ब्राज़ील: ‘विकास’ के नाम पर नदी उड़ाने का प्लान ! बारूद डालकर किए जाएंगे धमाके

ब्राज़ील के टोकेन्टिंस नदी के किनारे बसा इलाका आज एक बड़े फैसले के बीच फंसा है. यहां के लोग पीढ़ियों से नदी में मछलियां पकड़कर, नारियल तोड़कर और नाव चलाकर अपना गुज़ारा करते हैं. लेकिन अब सरकार की नज़र इसी नदी पर है, उसे विकास का रास्ता बनाना चाहती है.

सरकार की योजना नदी से बनेगा ‘सोया एक्सप्रेसवे’
ब्राज़ील की सरकार ने फैसला लिया है कि अमेजन बेसिन की इस बड़ी नदी को जहाजों के लिए खोला जाएगा. योजना के तहत करीब 22 मील लंबे पत्थरीले हिस्से को धमाके से उड़ाया जाएगा ताकि यहां बार्ज़ यानी बड़े मालवाहक जहाज आसानी से गुजर सकें.

सरकार का कहना है कि इससे देश के खेतों में उगने वाली सोयाबीन और मक्का को उत्तरी बंदरगाहों तक सस्ते और तेज़ रास्ते से पहुंचाया जा सकेगा. ट्रकों की लंबी यात्राओं की जगह नदी का रास्ता अपनाने से लागत और प्रदूषण दोनों घटेंगे.

लेकिन मछुआरे और गांववाले डरे हुए हैं
टोकेन्टिंस नदी के किनारे रहने वाले वेलटन दे फ्रांका अपने पिता की तरह मछुआरे हैं. वे कहते हैंहम नदी से ही जीते हैं. बिना नाव के हम कहीं जा नहीं सकते. यही हमारी रोज़ी है.”

उनका घर उन्हीं पत्थरों के पास है जिन्हें अब उड़ाने की बात हो रही है. उनके पिता हर रोज अपने दो पोतों को नाव से स्कूल छोड़ने जाते हैं. दूसरी ओर गांव की औरतें नदी पार जाकर बाबासू के नारियल इकट्ठा करती हैं, जिनसे वे तेल और आटा बनाती हैं. सितंबर में जब अदालत के जज वहां पहुंचे, तो गांववालों ने उनसे खुलकर अपनी बातें कहीं. उनका डर साफ था,अगर नदी में बड़े-बड़े जहाज चलने लगे, तो हमारी नावें और हमारी मछलियां दोनों गायब हो जाएंगी.

वैज्ञानिकों की चेतावनी- नदी का संतुलन बिगड़ जाएगा
ब्राज़ील के एमिलियो गोएल्डी म्यूज़ियम के वैज्ञानिक अल्बर्टो अकामा ने चेताया है कि इन चट्टानों को उड़ाने से नदी की जैव विविधता यानी बायोडायवर्सिटी को बड़ा नुकसान होगा.

यहीं पर कई दुर्लभ मछलियां, नदी डॉल्फिन और कछुए पाए जाते हैं. ये चट्टानें उनके प्रजनन का घर हैं. अगर इन्हें मिटा दिया गया, तो कई प्रजातियां हमेशा के लिए खत्म हो सकती हैं.

सरकार का जवाब सबका ध्यान रखा जाएगा
पर्यावरण एजेंसी इबामा (IBAMA) ने कहा है कि ब्लास्टिंग ऐसे समय में होगी जब मछलियों और कछुओं का प्रजनन सीजन नहीं चलता. उन्होंने कहा कि धमाके से पहले जानवरों को डराकर दूर भगाया जाएगा और कछुओं के अंडों की निगरानी भी की जाएगी.

पारा राज्य के गवर्नर हेल्डर बारबाल्हो का कहना है कि पर्यावरण और विकास दोनों को साथ लेकर चलना मुमकिन है. उनके मुताबिक, “हम सस्ता और साफ़ परिवहन चाहते हैं, लेकिन ध्यान रहेगा कि प्रकृति को नुकसान कम से कम हो.”

औरतों की मुश्किल
गांव की औरतें, जो बाबासू के नारियल से तेल और आटा बनाती हैं, पहले से ही मुश्किल में हैं. आसपास के खेत बढ़ते जा रहे हैं और लोग नारियल के पेड़ों को जहर देकर काट रहे हैं ताकि नई जमीन खेती के लिए मिल सके.

मारिया दे सूज़ा, जो रोज़ नदी पार जाकर नारियल इकट्ठा करती हैं, कहती हैं अगर ये पानी का रास्ता खुल गया, तो हम दूसरी तरफ नहीं जा पाएंगे. वे कहते हैं बाबासू एक झंझट है, लेकिन हमारे लिए ये जीने का सहारा है.”

क्या सस्ता परिवहन ही असली समाधान है?
सरकार कहती है कि नदी रास्तों से माल ढुलाई ट्रक के मुकाबले करीब 60 प्रतिशत सस्ती पड़ती है. लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक, सस्ती ढुलाई के साथ एक और बड़ा खतरा भी आता है, जंगलों की कटाई.

क्लाइमेट पॉलिसी इनिशिएटिव (CPI) की एक रिपोर्ट में पाया गया कि रेल या नदी जैसे “कम प्रदूषण वाले” परिवहन से सीधे उत्सर्जन तो घटते हैं, लेकिन खेतों के फैलाव के कारण अप्रत्यक्ष तौर पर जंगल और तेजी से कटने लगते हैं.

टोकेन्टिंस नदी के किनारे रहने वाले समुदायों को सबसे बड़ा डर यही है, कहीं वे अपनी जगह से उजड़ न जाएं. समुदाय के नेता अदेमार दे सूज़ा कहते हैं अगर ये बार्ज़ आ गए, तो नदी पर हमारी जगह खत्म हो जाएगी. हमें नहीं पता आगे क्या होगा, लेकिन इतना तय है कि हालात अब पहले जैसे नहीं रहेंगे.”

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