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Gardening Tips : हमारे यहां अरंडी का पौधा पुराने समय से अपने औषधीय और कृषि महत्त्व के लिए मशहूर रहा है. इसके पत्तों को बागवानी के लिए “मिट्टी का सोना” कहा जाता है. इनमें मौजूद पोषक तत्व बंजर मिट्टी को भी उपजाऊ बना देते हैं. इसका पौधा न केवल मिट्टी की उर्वरता बढ़ाता है, बल्कि पौधों की वृद्धि, स्वास्थ्य और रोग प्रतिरोधक क्षमता में भी इजाफा कर देता है.
अरंडी के हेल्थ बेनिफिट आप भी जानते होंगे, लेकिन इसका उपयोग शरीर के साथ-साथ मिट्टी के लिए भी वरदान है. इसके पत्तों का उपयोग केवल पौधों को पोषण देने के लिए ही नहीं, बल्कि मिट्टी की दीर्घकालिक सेहत और बागवानी में जैविक संतुलन बनाए रखने के लिए भी किया जा सकता है.

अरंडी के पत्ते गलने पर नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश जैसे पोषक तत्व छोड़ते हैं. इन्हें सुखाकर मिट्टी में मिलाने से पौधे तेजी से बढ़ते हैं और मिट्टी उपजाऊ बनती है.

इसके पत्तों को पौधों के चारों ओर बिछाने से मिट्टी की नमी लंबे समय तक बनी रहती है, खरपतवार कम उगते हैं और पानी की बचत होती है. अरंडी के पत्ते जल्दी गलते हैं और कम्पोस्ट बनने की प्रक्रिया को तेज करते हैं, जिससे मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ती है.
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इसके पत्तों के विघटन से मिट्टी में मैग्नीशियम, कैल्शियम और आयरन जैसे तत्व मिलते हैं, जो पत्तेदार पौधों के लिए बहुत फायदेमंद हैं. अरंडी के पत्तों की गंध और लेटेक्स कीटों, चूहों और घोंघों को दूर रखते हैं. मिट्टी में मिलाने से जड़ों को रोग प्रतिरोधक शक्ति मिलती है.

अरंडी के पत्तों का घोल पौधों की जड़ों को मजबूत बनाता है. पत्तियों में क्लोरोफिल बढ़ाता है और पौधों को ज्यादा हरा-भरा करता है.

इसकी सड़ी हुई पत्तियां मिट्टी को भुरभुरी और जैविक तत्वों से भरपूर बनाती हैं, जिससे मिट्टी में सूक्ष्मजीवों की संख्या बढ़ती है. इन पत्तों में पाए जाने वाले रिकिन और एल्कलॉइड जैसे तत्व दीमक, सफेद मक्खी और रस चूसने वाले कीटों को दूर रखते हैं. इसके पत्तों का घोल प्राकृतिक कीटनाशक का काम करता है.

नीम की खली, गोबर या वर्मी कम्पोस्ट के साथ मिलाने से इसका प्रभाव और भी बढ़ जाता है. पारंपरिक खेती में अरंडी के पत्तों के रस का उपयोग बीजों को फफूंद और कीटों से बचाने के लिए किया जाता है, ताकि अंकुरण बेहतर हो.
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