कोहराम, संकट और महंगाई… मिडिल ईस्ट वॉर के बीच क्या कुछ ही दिनों में आ रही वैश्विक मंदी?

Iran War Impact: ईरान पर इजरायल और अमेरिका के संयुक्त हमले तथा उसके बाद तेहरान की ओर से किए गए पलटवार के चलते मिडिल ईस्ट में तनाव का यह तीसरा सप्ताह चल रहा है. इस संघर्ष में ईरान के तेल बुनियादी ढांचे के साथ-साथ उसके शीर्ष नेतृत्व को भी निशाना बनाया गया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार यह दावा करते रहे हैं कि युद्ध जल्द खत्म होगा, लेकिन ईरान के जवाबी हमलों ने इजरायल और अमेरिका दोनों को चौंका दिया है.

ईरान ने ड्रोन हमलों के जरिए यूएई, बहरीन और दुबई सहित पूरे मिडिल ईस्ट में हलचल मचा दी है और लगातार अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बना रहा है. ऐसे में फिलहाल कहीं से भी इस युद्ध के जल्द समाप्त होने के संकेत नहीं मिल रहे हैं.

क्या आ रही मंदी?

ऐसी स्थिति में यह सवाल उठ रहा है कि अगर यह युद्ध लंबा खिंचता है तो इसके क्या परिणाम हो सकते हैं. जानकारों के अनुसार, वैश्विक मंदी की आशंका बढ़ती जा रही है. एक्सिस बैंक के चीफ इकोनॉमिस्ट और एक्सिस कैपिटल के हेड ऑफ ग्लोबल रिसर्च नीलकंठ मिश्रा के मुताबिक, यदि पश्चिम एशिया में जारी तनाव अगले चार हफ्तों तक इसी तरह बना रहता है, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था मंदी की ओर बढ़ सकती है.

उन्होंने सीएनबीसी-18 से बातचीत में कहा कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में आई बाधा पहले ही चिंता का विषय बन चुकी है. यदि हालात जल्द नहीं सुधरे, तो स्थिति और बिगड़ सकती है. उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि मिडिल ईस्ट तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का लगभग सात प्रतिशत हिस्सा पहले ही प्रभावित हो चुका है, जो वैश्विक आर्थिक विकास के लिए बड़ा झटका है.

कैसे हालात हो रहे बेकाबू?

मिश्रा के अनुसार, मौजूदा हालात पर बाजार ने अभी पूरी तरह प्रतिक्रिया नहीं दी है, क्योंकि कंपनियों और निवेशकों को उम्मीद है कि स्थिति जल्द सामान्य हो सकती है. उनका कहना है कि बाजार में सकारात्मक संकेत तभी देखने को मिलेंगे, जब तनाव कम होगा और अनिश्चितता दूर होगी. उन्होंने यह भी बताया कि इस संकट का असर लगभग हर सेक्टर पर पड़ रहा है. रियल

एस्टेट प्रोजेक्ट्स में निर्माण सामग्री की कमी देखने को मिल रही है, जबकि कार्बन ब्लैक और एलएनजी की कमी के कारण ऑटो मैन्युफैक्चरिंग प्रभावित हो रही है. इसके अलावा, एलपीजी सिलेंडर की कमी से सूरत के कपड़ा उद्योग के श्रमिकों के सामने भी संकट खड़ा हो गया है. इन सभी तथ्यों से स्पष्ट है कि यह संकट केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव व्यापक रूप से विभिन्न क्षेत्रों और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है.

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