Foods Color Harm Your Children: बच्चे अक्सर पिंक चीजों की डिमांड ज्यादा करते हैं, चाहे आइस्क्रीम हो, सीरेल्स हो, चॉकलेट हो, चुस्की हो, गोला हो, इन चीजों को खाते हुए बच्चे बेहद मस्ती करते हैं. लेकिन जरा ठहरिए, खाने-पीने की इन चीजों में जब आर्टिफिशियल कलर का प्रयोग ज्यादा किया जाता है तो बच्चों पर इसका गंभीर नुकसान होता है. जॉर्ज इंस्टीट्यूट ऑफ ग्लोबल हेल्थ के मुताबिक अमेरिका में लगभग 20 प्रतिशत पैकेज्ड खाद्य पदार्थ और पेय पदार्थों में सिंथेटिक रंग मौजूद होते हैं, जिन्हें बच्चों को आकर्षित करने के लिए अक्सर अत्यधिक चीनी के साथ मिलाया जाता है. इसलिए इन चीजों का सेवन करने से बच्चों के दिमाग पर नकारात्मक असर पड़ता है और बच्चों में व्यवहार संबंधी समस्याएं पैदा होने लगती है. इससे आगे चलकर बौद्धिक क्षमता पर असर पड़ता है. इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अमेरिका में फूड में कलर मिलाने की प्रवृति बढ़ी है जबकि यूरोप में इसे लेकर सख्त कानून है. भारत में इस तरह की कोई सख्त कानून नहीं है, इसलिए समझा जा सकता है कि यहां कितना ज्यादा नुकसान होता होगा.
वैज्ञानिकों ने इन रंगों पर जताई चिंता
कृत्रिम खाद्य रंगों के संभावित नुकसान
बच्चों में इन रंगों के फूड से नुकसान
1.हाइपसेंसेटिव और व्यवहार संबंधी समस्याएं: रिसर्च में पाया गया है कि आर्टिफिशिय कलर बच्चों में अतिसक्रियता, बेचैनी और ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई बढ़ा सकते हैं. यानी बच्चा अगर पढ़ने पर ध्यान लगाए तो उसका ध्यान भटक जाता है. ये ADHD वाले बच्चों के लक्षणों को और खराब कर देता है.
2.एलर्जी : फूड में इस्तेमाल होने वाले कुछ रंग जैसे येलो डाई 5 और येलो डाई 6 सेंसेटिव स्किन वाले व्यक्तियों में दाने, खुजली या सूजन जैसी एलर्जी प्रतिक्रियाएं पैदा कर सकते हैं.
3.पेट से जुड़ी समस्याएं: कुछ बच्चों को अत्यधिक रंग वाले खाद्य पदार्थ खाने के बाद मितली, पेट दर्द या अन्य पाचन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं.
4. कैंसर का जोखिम: कुछ अध्ययनों में कहा गया है कि फूड प्रोडक्ट में इस्तेमाल होने वाला आर्टिफिशियल कलर कैंसर के जोखिम को बढ़ा सकते हैं. पुराने कुछ रंग इसी कारण प्रतिबंधित भी किए जा चुके हैं.
5. बच्चों पर अधिक प्रभाव: बच्चों के शरीर का वजन कम होने के कारण वे सिंथेटिक रंगों के प्रभाव के प्रति विशेष रूप से अधिक संवेदनशील होते हैं.