रतलाम में नांचते-गाते हुए आत्मा को लेने अस्पताल पहुंचे।
स्थान- रतलाम मेडिकल कॉलेज। दिन- बुधवार। समय – शाम 4 बजकर 10 मिनट।
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ढोल व थाली की थाप के साथ महिला व पुरुषों की चिखती पुकार की आवाज सुनाई देती है। महिलाएं गीत गा रही हैं। हाथों में एक व्यक्ति तलवार लहरा रहा है। एक शख्स के सिर से खून निकल रहा है तो उसके सिर पर कपड़ा बांधा जा रहा है। हाथों में पूजा की थाली और नारियल है। एक महिला सिर पर लकड़ी की टोकरी उठाकर कर चल रही थी। उसमें एक पत्थर रखा था।
जिसने भी यह नजारा देखा वहीं रुक गया। हर एक के मन में एक ही सवाल था कि आखिर यह क्या हो रहा है। नाचते-गाते झूमते हुए लोग मेडिकल कॉलेज के गेट से बाहर निकले तो हर कोई यह सब नजारा देख अचंभित थे कि आखिर मेडिकल कॉलेज में यह सब क्या हो रहा है। बाद में पता चला कि यह तो आत्मा को लेने आए है। आत्मा को ढोल व थाली की थाप पर झूमते हुए लेकर जा रहे है।
दैनिक भास्कर ने अपने कैमरे में इस सब कुछ कैद किया। इस सबके पीछे आखिर आदिवासी समाज की क्या मान्यता है यह हमने ग्रामीणों से जाना। इस दौरान बताया गया कि परिवार के सदस्य की आकस्मिक मौत मेडिकल कॉलेज में हो गई थी। जिसकी आत्मा को लेने आए है। उसे देवता के रूप में गांव में ओटला बनाकर स्थापित करेंगे।
ज्ञान-विज्ञान के इस दौरान में आज भी आदिवासी अंचल में अंधविश्वास की इस मान्यता को ग्रामीण अपने इस रिवाज को निभा रहे है। जानिए दैनिक भास्कर की इस खास रिपोर्ट को आखिर इस घटनाक्रम की क्या हकीकत है…
अस्पताल में मृतक की आत्मा ले जाने पहुंचे परिजन।

पत्थर को टोकरी में ले रख जाने का दावा किया। इस दौरान एक व्यक्ति के चोट लगने पर खून भी निकला।
पूरी कहानी को समझिए मेडिकल कॉलेज के गेट नंबर एक पर कुछ महिलाएं व एक बच्ची खड़ी है। एक पुरुष के गले में माला पहनकर कर खड़ा है। झावनीझोड़िया की रहने वाली महिला नीता झोड़िया के हाथों में पूजा की थाली है। जिसमें अगरबत्ती, चलता हुआ दीपक व अन्य पूजा की सामग्री रखी गई। कुछ लोग दीपक को बाहर रखे मेडिकल कॉलेज में नारियल, चावल व इत्र (सेंट) लेकर जाते है। इन्हें रोकने वाला कोई नहीं होता है।
यह बेधड़क मेडिकल कॉलेज की लिफ्ट में सवार होकर तीसरी मंजिल पर पहुंचते हैं। कुछ देर में वह लोग वापस लौट आते है। बाहर आते से ही पहले से खड़े महिला व पुरुषों की चीख पुकार शुरू हो जाती है। ढोल व थाली की थाप गुंजने लगती है। कुछ महिलाओं को पकड़ कर ले जाया जाता है। करीब एक घंटे तक यह सब खेल मेडिकल कॉलेज में चलता रहा है लेकिन इसे रोकने वाला कोई नहीं था।

महिला के हाथ में लिए पत्थर में आत्मा को ले जाने का दावा किया।
अब आत्मा को ले जाने का कारण समझिए आदिवासी समाज में परिवार के सदस्यों की आकस्मिक मौत होने पर परिजन उसी जगह जाते है। जहां परिवार के सदस्य की मौत हुई है। वहां जाकर उनसे अपने साथ चलने का आव्हान किया जाता है। और उन्हें पत्थर या अन्य रूप में अपने साथ लेकर अपने गांव के किसी स्थान या खेत में एक ओटला बनाकर देवता के रूप में स्थापित किया जाता है।
तीन महीने पहले हो चुकी मौत ग्रामीणजन जिस मृतक की आत्मा को ले जाने आए थे, उसका नाम शांतिलाल झोड़िया था। वह रतलाम के छावनीझोड़िया गांव का रहने वाला था। कीटनाशक पीने से उसकी तीन माह पहले मौत हो गई थी। मृतक की बुआ नीता झोड़िया रस्म रिवाज की प्रक्रिया करने में आगे थी।

मेडिकल कॉलेज के मुख्य गेट के बाहर तलवार लहराते हुए लोगों को पकड़ कर ले जाते हुए।
बुआ बोली- उसने कहा कि मेडिकल कॉलेज आकर ले जाओ नीता ने बताया कि हमारा भतीजा था। उसकी मौत हो गई थी। अब वह बड़े भाई की बेटी के शरीर में आकर उसे परेशान कर रहा है। बोल रहा है मुझे मेडिकल कॉलेज से लेकर आओ इसलिए हम सब उसे लेने आए हैं। साथ में एक पत्थर लेकर आए हैं। पत्थर में उसे लेकर जाएंगे।

पत्थर भी बताया नीता ने अपने साथ लेकर आए एक पत्थर को भी बताया। कहा कि इसी पत्थर में आत्मा को लेकर जाएंगे। मेडिकल कॉलेज की तीसरी मंजिल से लौटते ही बड़े भाई की बेटी को एक महिला पकड़कर चल रही थी। कुछ अन्य महिलाओं व पुरुषों की चीख पुकार भी मच गई। सभी मृतक शांतिलाल का नाम लेने लगे।
पत्थर में लेकर जाएंगे परिजनों के साथ भूरालाल नामक व्यक्ति भी गले में माला डाल साथ में खड़ा था। जब इनसे बात की तो कहा कि शांतिलाल की आत्मा को लेने आए है। पूछा कि कैसे लेकर जाएंगे तो कहा कि गांव से पत्थर में लेकर जाएंगे। आज पहली बार आए है।
नीता ने बताया कि मृतक पत्नी व तीन बच्चे भी है। वह भी मेडिकल कॉलेज में आए है। उनको भी सारी बाते मालूम है।

आत्मा लेने जाने के पहले मेडिकल कॉलेज में खड़े परिजन व अन्य।
झूमते हुए निकले बाहर, किसी ने नहीं रोका आत्मा को लेकर जब सब बाहर निकलने लगे तो वहां पहले से मौजूद आदिवासी ढोल व थाली लेकर आए कुछ लोग उन्हें बजाने लगे। हाथ में तलवार लहराते हुए चीखते-पुकारते सभी सदस्य ढोल व थाली की थाप पर झूमते हुए मेडिकल कॉलेज से बाहर निकल गए।
मेडिकल कॉलेज में एक तरफ जहां गार्ड मरीजों के अटेंडर के अलावा किसी को बिल्डिंग में नहीं जाने देते। ऐसे में 8 से 10 लोग हाथों में नारियल व पूजा सामग्री लेकर बेधड़क अंदर जाते है और वापस आते है। इन्हें किसी ने भी नहीं रोका।
सवाल यह है कि समाज के कुछ हिस्सों में आज भी अंधविश्वास का गहरा प्रभाव भी मौजूद है। यह घटनाक्रम न सिर्फ हैरान करता है, बल्कि आधुनिक युग में सोचने पर मजबूर करता है। इस प्रकार की घटनाएं पूर्व में आ चुकी है। लेकिन रतलाम के मेडिकल कॉलेज में पहली देखने में आई है।
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