Chaitra Navratri Vrat Katha: चैत्र नवरात्रि के 9 दिन की 9 कथा, मां दुर्गा के हर स्वरूप का रहस्य

Chaitra Navratri 2026 Katha In Hindi: चैत्र नवरात्रि के नौ दिवसीय पावन पर्व की शुरुआत आज गुरुवार, 19 मार्च 2026 से हो चुकी है, जो 27 मार्च 2026 तक चलेगी. आज कलश स्थापना या घटस्थापना के साथ ही चैत्र नवरात्रि की शुरुआत हो जाएगी और फिर नौ दिनों को भक्त माता रानी की भक्ति में डूब जाएंगे.

नवरात्रि के नौ दिनों में मां दर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है. पहले दिन मां शैलपुत्री, दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी, तीसरे दिन मां चंद्रघंटा, चौथे दिन मां कुष्मांडा, पांचवें दिन मां स्कंदमाता, छठे दिन मां कात्यायनी, सातवें दिन मां कालरात्रि, आठवें दिन मां महागौरी और नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है.

नवरात्रि का हर दिन पावन, महत्वपूर्ण और आस्था से भरा हुआ है. नवरात्रि के नौ दिनों में जिस प्रकार मां दुर्गा के अलग-अलग नौ स्वरूपों (नवदुर्गा) की पूजा का महत्व है, उसी प्रकार अलग-अलग स्वरूपों से जुड़ी पौराणिक कथा भी है. इन कथाओं से मां दुर्गा के स्वरूपों का अद्भुत रहस्य मिलता है. यहां एक क्लिक में पढ़ें नवरात्रि के 9 दिनों की 9 पौराणिक कथाएं.

मां शैलपुत्री कथा (Maa Shailputri Katha)

मां शैलपुत्री, देवी दुर्गा का पहला स्वरूप हैं. पौराणिक कथा के अनुसार, राजा दक्ष ने एक बार भव्य यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें भी देवताओं और ऋषियों को आमंत्रित किया, लेकिन अपने दामाद शिव और बेटी सती को नहीं बुलाया.

यज्ञ की बात जब सती को पता चली, तो वह अपने पिता के घर यज्ञ में जाने के लिए काफी उत्सुक हो गईं. शिव के बहुत समझाने के बावजूद भी वह नहीं मानी और अकेले ही वहां पहुंच गईं. वहां पहुंचकर पिता ने सभी के सामने शिव का बहुत अपमान किया और बुरा-भला कहा, जिससे सती को बहुत दुख हुआ और उसने यज्ञ की अग्नि कुंड में ही अपने प्राण त्याग दिए.

सती के मृत्यु की खबर जब शिव को मिली तो वे क्रोधित हो गए और सती के मृत शरीर को लेकर इधर-उधर घूमने लगे. तब शिव के क्रोध को शांत करने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े कर दिए. सती के शरीर का भाग जहां-जहां गिरा वो शक्तिपीठ कहलाए. बाद में सती ने हिमालय के घर पुनर्जन्म लिया और मां शैलपुत्री के रूप में जानी गईं.

मां ब्रह्मचारिणी कथा (Maa Brahmacharini Katha)

पौराणिक कथा के अनुसार, मां ब्रह्मचारिणी का जन्म पर्वतराज हिमालय के हुआ. उन्होंने नारद जी से उपदेश लेकर शिव को पति के रूप में पाने के लिए तप किए. देवी ने तपस्या के पहले भी हजार वर्षों तक केवल फल फूल खाकर बिताएं, सौ वर्षों तक केवल जमीन पर रहकर शाक पर निर्वाह किया और वर्षा, धूप, की परवाह किए बिना अपना तप जारी रखा. कई हजार सालों तक उन्होंने सिर्फ टूटे बिल्वपत्र खाए और निरंतर भगवान शिव की पूजा करती रहीं. अंत में उन्होंने बिल्वपत्र खाना भी छोड़ दिया और फिर निर्जल और निराहार रहकर तपस्या करने लगीं. देवी की कठोर तपस्या से उनका शरीर क्षीण हो गया था. कठोर तपस्या की कारण ही उन्हें ब्रह्मचारिणी नाम मिला. देवी की कठोर तपस्या से देख ऋषि, मुनि और सिद्ध गणों ने उन्हें कहा कि, आपको तपस्या का फल अवश्य मिलेगा.

मां चंद्रघंटा कथा (Maa Chandraghanta Katha)

पौराणिक कथा के अनुसार, महिषासुर नामक राक्षस ने देवराज इंद्र का सिंहासन हड़प लिया था और वह स्वर्गलोक में भी अपना राज चाहता था. उसके आतंक से देवता चिंतित हो गए. समस्या के समाधान के लिए देवताओं ने त्रिदेव से मदद मांगी. तब त्रिदेव तीनों के मुख से जो ऊर्जा उत्पन्न हुई उससे एक देवी का जन्म हुआ, जो देवी चंद्रघंटा कहलाईं. शिव ने उन्हें त्रिशूल और विष्णु ने चक्र प्रदान किया. इसी तरह सभी देवताओं ने भी देवी को विशेष अस्त्र दिए. फिर मां चंद्रघंटा ने महिषासुर का संहार कर देवताओं की रक्षा की.

मां कुष्मांडा कथा (Maa Kushmanda Katha)

कथा के अनुसार, जब सृष्टि की रचना करने की कल्पना हुई, तो उस समय ब्रह्मांड में अंधेरा था और सन्नाटा पसरा हुआ था. ऐसे में त्रिदेव ने मां दुर्गा से सहायता ली. मां दुर्गा के चौथे स्वरूप मां कुष्मांडा ने ब्रह्मांड की रचना की. उनके मुख मंडल पर मुस्कान से पूरा ब्रह्मांड में उजाला हो गया. शास्त्रों के अनुसार, मां कुष्मांडा सूर्य लोक में वास करती हैं और उनके मुखमंडल पर सूर्य प्रकाशवान है.

मां स्कंदमाता कथा (Skandmata Katha)

कथा के अनुसार तारकासुर नामक एक राक्षस को ब्रह्मा जी से वरदान मिला था कि, उसकी मृत्यु सिर्फ शिव के संतान के हाथों होगी. इस तरह तारकासुर का आतंक बढ़ने लगा. तब मां पार्वती ने स्कंदमाता का रूप धारण किया और पुत्र स्कंद (कार्तिकेय) को युद्ध के लिए तैयार करने लगी. स्कंदमाता से शिक्षा प्राप्त कर कार्तिकेय ने तारकासुर का वध किया.

मां कात्यायनी कथा (Maa Katyayani Katha)

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार महिषासुर नामक दैत्य का अत्याचार बहुत बढ़ गया, जिससे सभी  परेशान हो गए.तब त्रिदेव के तेज से देवी उत्पन्न हुईं, जिसने महर्षि कात्यायन के घर जन्म लिया. उसका नाम कात्यायनी पड़ा. मां कात्यायनी ने दशमी तिथि पर महिषासुर का वध किया, इसलिए इन्हें महिषासुर मर्दनी कहा जाता है.

मां कालरात्रि कथा (Maa Kalratri Katha)

कथा के अनुसार, मां कालरात्रि ने शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज नामक राक्षस का वध कर देवी-देवताओं और मानवों की रक्षा की और संसार को भयमुक्त किया. यह देवी का रूप अत्यंत उग्र और शक्तिशाली है.

मां महागौरी की कथा (Maa Mahagauri Katha)

कथा के अनुसार, भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए देवी ने कठोर तपस्या की, जिस कारण उनका शरीर काला पड़ गया था, लेकिन भगवान शिव ने गंगाजल से उन्हें स्नान कराया, जिससे उनका शरीर अत्यंत गौर वर्ण का हो गया. तभी से उनका नाम महागौरी पड़ा.

मां सिद्धिदात्री कथा (Siddhidatri Katha)
कथा के अनुसार, जब सभी देवता महिषासुर के आंतक से परेशान हो गए, तब त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु और शिव) ने अपने तेज से मां सिद्धिदात्री को उत्पन्न किया. मान्यता यह भी है कि, शिव ने मां सिद्धिदात्री की कठिन साधना की, जिससे उन्हें आठ सिद्धियां प्राप्त हुईं और शिव का आधा शरीर देवी का हो गया और वे अर्धनारीश्वर कहलाएं.

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