26 लाख की मंजूरी अटकने से रेडिएशन लीकेज का खतरा: कोबाल्ट मशीन में अब भी मौजूद रेडियोधर्मी स्रोत, जीएमसी ने विभाग को लिखा पत्र – Bhopal News


भोपाल के हमीदिया अस्पताल में सालों से बंद पड़ी कोबाल्ट थैरेपी मशीन अब चिंता की बड़ी वजह बन गई है। करीब 40 साल पुरानी इस मशीन के अंदर आज भी रेडियोएक्टिव सोर्स मौजूद है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते इसका सुरक्षित निपटान नहीं किया गया तो स्थिति गंभीर हो सकती है। मशीन को वैज्ञानिक तरीके से डिस्मेंटल करने और रेडियोधर्मी स्रोत हटाने के लिए लगभग 26 लाख रुपए की जरूरत है, लेकिन राशि मंजूर न होने से प्रक्रिया फिलहाल अटकी हुई है। शुक्रवार को गांधी मेडिकल कॉलेज (जीएमसी) के ऑन्कोलॉजी विभाग के एक्सपर्ट्स ने डीन को इस पूरे मामले की विस्तृत जानकारी दी है। हालांकि, प्रबंधन का कहना है कि यह मामला संज्ञान में है। मशीन को डीकमीशन करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। शासन से इसके लिए बजट मांगा है। शील्डिंग समय के साथ हुई कमजोर हमीदिया अस्पताल के कैंसर विभाग में इस्तेमाल होने वाली कोबाल्ट थैरेपी मशीन लंबे समय से बंद पड़ी है। भले ही मशीन काम नहीं कर रही, लेकिन इसके भीतर मौजूद रेडियोधर्मी पदार्थ अब भी उसमें हैं। रेडिएशन विशेषज्ञों के अनुसार, पुरानी मशीनों में सुरक्षा कवच यानी शील्डिंग समय के साथ कमजोर हो सकती है। अगर इसमें दरार आई या जंग लगने से सुरक्षा परत प्रभावित हुई, तो रेडिएशन बाहर रिसने का खतरा बढ़ सकता है। 40 साल पुरानी है कोबाल्ट मशीन कोबाल्ट मशीनों में रेडियोधर्मी स्रोत मोटी धातु की शील्डिंग में बंद रहता है। यह सुरक्षा कवच ही रेडिएशन को बाहर आने से रोकता है। लेकिन 40 साल पुरानी मशीन में धातु की गुणवत्ता, जंग और रखरखाव की स्थिति को लेकर चिंता जताई जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समय रहते इसे सुरक्षित तरीके से नहीं हटाया गया, तो यह कैंसर विभाग के स्टाफ, मरीजों और आसपास मौजूद लोगों के लिए जोखिम बन सकता है। 26 लाख की मंजूरी पर अटका समाधान मशीन को हटाने और रेडियोधर्मी स्रोत को सुरक्षित तरीके से निकालने की पूरी प्रक्रिया में लगभग 26 लाख रुपए खर्च आने का अनुमान है। यह काम किसी सामान्य तकनीशियन से नहीं, बल्कि अधिकृत एजेंसी द्वारा सख्त प्रोटोकॉल के तहत किया जाता है। फिलहाल यही राशि मंजूर न होने के कारण डिस्मेंटलिंग की प्रक्रिया शुरू नहीं हो पाई है। जब तक बजट स्वीकृत नहीं होगा, मशीन उसी स्थिति में पड़ी रहेगी। एईआरबी के नियम और लाइसेंस पर खतरा रेडियोधर्मी उपकरणों की निगरानी परमाणु ऊर्जा नियामक परिषद (एईआरबी) करती है। इसके नियम बेहद सख्त हैं। अस्पतालों को रेडियोधर्मी मशीनों के रखरखाव और निपटान के लिए तय सुरक्षा मानकों का पालन करना अनिवार्य होता है। यदि निरीक्षण में सुरक्षा में चूक पाई गई तो एईआरबी सख्त कार्रवाई कर सकती है। इसमें कोबाल्ट यूनिट के साथ-साथ एक्स-रे, सीटी स्कैन और एमआरआई जैसी अन्य रेडियोलॉजी सेवाओं के लाइसेंस पर भी असर पड़ सकता है। ऐसे में पूरी रेडियोलॉजी व्यवस्था प्रभावित होने का खतरा है। मरीजों पर पहले से असर कोबाल्ट मशीन बंद होने से रोजाना 30 से 100 तक कैंसर मरीजों की रेडियोथेरेपी पहले ही प्रभावित है। कई मरीजों को मजबूरी में निजी केंद्रों में जाना पड़ रहा है, जहां इलाज का खर्च हजारों रुपए प्रति सत्र तक पहुंच जाता है। यदि अन्य रेडियोलॉजी सेवाएं भी प्रभावित हुईं, तो गरीब और दूरदराज से आने वाले मरीजों को जांच के लिए भटकना पड़ेगा। ‘मायापुरी’ जैसी घटना से सबक विशेषज्ञ दिल्ली के मायापुरी हादसे का उदाहरण भी दे रहे हैं, जहां कबाड़ में पहुंची एक पुरानी कोबाल्ट मशीन से रेडिएशन फैल गया था और एक व्यक्ति की मौत हो गई थी। उस घटना के बाद देशभर में रेडियोधर्मी उपकरणों के निपटान के नियम और सख्त किए गए थे। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी तरह की लापरवाही भविष्य में बड़ी समस्या बन सकती है। जीएमसी डीन डॉ. कविता एन सिंह ने कहा इस संबंध में मुझे ऑन्कोलॉजी विभाग से जानकारी मिली थी। इसकी सूचना चिकित्सा शिक्षा विभाग को भेज दी गई है। उन्होंने आश्वस्त किया है कि जल्द ही इस समस्या का समाधान किया जाएगा। .

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