सारी मछलियां जीवित होकर तालाब में चली गई.

इसके बाद दोनों एक गांव में कार्य करने लगे, रानी दासी बनकर तो वहीं राजा सैनिकों के बल में काम करने लगा. रानी जब राजमाता के पास गई तब राजमाता ने कहा कि तुम्हारी जैसी मेरी भी बेटी है. तब दासी बोली मैं ही हूं आपकी बेटी, दशा माता के प्रकोप से मेरे बुरे दिन चल रहे हैं इसीलिए यहां चली आई. आज मैं दशा माता का व्रत करूंगी और अपनी गलतियों की क्षमा याचना करूंगी.

इसके बाद राजमाता ने अपने जमाई राजा को बुलाया. राजा रानी दोनों ने साथ मिलकर दशा माता की विधिवत पूजा की. इसके बाद नल दंपति अच्छी दशा लौट आई, वह अपने बच्चों को लेकर अपनी राजधानी के निकट पहुंचे तो नगर वासियों ने जब राजा नल को लाब लश्कर के साथ आते देखा तो सभी ने बहुत प्रसन्न होकर उनका स्वागत किया. दशा माता की कृपा से उन्हें फिर से राजयोग प्राप्त हो गया.

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