सागर मेले में स्वावलंबी गांव देखने उमड़ रही भीड़, बैलगाड़ी और देसी चूल्हा बने आकर्षण

घास फूस के मकान और बैलगाड़ियां जो पहले ग्रामीण क्षेत्रों में रहन सहन की एक महत्वपूर्ण कड़ी हुआ करते थे. आज इंटरनेट और मोबाइल के युग में अब वह प्रदर्शनी बन गए है. आर्टिफिशियल बनाए जाने वाले इन गांवों को देखने के लिए लोग पैसे खर्च कर रहे हैं. ऐसा ही एक स्वाबलंबी गांव सागर के स्वदेशी मेले में बनाया गया है. जहां पर 30- 40 साल पुराने समय गांव कैसे हुआ करते थे. इसकी छवि को उतारने का प्रयास किया गया है.

कैसे घर के आंगन में महिलाएं खाना बनाती थी और पुरुष बड़े ही स्नेह प्यार के साथ उनको खाते थे वैसा ही कुछ यहां भी देखने को मिल रहा है. पहले जो बैलगाड़ियां ग्रामीण परिवहन का महत्वपूर्ण साधन थी, जिनके घर जितनी अधिक बैलगाड़ियां होती थी. वह उतना बड़ा रईस कहलाता था. लेकिन समय के फेर में इन बैलगाड़ियों का स्थान मशीनों ने ले लिया और यह धीरे-धीरे विलुप्त हो गई.

आज यह बैलगाड़ियां न सिर्फ प्रदर्शनी में आई है. बल्कि आज के बच्चे इन पर घूम कर खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहे है. इस आर्टिफिशियल गांव को देखने यहां देसी स्टाइल में बैठने की की गई व्यवस्था लोगों को पसंद आ रही है. देसी व्यंजन भी बड़े प्यार से खाते हुए नजर आ रहे है. रोजाना बड़ी भीड़ उमर रही है 5 जनवरी तक यह मेला चलेगा. जिसमें लोग यहां आकर देख सकते हैं कि कैसे पहले गांव की जीवन शैली हुआ करती थी.

नेतराम पटेल बताते हैं कि आज से 50 साल पहले ग्रामीण जनजीवन रहन-सहन खान पान कैसा होता था. उसको जीवंत करने की कोशिश हम लोगों के द्वारा की गई है. यहां पर घास फूस के ढबुआ बनाए गए है. जिनमे बैठकर लोग खाना खा रहे जो लोग खुले में बैठकर कहना चाहते है. उनकी अलग व्यवस्था है जो खेत के आसपास पेड़ों के नीचे बंद कच्चे घर घर में भोजन करना चाहते है. उसे तरह की व्यवस्था की गई है. ताकि एकदम देसी और गांव की फीलिंग लोगों को आ सकें. इसके अलावा यहां पर बेल गाड़ियां भी है. जिम में बैठकर लोग इसका आनंद ले रहे है.

स्वावलंबी गांव में करीब 40 लोग काम कर रहे हैं. जिसमें महिलाएं रोटियां बनाने दाल कढ़ी बनाने जैसा काम कर रही हैं तो पुरुष सब्जियां बनाने के साथ यहां आने वाले ग्राहकों को खाना परोसते हैं. जो गांव की थीम तैयार की गई है उसमें घूमते हैं और गांव में क्या-क्या होता है गाइड की तरह उन्हें बताते हैं. खासकर नई पीढ़ी के बच्चे इस गांव में आकर काफी आकर्षित हो रहे और फोटो भी खींचते हैं.

स्वावलंबी गांव में प्रति व्यक्ति 200 रुपया की थाली दी जा रही है. जिसमें अनलिमिटेड भरपेट भोजन कर सकते है. वह भी अपने पसंदीदा व्यंजन के साथ 200 की थाली में यहां पर आटे की रोटी, ज्वार की रोटी, मका की रोटी, बिर्रा की रोटी, डूबरी, मुनगा फलियों एवं फूलों की कड़ी, भजिया कड़ी, रायता, दाल, दाल तड़का, मिक्स सब्जी, मटर की सब्जी, चावल, जीरा चावल, मसाला चाव, भाजी, चना की भाजी, पालक की भाजी, मैथी की भाजी, पापड़, खीचला,पापड़ रसगुल्ला, बालू साई, तिली के लड्डी, दूर के लड्डू, बूंदी, बेसन की बर्फी, गुड, चावल की खीर, गेहूं की खीर, खीर, आवॅला की चटनी, अमरूद की चटनी, धनिया, अदरक चटनी, अचार नीबू का, अचार ऑवल का, कुचिया, बरा, दही बड़ा, बेगन भर्ता/बाटी, बेगन भर्ता तड़का, दाल बाटी उपलब्ध है इनमें जो भी आपको पसंद है वह मीनू में आर्डर देकर मंगवा सकते हैं खा सकते है.

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