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Ground Report: छतरपुर जिले में कृषि विभाग की तरफ़ से ग्रामीण क्षेत्रों में बायोगैस प्लांट योजना के तहत जिले के सभी विकासखंडों में 12 हजार रुपए की लागत से गांव-गांव में गोबर गैस प्लांट बनाए गए थे लेकिन समय के साथ ग्रामीणों ने इस पर रुचि नहीं दिखाई. जिसके चलते ज्यादातर बायोगैस प्लांट बंद हो गए हैं. किसान भाइयों ने क्यों नहीं दिखाई दिलचस्पी? आइए जानते हैं.
Bio Gas Plant : छतरपुर जिले में कृषि विभाग की तरफ़ से ग्रामीण क्षेत्रों में बायोगैस प्लांट योजना के तहत जिले के सभी विकासखंडों में 12 हजार रुपए की लागत से गांव-गांव में गोबर गैस प्लांट बनाए गए थे लेकिन समय के साथ ग्रामीणों ने इस पर रुचि नहीं दिखाई. जिसके चलते ज्यादातर बायोगैस प्लांट बंद हो गए हैं.
एक गोबर गैस प्लांट में मिली थी 12 हजार रुपए की सब्सिडी
रमाकांत दीक्षित लोकल 18 से बातचीत में बताते हैं कि हमारे गांव में ही आधे दर्जन से ज्यादा गोबर गैस प्लांट लगे थे. लेकिन एक-दो ही बचे हैं जो चल रहे हैं. आज से 5 साल पहले हमारे दो पड़ोसियों ने गोबर गैस प्लांट लगवाए थे. सरकार की तरफ से 12 हजार रुपए की सब्सिडी भी दी गई थी. लगभग 2 सालों तक इन्होंने गोबर गैस से खाना बनाया लेकिन गोबर गैस प्लांट हर कोई मैनेज नहीं कर पाता है. इसलिए हमारे गांव के अधिकतर गोबर गैस प्लांट बंद हो गए हैं. आसपास के गांव के भी गोबर गैस प्लांट बंद ही पड़े हैं.
हर दिन गोबर डालना बड़ी समस्या
रमाकांत बताते हैं कि गोबर गैस प्लांट बंद होने की सबसे बड़ी वजह ये है कि इस प्लांट में गैस बनने के लिए हर दिन गोबर घोलकर डालना होता है. मेरे कहने का मतलब है कि इस काम को करने के लिए एक व्यक्ति की परमानेंट जरूरत होती है. हर दिन एक तसला गोबर तो डालना ही है.
हथ दिन गोबर डालना झंझट मानते
बताते हैं कि लोग इसे सुविधा नहीं बल्कि झंझट का काम मानते हैं. उनका मानना है कि जितनी मेहनत इसमें करते हैं उतने मेहनत दूसरे काम में करेंगे तो पैसा भी मिलेगा. गैस नहीं मिलेगी तो भी दिक्कत नहीं है, क्योंकि हम गांव के लोग हैं, लकड़ी कंडे में हु बना लेंगे.
गोबर से कंडे पाथते
रमाकांत बताते हैं कि किसान जानवर तो पालते हैं लेकिन घर में उसी पशु को रखता है जो हर दिन दूध देता है. बाकि जानवरों को 8 महीने तक छुट्टा रखते हैं. ऐसे में गोबर ढूंढने की समस्या बढ़ जाती है. घर में जो दूध देने वाला पशु है उसके गोबर से कंडे या उपले पाथ लेते हैं.
खेती-किसानी में किसान बिजी हो जाते
ग्रामीण इस्लाम खान बताते हैं कि किसान भाई जानवरों को तो पालते हैं लेकिन 24 घंटे घरों में नहीं रखते हैं. चैत्र महीने से किसान अपने पशुओं को छोड़ देते हैं. इसी महीने में किसान परिवार फसलों की कटाई-बिनाई में बिजी भी हो जाते हैं. ऐसे में किसान भी जानवरों का ध्यान नहीं देते हैं.
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7 वर्षों से पत्रकारिता में अग्रसर. इलाहबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स इन जर्नालिस्म की पढ़ाई. अमर उजाला, दैनिक जागरण और सहारा समय संस्थान में बतौर रिपोर्टर, उपसंपादक औऱ ब्यूरो चीफ दायित्व का अनुभव. खेल, कला-साह…और पढ़ें
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