घर लाएं 130 रुपए का देसी फ्रिज, बिना बिजली देगा कूल-कूल एहसास

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Mitti ka Matka Health Benefits: मध्य प्रदेश के सीधी जिले में बढ़ती गर्मी के बीच मिट्टी के मटकों यानी देसी फ्रिज की मांग तेजी से बढ़ रही है. महज 130 रुपये में मिलने वाला यह घड़ा बिना बिजली के पानी को ठंडा रखता है और सेहत के लिए भी फायदेमंद माना जाता है. बाजारों में इन मटकों की बिक्री बढ़ने से कुम्हारों के चेहरे पर भी खुशी दिखाई दे रही है. खास बात यह है कि इन मटकों को बनाने में करीब 8 से 10 दिन का समय लगता है और इन्हें पारंपरिक तरीके से तैयार किया जाता है. आधुनिक फ्रिज के दौर में भी देसी फ्रिज की लोकप्रियता यह साबित करती है कि पुराने देसी उपाय आज भी बेहद कारगर हैं.

Matka Water Health Benifits:मध्य प्रदेश के सीधी जिले में मार्च महीने में ही गर्मी ने अपने तेवर दिखाने शुरू कर दिए हैं. तापमान बढ़ने के साथ लोग ठंडा पानी पीकर राहत पाना चाहते हैं. लेकिन बिजली कटौती और ज्यादा बिजली बिल के डर से कई घरों में फ्रिज का इस्तेमाल सीमित हो जाता है.

ऐसे में लोगों को एक बार फिर पुराने जमाने का देसी फ्रिज यानी मिट्टी का मटका याद आने लगा है. खास बात यह है कि यह मटका महज 130 से 150 रुपये में मिल जाता है और बिना बिजली के पानी को ठंडा रखता है.

बाजारों में बढ़ी मिट्टी के घड़ों की मांग
गर्मी बढ़ने के साथ ही सीधी के बाजारों में मिट्टी के घड़ों की बिक्री भी तेजी से बढ़ गई है. शहर के मुख्य बाजार और गांधी चौराहे के आसपास इनकी खूब खरीदारी हो रही है. कारीगर भी लगातार मिट्टी को तराशकर नए-नए डिजाइन के मटके तैयार कर रहे हैं. इस बार कई घड़ों पर खूबसूरत नक्काशी और डिजाइन बनाए गए हैं, जो लोगों को काफी पसंद आ रहे हैं.

उमरिया और शहडोल से भी आते हैं मटके
स्थानीय दुकानदार रोमी प्रजापति बताते हैं कि हर साल गर्मी के मौसम में मिट्टी के घड़ों की मांग अचानक बढ़ जाती है. सीधी में ही नहीं, बल्कि उमरिया और शहडोल से भी बड़ी संख्या में मटके मंगवाए जाते हैं. उनका कहना है कि पुराने समय से ही मिट्टी के घड़े पानी को ठंडा रखने के लिए इस्तेमाल किए जाते रहे हैं. डिजाइन जरूर बदले हैं, लेकिन इनकी ठंडक आज भी पहले जैसी ही है.

8 से 10 दिन में बनता है एक मटका
कुम्हार संतोष प्रजापति बताते हैं कि मिट्टी के मटके बनाना आसान काम नहीं होता. इसके लिए खास तरह की चिकनी मिट्टी का इस्तेमाल किया जाता है. सबसे पहले मिट्टी को अच्छी तरह कूटकर बारीक किया जाता है. फिर उसे पानी में भिगोकर चाक पर आकार दिया जाता है. इसके बाद मटकों को आग में पकाया जाता है और फिर उन पर रंग और डिजाइन बनाकर अंतिम रूप दिया जाता है. पूरी प्रक्रिया में करीब 8 से 10 दिन का समय लग जाता है. कुछ मटकों में अब टोटी या नल भी लगाया जाता है, जिससे पानी निकालना आसान हो जाता है.

पीढ़ियों से चला आ रहा है यह काम
कुम्हार फुलझानिया प्रजापति बताती हैं कि उनका परिवार कई पीढ़ियों से मिट्टी के बर्तन बनाने का काम कर रहा है. भले ही आजकल बिजली से चलने वाले फ्रिज आ गए हों, लेकिन मिट्टी के घड़ों की मांग अभी भी खत्म नहीं हुई है. सीधी के बाजारों में यह देसी फ्रिज आमतौर पर 130 से 150 रुपये तक बिक रहा है.

सेहत के लिए भी फायदेमंद है मटके का पानी
विशेषज्ञों के मुताबिक मिट्टी के घड़े का पानी सेहत के लिए भी अच्छा माना जाता है. यह पानी शरीर को प्राकृतिक तरीके से ठंडक देता है और गर्मी से राहत दिलाता है. यही वजह है कि आधुनिक फ्रिज के दौर में भी देसी फ्रिज यानी मिट्टी का मटका आज भी लोगों की पहली पसंद बना हुआ है.

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Shweta Singh

Shweta Singh, currently working with News18MPCG (Digital), has been crafting impactful stories in digital journalism for more than two years. From hyperlocal issues to politics, crime, astrology, and lifestyle,…और पढ़ें

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