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Success Story: आज हम आपको सहरसा के एक ऐसे युवा की कहानी बताने जा रहे हैं जिसने बड़े पैकेज और मल्टीनेशनल कंपनियों के ऑफर को ठुकराकर समाज के लिए कुछ करने का रास्ता चुना. सहरसा के सुधांशु के पास एमबीए की पढ़ाई पूरी करने के बाद करियर के कई विकल्प थे. बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियों से उन्हें बार-बार जॉब के ऑफर मिले, लेकिन सुधांशु का सपना सिर्फ अच्छी नौकरी पाना नहीं था बल्कि अपने जिले में रहकर कुछ नया और सार्थक करना था.
सुधांशु का यह एहसास तब और गहरा हुआ जब सरकार ने प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाया. उन्होंने देखा कि प्लास्टिक बैन के बाद बाजार में एक बड़े विकल्प की जरूरत है. उसी समय उनके मन में यह विचार आया कि क्यों न बिना प्लास्टिक के थैले बनाए जाएं, जो पर्यावरण के अनुकूल हों और साथ-साथ लोगों को रोजगार भी दे सकें. यहीं से जन्म हुआ बायोर्थ पॉलीफैब इंडस्ट्रीज का. सहरसा के बैजनाथपुर में स्थित यह फैक्ट्री आज न सिर्फ एक उद्योग है बल्कि सैकड़ों सपनों की उम्मीद भी है.

सुधांशु ने बियाड़ा से बैजनाथपुर पेपर मिल में लीज पर जमीन लेकर इस फैक्ट्री की शुरुआत की. शुरुआती दौर आसान नहीं था. संसाधनों की कमी, अनुभव की चुनौती और बाजार में खुद को स्थापित करने की जद्दोजहद हर कदम पर मुश्किलें थी लेकिन, सुधांशु ने हार नहीं मानी. इस फैक्ट्री की खासियत और मजबूती यहां काम करने वाली महिलाएं हैं. सुधांशु ने शुरुआत से ही तय कर लिया था कि वे आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की महिलाओं को प्राथमिकता देंगे.

ऐसी महिलाएं जो घर की जिम्मेदारियों और गरीबी के कारण बाहर काम नहीं कर पाती थीं, उन्हें यहां रोजगार दिया गया. आज इस फैक्ट्री में करीब 20 महिलाएं काम कर रही हैं और आत्मनिर्भर बनकर अपने परिवार का सहारा बन चुकी हैं. इन महिलाओं में कई दिव्यांग महिलाएं भी शामिल हैं. समाज में जिन्हें अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है सुधांशु ने उन्हीं महिलाओं को आगे बढ़ने का मौका दिया.
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महिलाओं को काम की ट्रेनिंग दी गई, ताकि वे आत्मविश्वास के साथ फैक्ट्री में काम कर सकें. आज यही महिलाएं अपने पैरों पर खड़ी हैं और सम्मान के साथ जीवन जी रही हैं. बायोर्थ पॉलीफैब इंडस्ट्रीज में बिना प्लास्टिक के थैले तैयार किए जाते हैं, जो पर्यावरण के लिए सुरक्षित हैं. यह पहल न सिर्फ रोजगार पैदा कर रही है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी अहम भूमिका निभा रही है. सुधांशु मानते हैं कि उद्योग तभी सफल होता है जब वह समाज और प्रकृति दोनों के लिए फायदेमंद हो.

सुधांशु बताते हैं कि जब उनके दोस्तों और रिश्तेदारों ने सुना कि उन्होंने मल्टीनेशनल कंपनियों के ऑफर छोड़ दिए हैं, तो कई लोगों ने सवाल उठाए लेकिन आज वही लोग उनके फैसले की सराहना करते हैं. उनका मानना है कि अगर हर पढ़ा-लिखा युवा अपने जिले में रहकर कुछ नया शुरू करे, तो छोटे शहरों की तस्वीर बदल सकती है.

आज बायोर्थ पॉलीफैब इंडस्ट्रीज सिर्फ एक फैक्ट्री नहीं, बल्कि महिला सशक्तिकरण, आत्मनिर्भर भारत और पर्यावरण संरक्षण की मिसाल बन चुकी है. सुधांशु की यात्रा यह साबित करती है कि सफलता सिर्फ बड़ी कंपनियों में नौकरी करने से नहीं मिलती, बल्कि समाज के लिए कुछ करने से भी मिलती है. सुधांशु आज चार जिलों में काम कर रहे हैं.
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