What is Secondary infertility : आपने पहला बच्चा तो आसानी से कर लिया लेकिन जब दोबारा बच्चे के लिए कोशिश की तो हो ही नहीं रहा.आजकल कपल में इस तरह के मामले तेजी से बढ़ते जा रहे हैं. सीधे शब्दों में कहें तो सेकेंड प्रेग्नेंसी के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ रही है. कई दंपतियों के लिए यह बहुत चौंकाने वाला, शर्म से भरा और अकेलापन महसूस कराने वाला अनुभव होता है. इसे सेकंडरी इंफर्टिलिटी कहा जाता है. अपोलो फर्टिलिटी अस्पताल में इंफर्टिलिटी स्पेशलिस्ट डॉ. निकिता लाड पटेल कहती हैं कि सेकंडरी इंफर्टिलिटी के मामलों में बढ़ोतरी देखी जा रही है. यह खासतौर पर 25–40 वर्ष की महिलाओं में ज़्यादा दिखाई दे रही है. इसके कई कारण हो सकते हैं, इसलिए इसकी सही जांच जरूरी है. इन सबके बारे में आपको सही जानकारी होनी चाहिए.
सेकेंड प्रेग्नेंसी में देरी के कारण
टीओआई की खबर में डॉ. निकिता पटेल कहती हैं कि सेकंडरी इंफर्टिलिटी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह अक्सर तब सामने आती है जब जीवन सबसे व्यस्त होता है. आमतौर पर पहले बच्चे के बाद माता-पिता दोनों बेहद व्यस्त हो जाते हैं. बढ़ती जिम्मेदारियों के बीच लक्षणों का पता नहीं चल पाता. अनियमित पीरियड्स,पीरियड्स के दौरान ज्यादा दर्द, पेट के निचले हिस्से में दर्द, अचानक वजन बढ़ना, मुहांसे या शरीर पर ज़्यादा बाल आना, बार-बार गर्भपात होना जैसे लक्षणों को लोग नजरअंदाज कर देते हैं लेकिन यही से सेकेंडरी इंफर्टिलिटी का खतरा बढ़ता जाता है. अगर इन चीजों का समय पर इलाज नहीं हो पाता है तो सेकेंड प्रेग्नेंसी में कई तरह की जटिलताएं आनी शुरू हो जाती है.
पुरुष भी हो सकते हैं जिम्मेदार
गाइनेकोलॉजिस्ट डॉ. सीमा दीप्ति टीओआई से बात करती हुई बताती हैं कि अक्सर इंफर्टिलिटी को महिलाओं की समस्या माना जाता है, लेकिन बहुत सारे मामलों में पुरुष भी जिम्मेदार होते हैं. मोटापा, शारीरिक गतिविधि में कमी यानी सिर्फ चेयर पर बैठे रहना, एक्सरसाइज न करना, स्मोकिंग, ज़्यादा शराब और डायबिटीज जैसी समस्याएं स्पर्म काउंड को तेजी से घटा देता है और उसके डीएनए की गुणवत्ता को खराब कर देता है. इसके अलावा तेज गर्मी, प्रदूषण और केमिकल वाले माहौल का असर भी पड़ता है. रिसर्च से यह साफ़ है कि पुरुषों की लाइफस्टाइल और उनके वीर्य की गुणवत्ता के बीच गहरा संबंध है. इसलिए प्रेग्नेंसी में दोनों की सेहत मायने रखती है.उम्र बढ़ने के साथ महिलाओं में अंडों की संख्या और गुणवत्ता कम हो जाती है और क्रोमोसोम संबंधी समस्याओं के कारण गर्भपात का खतरा बढ़ता है.वहीं दूसरा बच्चा देर से प्लान करने पर दंपत्ति उम्र से जुड़ी प्रजनन समस्याओं का सामना कर सकते हैं. इससे अंडों की संख्या और गुणवत्ता कम हो जाती है. इतना ही नहीं उम्र बढ़ने के साथ-साथ गर्भपात और गर्भावस्था की जटिलताएं भी बढ़ जाती है. इसलिए समय रहते जांच और सलाह बहुत जरूरी है.
सेकंडरी इंफर्टिलिटी से बचने के लिए क्या करें
डॉक्टरों ने बताया कि जीवनशैली में बदलाव बहुत मदद कर सकता है. डॉ. पटेल के अनुसार सही वजन, हेल्दी खाना, नियमित एक्सरसाइज, कम तनाव और पूरी नींद से इन समस्याओं को सुलझाया जा सकता है. इसके इलाज के लिए व्यूलेशन शुरू करने वाली दवाएं, थाइरॉयड नियंत्रण, हार्मोन थेरेपी आदि की मदद ली जाती है. डॉ. दीप्ति ने कहा कि डायबिटीज, थाइरॉयड और हाई बीपी जैसे रोगों का सही इलाज और डॉक्टर से नियमित मुलाकात भी बेहद जरूरी है. इसमें आपको मोटापा कम करना होगा. महिलाओं में अगर ओव्यूलेशन नहीं हो रहा है तो उसकी दवाई करनी होगी. पुरुषों में स्पर्म की गुणवत्ता सही करने के लिए शराब, सिगरेट, प्रोसेस्ड फूड से दूरी बरतनी होगी. वजन कम करना होगा. प्रदूषण से भी बचना जरूरी है. इसके साथ ही ज़्यादा गर्मी, प्लास्टिक के केमिकल, कीटनाशक, गर्म पानी आदि से भी बचना होगा क्योंकि ये प्रजनन क्षमता घटाते हैं.
डॉक्टरों से जांच बहुत जरूरी
इसमें महिला-पुरुष दोनों को जांच करवानी होगी. अगर 12 महीने तक कोशिश के बाद गर्भ न ठहरे और महिला की उम्र 35 से ऊपर हो तो 6 महीने में दोनों पार्टनर की जांच जरूरी है. सीमने टेस्ट और ब्लड रिपोर्ट कई छिपी समस्याएं पकड़ लेती हैं. अगर पहले से डायबिटीज, थाइरॉयड, हाई बीपी है तो यह भी प्रजनन क्षमता प्रभावित करते हैं. तनाव से हार्मोन और यौन स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है. इसलिए तनाव को कम करें. अंत में नियमित दवाइयां, डॉक्टर की निगरानी, अच्छी नींद, ध्यान, काउंसलिंग और हल्की एक्सरसाइज स्पर्म की गुणवत्ता को बेहतर बनाता है. सेकंडरी इंफर्टिलिटी परेशान करने वाली और अकेला महसूस कराने वाली हो सकती है, लेकिन सही कदम और सही समय पर इलाज से हालात बदल सकते हैं. डॉ. पटेल कहती हैं कि अक्सर ये संकेत नजरअंदाज हो जाते हैं, लेकिन इन्हें नियंत्रित किया जा सकता है. सही वजन, अच्छा खान-पान,एक्सरसाइज, नींद और बीमारियों के इलाज दोबारा बच्चा भी किया जा सकता है.