नवरात्रि के पहले दिन 9 माता मंदिरों के करें दर्शन: एमपी के ​​​​​​​मैहर में विराजित मां शारदा, देवास टेकरी में 2 देवियां एक साथ – Bhopal News

एमपी के माता मंदिरों की मान्यताएं और कथाएं उन्हें अनूठा बनाती हैं।

शारदीय नवरात्रि की शुरुआत के साथ मध्यप्रदेश के प्रमुख शक्तिपीठों और देवी धामों में भक्तों की भीड़ उमड़ने लगी है। आज दैनिक भास्कर के साथ कीजिए उन देवी मंदिरों के दर्शन, जो आस्था, परंपरा और चमत्कारिक कथाओं का संगम माने जाते हैं। इन मंदिरों की मान्यताएं

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जबलपुर के चौसठ योगिनी मंदिर में भगवान शिव और पार्वती के विवाह की प्रतिमा अद्वितीय है, जिसे देखने के लिए मां नर्मदा ने भी अपनी धारा मोड़ दी थी। मैहर का मां शारदा मंदिर 52 शक्तिपीठों में शामिल है, जहां आल्हा-ऊदल के अब भी आरती में आने की मान्यता भक्तों को रोमांचित करती है।

देवास की टेकरी पर स्थित चामुंडा देवी मंदिर (छोटी माता) और तुलजा भवानी मंदिर (बड़ी माता) शक्ति के प्रतीक माने जाते हैं। वहीं, छिंदवाड़ा का हिंगलाज मंदिर संतान प्राप्ति और नेत्र रोग मुक्ति के लिए प्रसिद्ध है। इंदौर की टेकरी पर बिजासन देवी मंदिर अद्वितीय है, क्योंकि यहां देवी दुर्गा के नौ स्वरूप एक ही स्थान पर विराजमान हैं।

सीहोर जिले के सलकनपुर का बिजासन देवी मंदिर रक्तबीज वध की कथा के कारण सिद्धपीठ माना जाता है। दतिया का पीतांबरा देवी पीठ बगलामुखी और धूमावती माता की आराधना का केंद्र है। इसी तरह उज्जैन का हरसिद्धि माता मंदिर विक्रमादित्य की तपोभूमि के रूप में पूजनीय है।

वहीं, ग्वालियर की कैंसर पहाड़ी पर स्थित मांढरे वाली माता मंदिर, सिंधिया राजघराने की कुलदेवी के रूप में प्रसिद्ध हैं। यहां शुभ कार्यों की शुरुआत से पहले दर्शन अनिवार्य माना जाता है।

आइए, एमपी के इन 9 मंदिरों के करते हैं दर्शन

हरसिद्धि मंदिर…उज्जैन

एकमात्र शक्तिपीठ, जो ज्योर्तिलिंग के पास

हरसिद्धि मंदिर 2000 साल से भी ज्यादा पुराना है।

महाकाल मंदिर से महज 500 मीटर की दूरी पर विराजित हैं मां हरसिद्धि। सप्त सागर में से एक रूद्र सागर के तट पर बना मंदिर 2000 साल से भी ज्यादा पुराना है। उज्जैन ही एकमात्र स्थान है, जहां ज्योर्तिलिंग के साथ शक्ति पीठ भी है। इसे शिव और शक्ति के मिलन के रूप में भी देखा जाता है।

मान्यता है कि यहीं माता सती की कोहनी गिरी थी, इसलिए यह मंदिर 51 शक्तिपीठों में खास जगह रखता है। ये जगह सम्राट विक्रमादित्य और कवि कालिदास की साधना स्थली भी रही है।

पीतांबरा मंदिर…दतिया

मां कहलाती हैं ब्रह्मांड की स्तंभ शक्ति

आध्यात्मिक साधना का अद्वितीय केंद्र है पीतांबरा माता मंदिर।

आध्यात्मिक साधना का अद्वितीय केंद्र है पीतांबरा माता मंदिर।

पीतांबरा माता का उद्भव वैदिक काल में हुआ है। इन्हें भगवान विष्णु की शक्ति और शिव की ऊर्जा से उत्पन्न माना जाता है। दस महाविद्याओं में इनका छठवां स्थान है, जो उनकी महत्ता को दर्शाता है।

मान्यता है कि समुद्र मंथन के समय जब सुमेरु पर्वत को मथानी बनाकर घुमाया जा रहा था, तब उसे स्थिर रखने के लिए बगलामुखी का आह्वान किया गया था। ब्रह्मांड की स्तंभ शक्ति मां पीतांबरा को ही कहा जाता है, जो इस मंदिर को एक अद्वितीय आध्यात्मिक केंद्र बनाता है।

यह मंदिर दतिया में हैं, जहां मां पीतांबरा यानी बगलामुखी विराजमान हैं।

चामुंडा माता मंदिर…देवास

2 देवियां एक टेकरी पर विराजित

देवास जिले में टेकरी पर चामुंडा माता के अलावा तुलजा भवानी माता भी हैं।

देवास जिले में टेकरी पर चामुंडा माता के अलावा तुलजा भवानी माता भी हैं।

पुराणों के अनुसार, जहां-जहां देवी सती के अंग गिरे, वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई। लेकिन जहां रक्त गिरा, वहां रक्तपीठ बने। ऐसा ही एक स्थान बना देवास टेकरी, जहां देवी का रक्त गिरा और मां चामुंडा प्रकट हुईं।

देवास जिले में टेकरी पर चामुंडा माता के अलावा तुलजा भवानी माता भी हैं। मंदिर से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। मान्यता है कि यहां नौ माताओं की उत्पत्ति हुई। तुलजा भवानी, चामुंडा, पार्वती, विजयासन, कालिका, अष्टभुजा, अन्नापूर्णा, खो-खो माता और अंबे माता। जब मां का यहां रक्त गिरा, तब तुलजा भवानी और चामुंडा माता साथ में थीं।

इस टेकरी का इतिहास करीब ढाई हजार साल पुराना है। यह स्थान देवास रियासत की कुलदेवी के रूप में भी जाना जाता है।

मां विजयासन देवी…सलकनपुर

800 फीट ऊंचे पर्वत पर विराजमान हैं मां

विंध्याचल पर्वत पर मां विजयासन देवी का दिव्य धाम है।

विंध्याचल पर्वत पर मां विजयासन देवी का दिव्य धाम है।

सीहोर जिले के सलकनपुर में स्थित विंध्याचल पर्वत पर मां विजयासन देवी का दिव्य धाम है। नवरात्रि पर यहां मां के दर्शन को देश-विदेश से श्रद्धालु पहुंचते हैं। 800 फीट ऊंचे पर्वत पर विराजमान मां विजयासन तक पहुंचने के लिए भक्तों को 1401 सीढ़ियां चढ़नी होती हैं।

वहीं, कई भक्त रोप-वे की मदद से माता मंदिर तक पहुंचते हैं। सलकनपुर में दो साल से देवीलोक बन रहा है। जिसका निर्माण 95 फीसदी पूरा हो चुका है। श्रद्धालुओं के लिए खास बात यह है कि इस साल सलकनपुर में पहाड़ी पर श्रद्धालुओं के निजी वाहन भी ऊपर जा सकेंगे।

हिंगलाज माता मंदिर…छिंदवाड़ा

माता सती के मस्तिष्क से स्थापित शक्तिपीठ

छिंदवाड़ा से 42 किमी की दूरी पर सतपुड़ा की वादियों में विराजित हैं मां हिंगलाज।

छिंदवाड़ा से 42 किमी की दूरी पर सतपुड़ा की वादियों में विराजित हैं मां हिंगलाज।

‘हिंगलाज’ शब्द दो भागों से मिलकर बना है- ‘हिंग’ जिसका अर्थ है रौद्र रूप और ‘लाज’ जिसका अर्थ है लज्जा। पौराणिक कथा के अनुसार, जब माता सती ने रौद्र रूप धारण कर भगवान शिव के सीने पर पैर रखा तो उन्हें लज्जा आई और उनका रौद्र रूप शांत हो गया। इसी से माता का नाम हिंगलाज पड़ा।

छिंदवाड़ा से 42 किमी की दूर सतपुड़ा की वादियों में विराजित हैं मां हिंगलाज। यह शक्तिपीठ माता सती के मस्तिष्क से स्थापित माना जाता है, इसलिए इसे प्रथम पूजनीय शक्तिपीठों में गिना जाता है।

बिजासन माता मंदिर…इंदौर

एक साथ विराजित 9 देवियां, संतानदायिनी कहलाती हैं मां

इंदौर का बिजासन माता मंदिर एक हजार साल पुराना है।

इंदौर का बिजासन माता मंदिर एक हजार साल पुराना है।

इंदौर के बिजासन माता मंदिर में एक साथ 9 देवियां विराजित हैं। यह मंदिर एक हजार साल पुराना है। यह एकमात्र ऐसा मंदिर है, जहां देवी के 9 स्वरूपों के दर्शन एक साथ होते हैं।

माता के 9 रूपों में शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री हैं। सभी 9 देवियां बहनें हैं और स्वयंभू रूप में स्थापित हैं।

खास यह है कि यहां शिवजी, काल भैरव और हनुमान जी भी विराजित हैं। बिजासन माता को सौभाग्य और संतानदायिनी माना जाता है।

मां शारदा धाम…मैहर

1500 साल पुरानी है माता की प्रतिमा

त्रिकूट पर्वत पर मां शारदा का प्रसिद्ध मंदिर है।

त्रिकूट पर्वत पर मां शारदा का प्रसिद्ध मंदिर है।

खूबसूरत वादियों में विराजित मां शारदा धाम मैहर जिले में है। यहां त्रिकूट पर्वत पर 600 फीट की ऊंचाई पर मां शारदा का प्रसिद्ध मंदिर है।

यह ऐतिहासिक मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है। कहा जाता है कि इसी जगह मां सती का हार गिरा था, इसलिए यह स्थान मईया का हार यानी मैहर के नाम से जाना जाता है।

शारदा मां का धाम जिला मुख्यालय मैहर से 6 किलोमीटर दूर है। करीब एक हजार सीढ़ियां चढ़कर भक्त मां के दरबार में पहुंचते हैं। बताया जाता है कि माता की प्रतिमा करीब 1500 साल पुरानी है।

मांढरे वाली माता मंदिर…ग्वालियर

सपने में मिला देवी का आदेश, महाराष्ट्र से लाए प्रतिमा

कैंसर पहाड़ी पर स्थित है मांढरे वाली माता का मंदिर।

कैंसर पहाड़ी पर स्थित है मांढरे वाली माता का मंदिर।

ग्वालियर जिले की कैंसर पहाड़िया पर सिंधिया राजघराने की कुलदेवी मांढरे वाली माता का मंदिर है। यह 150 साल से भी ज्यादा पुराना है। मान्यता है कि सिंधिया परिवार किसी भी शुभ कार्य से पहले यहां माथा टेकता है।

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, लगभग 150 साल पहले महाराष्ट्र के सतारा में मांढरे वाली माता का एक मंदिर था, जिसकी पूजा आनंदराव मांढरे करते थे। उसी समय ग्वालियर के महाराज जयाजीराव सिंधिया उन्हें अपने साथ महल में लेकर आए और सेना की जिम्मेदारी सौंप दी।

कुछ समय तक आनंदराव मांढरे ग्वालियर में रहे, लेकिन बाद में माता ने उन्हें सपने में दर्शन देकर आने वाले खतरे के प्रति आगाह करना शुरू किया। इसके बाद आनंदराव ने यह बात महाराज को बताई। महाराज महाराष्ट्र से माता की प्रतिमा ग्वालियर लेकर आए और यहां स्थापित कर दी। तभी से इस मंदिर का नाम मांढरे वाली माता मंदिर पड़ गया।

चौंसठ योगनी मंदिर…जबलपुर

शिव-पार्वती के विवाह की एकमात्र प्रतिमा

चौंसठ योगनी मंदिर दर्शन के लिए मां नर्मदा ने मोड़ी थी अपनी धारा।

चौंसठ योगनी मंदिर दर्शन के लिए मां नर्मदा ने मोड़ी थी अपनी धारा।

जबलपुर में मां नर्मदा के किनारे हजारों साल पुराना चौंसठ योगनी मंदिर है। मंदिर में भगवान शिव और पार्वती की वो प्रतिमा है, जो उनके विवाह के वक्त की है। इसमें भगवान भोलेनाथ नंदी पर सवार हैं।

70 फीट ऊंचे पहाड़ पर स्थित यह मंदिर विश्व प्रसिद्ध पर्यटन स्थल भेड़ाघाट के नजदीक है। मंदिर के चारों तरफ 81 देवी, देवता वास करते हैं। देश के कई मंदिरों सहित इसे पर भी औरंगजेब ने तोड़ने की कोशिश की थी, पर मंदिर के गर्भगृह में स्थापित प्रतिमा को कोई भी नुकसान नहीं हुआ।

हजारों साल पुराना यह मंदिर आज भी अपने उसी स्वरूप में है, जैसा कि सालों पहले थे। वर्तमान में इस मंदिर की देखरेख आर्कियोलोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ASI) कर रहा है।

मैहर के इस मंदिर में कोई नहीं, हो जाता है मां का श्रृंगार

उज्जैन के हरसिद्धि शक्तिपीठ में तंत्र सिद्ध करते हैं तांत्रिक

देवास में दो देवियां, एक टेकरी; चामुंडा और तुलजा भवानी

सलकनपुर मंदिर में भक्तों की आस्था, मन्नत का उल्टा हाथ

दतिया की मां पीतांबरा कहलाती हैं ब्रह्मांड की स्तंभ शक्ति

छिंदवाड़ा में खुदाई में मिली प्रतिमा, अंग्रेजी अफसर को दिए दर्शन

ग्वालियर में 150 साल पुराना मांढरे वाली माता मंदिर

जबलपुर में चौंसठ योगिनी मंदिर में भोलेनाथ-पार्वती की प्रतिमा

इंदौर के बिजासन मंदिर में एक साथ विराजीं 9 देवियां

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